पुण्य तिथि : 27 सितम्बर 2011
दास स्वयं इनका ऋणी है, क्योंकि ऐसे प्रेमियों की अमूल्य सेवाओं के माध्यम से ही दास अपने गुरु के जीवन को और गहराई व नज़दीकी से जान सका। ऐसे शागिर्दों की संगत सदैव ऋणी रहेगी और यह गुरु भाइयों का ऋण समता के इस दैवीय मिशन पर मर मिटने से ही चुकाया जा सकता है।
प्रेमी ओम कपूर जी बहुत उच्च संस्कारों में बड़े हुए और सत्य के जिज्ञासु थे। वे कहते हैं की जब वे पहली बार महाराज जी से मिले तो उनका शरीर इतना कमजोर था जिसमें बात तक करने की ताकत भी नहीं दिखाई पड़ती थी और यह प्रतीत होता था जैसे कोई बीमार हैं , पर उनके अंदर से आवाज ऐसी निकल रही थी जैसे कोई शेर दहाड़ रहा हो।
कहते हैं गुरु स्वयं ही शिष्य को विश्वास प्रदान करता है और अपने संरक्षण में लेता है ठीक ऐसे ही जब अगली बार ओम कपूर जी महाराज जी से मसूरी में मिले तो एक घटना इस प्रकार घटी। गुरुदेव के पीछे टीन वाले मकान के अंदर चले गए और आसन पर कमर सीधी करके बैठ गये।, वे कहते हैं ,”इतनी देर में एहसास हुआ कि मैं उसे स्थिति में पहुंच गया जिस स्थिति का कहा ही नहीं जा सकता कि मैं जाग रहा हूं या सो रहा हूं कोई किसी प्रकार का भी विचार मेरे मानस पटल पर नहीं था एक स्तब्ध सी अवस्था थी, जैसे कि सुन्न अवस्था होती है जिसमें कोई भी विचार आता जाता नहीं है ऐसी मेरे मन की स्थिति थी, उसे वक्त मुझे पता ही नहीं था कि मैं सो रहा हूं या जाग रहा हूँ ” इस घटना के बाद गुरु विश्वास बड़ गया।
वार्षिक सम्मेलन (जगाधरी, 1953) के बाद ओम कपूर जी देहरादून लौटे और वहीं से ग्रंथ ‘श्री समता प्रकाश’ के हिन्दी रूपान्तर को लेकर लखनऊ पहुँचे। अवध प्रिंटिंग वर्क्स, लाटूश रोड, लखनऊ में इसकी छपाई की तैयारी चल रही थी। नई ढली हुई टाइप से मशीन प्रूफ निकाला गया और उसका पहला पृष्ठ लेकर ओम कपूर जी सीधे अम्बाला रवाना हुए, जहाँ उस समय श्री सतगुरुदेव महाराज जी निवास कर रहे थे। अम्बाला पहुँचने पर ओम कपूर जी सीधे टेंट पर गए। वहाँ भगत बनारसी दास जी पहले से मौजूद थे। ओम कपूर जी ने उन्हें मशीन प्रूफ दिखाया, जिस पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की। थोड़ी देर बाद श्री सतगुरुदेव महाराज जी भी समाधि से लौटे और पृष्ठ देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—
“ओम, तुम्हारा यह कार्य देव कार्य है। इस काम को करते हुए तुम प्रभु के प्यारे बन जाओगे।”
इसके बाद श्री महाराज जी ने ओम कपूर जी से कहा कि वे श्री भगत जी से पूछें कि क्या वे बताए गए कार्यक्रम के अनुसार चल रहे हैं। एकांत में श्री भगत जी ने स्वीकार किया कि— वे पूरी कोशिश कर रहे हैं, पर वासनाओं के धुएँ से घिरे रहते हैं और बार-बार मन काबू में नहीं रहता।फिर भी उन्होंने आशा जताई कि श्री महाराज जी की कृपा और संगत की सद्भावना से वे अवश्य सफल होंगे।ओम कपूर जी ने यह सब यथावत श्री महाराज जी को बताया। उसी समय संयोगवश श्री भगत जी भी वहाँ उपस्थित हो गए।
ओम कपूर जी पुस्तक ” बीती हुई यादें ” में लिखते हैं:- इस अवसर पर श्री सतगुरुदेव महाराज जी ने अत्यंत गंभीर वचन कहे—
प्रेमी जी एक दूरदर्शी सोच के मालिक थे , गुरु प्रेरणा से ही समता मिशन पर मर मिटना चाहते थे। इसी गुरुमुखता और दूरदर्शिता से गुरुदेव जी की सेवा में उनका हुआ संवाद :–
सन् 1953 में श्री सद्गुरुदेव महाराज चौमासे के दौरान केलाघाट, देहरादून में एक तम्बू में निवास कर रहे थे।इसी समय देहरादून, जाखन गाँव में स्थित गोरखों के एक प्राचीन मंदिर की बिक्री और स्वामित्व परिवर्तन की चर्चा संगत में चल रही थी। इस संदर्भ में ओम कपूर जी ने साहस कर श्री महाराज से जगाधरी आश्रम की सम्पत्ति सम्बन्धी प्रश्न किया।
महाराज ने स्पष्ट किया कि सम्पत्ति सम्बन्धी जानकारी बाबू अमोलक राम जी से ही लेनी होगी।
अमोलक राम जी ने बताया कि आश्रम श्री सद्गुरुदेव महाराज के अधीन है।
परंतु ओम कपूर जी ने निवेदन किया कि गुणातीत महापुरुष के नाम पर सम्पत्ति रखना उचित नहीं है, इसे एक ट्रस्ट अथवा सोसायटी के अधीन होना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार का कानूनी विवाद न हो।
वकीलों से परामर्श और ट्रस्ट की स्थापना
ओम कपूर जी ने इस विषय पर वकीलों से परामर्श लिया।उन्होंने सलाह दी कि एक सोसायटी बनाई जाए और उसकी गवर्निंग बॉडी को Board of Trustees के रूप में मान्यता दी जाए।श्री महाराज ने इसे स्वीकार किया और तीन लिखित आज्ञाएँ दीं।
इन आज्ञाओं के मुख्य बिंदु :
• सभी आश्रमों का प्रबंधन ट्रस्ट के अंतर्गत होगा।
• ट्रस्टी सदस्य अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।
• जो सदस्य समता के सिद्धांतों का पालन नहीं करेगा, उसकी तब्दीली हो जाएगी।
ओम कपूर जी को स्वयं का नाम ट्रस्टी में देखकर उलझन हुई। उन्होंने बार-बार महाराज से निवेदन किया कि वे स्वयं को अयोग्य और अनुभवहीन मानते हैं।उन्होंने सुझाव दिया कि यह दायित्व अन्य योग्य व श्रद्धावान प्रेमियों को सौंपा जाए।
श्री महाराज ने कई दिनों तक मौन रहकर सुना और अंततः कहा :”तुम गुरु की आज्ञा को नहीं मानते।”
“क्या फल तोड़ने वालों को आश्रम का ट्रस्टी बना दें? ऐसा नहीं होगा। समय आने पर तुम्हें स्वयं समझ आ जाएगा कि तुम्हारा नाम क्यों रखा गया है।”
ओम कपूर जी यह सुनकर अवाक रह गए, कि महाराज जी ने यह क्या कहा? कुछ देर तक असमंजस में रहे फिर गुरू आज्ञा समझ कर चुप हो गए।श्री महाराज जी ने आगे कहा—“तुम्हें पता नहीं, समय आने पर तुम्हें अपने आप पता चल जावेगा कि – तुम्हारा नाम क्यों (सदस्य के रूप में) रखा गया है।”
समय बीतने पर यह सिद्ध हुआ कि यदि उनका नाम ट्रस्टी में न होता तो संगत में गंभीर पाखण्ड और भ्रांति उत्पन्न हो जाती।श्री महाराज की दूरदर्शिता और कृपा से यह संकट टल गया और संगत का मार्ग शुद्ध व स्पष्ट बना रहा।
आज ऐसे प्रेमी के किस्से हर शिष्य के लिए मिसाल बनने का काम कर रहे हैं । दास दोहराना चाहेगा की तमाम संगत और विश्व ऐसे शिष्यों का कर्जदार है जिन्होंने दैव कार्यों पर अपना जीवन कुर्बान किया और गुरुमुख बने रहे । यह ऋण केवल गुरुमुख होक ही उतरा जा सकता है क्योंकि वह अपनी किताब बीतीं हुई यादें में लिखते हैं की पथिक अवलोकन करे , सोचे और कुछ प्रेरणा ले सके तो यह सत्कार्य सफलीभूत होगा ।
प्रेमी जी द्वारा लिखी गयी 2 पुस्तकें आज समता साहित्य में दर्ज हैं और आप यहां से डिजिटल कॉपी भी प्राप्त कर सकते हैं।
बीती हुई यादें
सन्मार्ग प्रेरणा
आइए, आने वाले लेखों में हम श्रद्धावान, दृढ़ विश्वास वाले और उसूलों पर अडिग रहने वाले गुरुमुख प्रेमी ओम कपूर जी के जीवन से पढ़कर, समझकर और सीख लेकर आगे की राह पर चलते रहें।
दास को पूरा यकीन है की गुरु कृपा से प्रेमी जी अध्यात्म की यात्रा में किसी पड़ाव में होंगे क्यूंकि शेर के पंजे में आया शिकार छूट सकता है लेकिन गुरु के पंजे में आया शिष्य जन्मों जन्मों तक नहीं छूटता।