उत्तर: लाल जी, यह तो लोगों ने अपना मन पसन्द नाम दे रखा है। तुम उसे असली शान्ति का मुलम्मा (नकली नाम) कह सकते हो। असली शान्ति शरीर में नहीं है। शरीर में तो सुख और दुःख है। शांति का कोई ताल्लुक (सम्बंध) सुख और दुःख से नहीं है। वह इनसे भिन्न वस्तु है। जब यह बुद्धि उस प्रकाश स्वरूप चेतन सत्ता को जान कर उसमें लय हो जाती है, जिसके द्वारा यह शरीर प्रकाशमान है, तो यह अवस्था पूर्ण शान्ति कहलाती है।
उत्तर: प्रेमी, अब तुम्हें क्या बतलावें कि कौन अनुभव करता है और कैसे अनुभव करता है। जरा हिम्मत करो, दूर नहीं है। जब पा जाओगे तो आप से आप पता चल जाएगा। एकमात्र जीवन शक्ति के बिना और कुछ है ही नहीं। नमक समुद्र की थाह लेने गया, मगर आप ही खोया गया। अशान्त बुद्धि चली अपने उद्गम स्थान की खोज में, पता ही नहीं चला कि कहां गई और कैसे गई, रह गई चेतन सत्ता मात्र।
उत्तर:
उत्तर: लाल जी, इसके लिए एक ही बात काफी है कि तू शरीर और शरीर से सम्बंधित किसी भी पदार्थ की चाहना अपने अन्दर न रखे। यानी अपनी तमाम इच्छाओं से जब तू अबूर पा जावेगा और तेरे अपने आपको ही तसल्ली मिल जावेगी तो आनन्द के सही स्वरूप का तुझे पता चल जावेगा। यह बात बयान से बाहर की है।
उत्तर: बड़ी से बड़ी कोशिश करके परम पिता परमेश्वर के चरणों से प्रीति लगाने से ही असली शान्ति मिलती है। सब जीवों की अन्दरूनी चाहना निर्मल शान्ति की प्राप्ति है, जो तमाम जरूरतों यानी कामनाओं के त्याग करने से प्राप्त होती है। कामनाओं का त्याग देह परायणता के त्याग करने से और ईश्वर परायण होने से प्राप्त होता है।
देह परायणता का त्याग सादगी, सत्य, सेवा, सत्संग, सत्-स्मरण आदि नियमों की धारणा के बल से प्राप्त होता है। यानी तमाम सुखों की मुनास्बत हासिल करके गैर-ज़रूरी ज़रूरतों का त्याग करना, और अपने आपको ईश्वर आज्ञा में निश्चित करना यह भावना देह अभिमान और स्वार्थ यानि खुदगर्जी से निजात (मुक्ति) के देने वाली है, और असली कल्याण का स्वरूप है।
अपनी तमाम खुदगर्जी और स्वार्थ का त्याग कर देना और केवल प्रभु आज्ञा में निश्चित होकर तमाम जीवों की कल्याण करनी और कल्याण चाहनी, अपनी शक्ति के मुताबिक, यह भावना ईश्वर परायणता है। यानी एक ईश्वर के दृढ़ परायण होने से देह की शुद्धि, खानदान यानी कुल की शुद्धि, समाज की शुद्धि या उन्नति और देश की उन्नति या पवित्रता गुणी पुरुष कर सकता है और इसी ईश्वरीय नियम के अनुकूल चलकर अपने आप का भी सुधार कर सकता है। यानी तमाम खुदगर्जी को त्याग करके अपने फर्ज़ को समझते हुए निराभिमान होकर यथाशक्ति तमाम जीवों का कल्याण करना ही असली शान्ति प्राप्ति का साधन है।
उत्तर: नहीं प्रेमी। शरीर में तो सुख-दुःख ही होते हैं। शान्ति केवल मात्र उस प्रकाश स्वरूप परमेश्वर के अनुभव में ही है जिस द्वारा यह मुर्दा शरीर प्रकाशवान है। उस परम शक्ति परमात्मा के अनुभव के लिए औलियाओं (सिद्ध पुरुषों) के पास बैठना सीख। औलियाओं के पास बैठने से खुदा के पास बैठना तुमको आ जावेगा।