Shanti Ya Aanand(शान्ति या आनन्द)

प्रश्न 86: महाराज जी, कृपया शान्ति वाला पहलू भी साफ करें। व्यक्ति जब कुछ सुख या आराम कभी थोड़ी देर के वास्ते महसूस करता है तो वह कहता पाया गया है कि मुझे बड़ी शान्ति प्राप्त हुई। क्या यही वह शान्ति है या इसका भी कुछ और स्वरूप है?

उत्तर: लाल जी, यह तो लोगों ने अपना मन पसन्द नाम दे रखा है। तुम उसे असली शान्ति का मुलम्मा (नकली नाम) कह सकते हो। असली शान्ति शरीर में नहीं है। शरीर में तो सुख और दुःख है। शांति का कोई ताल्लुक (सम्बंध) सुख और दुःख से नहीं है। वह इनसे भिन्न वस्तु है। जब यह बुद्धि उस प्रकाश स्वरूप चेतन सत्ता को जान कर उसमें लय हो जाती है, जिसके द्वारा यह शरीर प्रकाशमान है, तो यह अवस्था पूर्ण शान्ति कहलाती है।

प्रश्न 87: महाराज जी, यह समझ में नहीं आया कि जब बुद्धि लय हो जाती है, तो अनुभव कौन करता है और कैसे अनुभव करता है? कृपया इसे खोलें।

उत्तर: प्रेमी, अब तुम्हें क्या बतलावें कि कौन अनुभव करता है और कैसे अनुभव करता है। जरा हिम्मत करो, दूर नहीं है। जब पा जाओगे तो आप से आप पता चल जाएगा। एकमात्र जीवन शक्ति के बिना और कुछ है ही नहीं। नमक समुद्र की थाह लेने गया, मगर आप ही खोया गया। अशान्त बुद्धि चली अपने उद्गम स्थान की खोज में, पता ही नहीं चला कि कहां गई और कैसे गई, रह गई चेतन सत्ता मात्र।

प्रश्न 88: महाराज जी, जिस आनन्द में महात्मा लोग रहते हैं उसकी महिमा क्या है? क्या इसे आंखों से देखा जा सकता है, वाणी से कहां तक व्यक्त कर सकते हैं?

उत्तर:

जां सरूप को अखै गत कहिए ।
तां की उस्तत एह विध लहिए ।।
कहे कोई जन परम तत् ऐसा ।
जो-जो बूझे सो होय वैसा ।।
कहत सुनत कुछ अचरज बाता ।
सदा इस्थिर नहीं दोष को खाता ।।
तन मद्ये सो रहे समायो ।
बिना स्वभाव नित रमनायो ।।
तन की ममता मन को भरमावे ।
मन की अस्थिरता देह वंजावे ।।
तन मन दोनों शब्द में लीना ।
“मंगत” तब भेद तत्वज्ञान का चीन्हा ।।

देवता जी! कहते बनता ही नहीं, क्या कहा जाए। जिसने प्राप्त कर लिया उसी का रूप हो गए। कहने-सुनने में परम तत्व आ ही नहीं सकता। इन्द्रिय अगोचर इसीलिए इसको कहा गया है। उस आनन्दमय अवस्था का बयान किसके आगे किया जाए? कौन इन बातों पर ध्यान देता है। पहले वक्तों में संत-मंडलियां बैठकर नित्य तत्वज्ञान का आपस में विचार करती थीं। आज वह समय आ गया है कि जहां चार संत इकट्ठे हो गये तम्बाकू की खैर नहीं। बड़े भाग जो आप गुरुमुखों के दर्शन हो गए। जिस सुख के वास्ते जीव दिन रात यत्न-प्रयत्न कर रहा है, वास्तव में वह सुख तो साधु-संगत और सत्संग में है। न ही जीव से मोह छूटता है और न सत्मार्ग पर आता है। शरीर तो समय पर नाश हो जाने वाली चीज है। यह इसका धर्म है। मूर्ख जीव इसमें मुस्तग़र्क (लीन) होकर असली सुख से दूर रहते हैं। कोई ही बड़भागी जीव सत्संग से प्रीत रखता है। अब तो लेखा ही खत्म है। साधु समाज ने ही जब अपना नियम-धर्म छोड़ दिया है तब जनता क्या करे? तप तेज द्वारा ही जीवों के अन्दर श्रद्धा विश्वास पैदा हो सकता है। ईश्वर सबको सुबुद्धि देवे।

प्रश्न 89: महाराज जी, असली आनन्द किसे कहते हैं?

उत्तर: लाल जी, इसके लिए एक ही बात काफी है कि तू शरीर और शरीर से सम्बंधित किसी भी पदार्थ की चाहना अपने अन्दर न रखे। यानी अपनी तमाम इच्छाओं से जब तू अबूर पा जावेगा और तेरे अपने आपको ही तसल्ली मिल जावेगी तो आनन्द के सही स्वरूप का तुझे पता चल जावेगा। यह बात बयान से बाहर की है।

प्रश्न 90: असली शान्ति कैसे प्राप्त होती है ?

उत्तर: बड़ी से बड़ी कोशिश करके परम पिता परमेश्वर के चरणों से प्रीति लगाने से ही असली शान्ति मिलती है। सब जीवों की अन्दरूनी चाहना निर्मल शान्ति की प्राप्ति है, जो तमाम जरूरतों यानी कामनाओं के त्याग करने से प्राप्त होती है। कामनाओं का त्याग देह परायणता के त्याग करने से और ईश्वर परायण होने से प्राप्त होता है।
देह परायणता का त्याग सादगी, सत्य, सेवा, सत्संग, सत्-स्मरण आदि नियमों की धारणा के बल से प्राप्त होता है। यानी तमाम सुखों की मुनास्बत हासिल करके गैर-ज़रूरी ज़रूरतों का त्याग करना, और अपने आपको ईश्वर आज्ञा में निश्चित करना यह भावना देह अभिमान और स्वार्थ यानि खुदगर्जी से निजात (मुक्ति) के देने वाली है, और असली कल्याण का स्वरूप है।
अपनी तमाम खुदगर्जी और स्वार्थ का त्याग कर देना और केवल प्रभु आज्ञा में निश्चित होकर तमाम जीवों की कल्याण करनी और कल्याण चाहनी, अपनी शक्ति के मुताबिक, यह भावना ईश्वर परायणता है। यानी एक ईश्वर के दृढ़ परायण होने से देह की शुद्धि, खानदान यानी कुल की शुद्धि, समाज की शुद्धि या उन्नति और देश की उन्नति या पवित्रता गुणी पुरुष कर सकता है और इसी ईश्वरीय नियम के अनुकूल चलकर अपने आप का भी सुधार कर सकता है। यानी तमाम खुदगर्जी को त्याग करके अपने फर्ज़ को समझते हुए निराभिमान होकर यथाशक्ति तमाम जीवों का कल्याण करना ही असली शान्ति प्राप्ति का साधन है।

प्रश्न 91: क्या इस शरीर में शान्ति प्राप्त हो सकती है?

उत्तर: नहीं प्रेमी। शरीर में तो सुख-दुःख ही होते हैं। शान्ति केवल मात्र उस प्रकाश स्वरूप परमेश्वर के अनुभव में ही है जिस द्वारा यह मुर्दा शरीर प्रकाशवान है। उस परम शक्ति परमात्मा के अनुभव के लिए औलियाओं (सिद्ध पुरुषों) के पास बैठना सीख। औलियाओं के पास बैठने से खुदा के पास बैठना तुमको आ जावेगा।

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