उत्तर: महापुरुष कुदरत (प्रकृति) के किसी काम में दखल नहीं देते। गो (यद्यपि) वे सब कुछ कर सकते हैं लेकिन ईश्वर इच्छा में शाकिर (संतुष्ट) रहते हैं।
उत्तर: प्रेमी, तुम्हारी बात दुरुस्त है। इसकी वजह यह है कि चक्रवर्ती राजा तक अपने शरीर की वासनाओं की कैद में है और हर वक्त नातसल्लीबख्श हालत में रहते हैं। बाकी के इन्सानों की गिनती क्या है। हर जीव तसल्ली बाहता है और इस तसल्ली को प्राप्त करने की तलाश में ही दर-दर ठोकरें खाता है। सत्पुरुषों के अन्दर पूर्ण तसल्ली होती है और उनके अंग-अंग से वह तसल्ली नाजल (प्रस्फुटित) होती है, यह ही कारण है कि लोग सत्पुरुषों के पास अपनी नातसल्ली अवस्था को पूर्ण तसल्ली में बदलने के लिए उनकी शरण में आकर अपने आप को सौंप देते हैं और उनके पास खिचे चले आते हैं।
उत्तर: इस अवस्था को प्राप्त पुरुष की बुद्धि सूक्ष्म हो जाती है तथा तीव्रता से वह हर विचार के अन्दर तक घुस जाती है और उसको भीतर से समझने की ताकत उसमें आ जाती है, तो सब कुछ जान लेना कौन सी बड़ी बात है। सब प्राणी मात्र में बुद्धि होती है और इस करके शरीर खड़ा है। बुद्धि में जो अहंकार है, यह ही माया है। बुद्धि जिस (तत्व) करके रोशन है जब यह उस तत्व में स्थित होगी तब यह आत्म तदरूप होकर मुक्त हो जावेगी।
उत्तर: लाल जी। आपके पिछले कर्मों के तो ये जिम्मेदार हैं, लेकिन आगे से जिम्मेदारी तुम्हारी होगी।
उत्तर: प्रेमी जी, समर्थ पुरुष वृत्तियों को सुकेड़ने व फैलाने की सामर्थ्य रखता है। बाकी संसारी वृत्तियों को फैलाना ही जानते हैं, सुकोड़ना नहीं जानते। यह दोनों में अंतर है।
उत्तर: प्रेमी सुन ! ऋषि, मुनि, संत, अवतार शुरू से कृपा करते आए हैं। कृष्ण के जमाने में उसकी चंद ही उंगली पर गिनती वाले सज्जनों ने बात सुनी। हर तरीके से महान हस्ती ने समझाने की कोशिश की। राम के जमाने में उनके साथ कैसी बीती। सतयुग में देवताओं, असुरों के युद्ध होते रहे। हिन्दुस्तान की क्या हालत थी, नौ-सी हिस्सों में बंटा हुआ था। अब पांच सात साल से लाखों वर्षों के बाद एक हुआ है। अवतारों की कब किसने सुनी, सुनते तो आज यह हालत न होती। फिर भी दूसरे देशों से अधिक भारत में अभी भी सतोगुणी स्वभाव के जीव मौजूद हैं। अध्यात्मवाद का यह मरकज़ था, धर्म को जानने वाले ज्यादातर भारत में ही हुए हैं। दूसरे मुल्कों की क्या हालत थी। जहालत की जिन्दगी गुजारते थे। तीन चार सौ साल से सूझ-बूझ वाले हो रहे हैं। वह भी प्रकृति को असली सुख समझते हैं। ईसा का उपदेश उसके जमाने में किसी ने नहीं सुना। मोहम्मद साहब को मक्का से कई दफा निकलना पड़ा। आखिर मदीना में जाकर रहना पड़ा। दुनियादार कभी भी सत्पुरुषों को उनकी जिन्दगी में अच्छी तरह नहीं जानते। बाद में जब वे संसार से चले जाते हैं तब होश आती है। तब उनकी मूर्तियां थापकर पूजा शुरू कर देते हैं। इस वक्त ईसाई, बौद्ध, मुसलमानों की ही दुनिया में ज्यादा चलती है। हिन्दू सिर्फ इस कोने में ही टल्ली खड़काते रहते हैं। सैकड़ों किस्म के मत इस हिन्दू जाति में है। सत्पुरुष कितनी कितनी कुरबानी जनता के वास्ते कर गए हैं, सबमें एक आत्म तत्त देखने का उपदेश मौजूद है, मगर जातिवाद ही खत्म नहीं होता। हर एक जीव का स्वभाव अपना-अपना, अलग बाल-ढाल, मत अलग है। ईश्वर की माया विचित्र है। सत्पुरुषों ने अपनी तरफ से कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी मगर दुनिया इसी तरह चलती आई है और चलती जायेगी। गुरुमुखों को अपना सुधार करके गुरुमुखता फैलानी चाहिए। अपनी तरफ से हर जीव मात्र से प्रेम रखो। तन, मन से जितनी सेवा बन सके करो। दो घड़ी मालिक की याद में समय दिया करो। आहार, व्यौहार की पवित्रता पर खास ध्यान देकर चलोगे तो कभी दुःख नहीं देखोगे। ईश्वर की सत्ता से ही सब जीव मात्र जिन्दगी ले रहे हैं। दीनदयाल ही कृपा करें।
उत्तर: प्रेमी, बगैर पुरुषार्थ के स्वार्थ को पूरा करना चाहते हो। बिना कोशिश के न संसार की सामग्री मिलती है न करतार ही खुश होता है। दुनिया में जितने भी महात्मा, महापुरुष, गुरु, पीर हुए हैं या दूसरे जिन-जिन की संसार में बड़ी महिमा हो रही है मसलन नेहरू, गांधी वगैरा सब बड़ी जद-ओ-जहद (पुरुषार्थ) और तप-त्याग, कुरबानी से इस अवस्था तक पहुंचे हैं। यह आशीर्वाद लेने वाली बीमारी ने जीवों को पुरुषार्थ हीन कर रखा है। यहां क्या लेने आये हो। जब दुनिया के सुख बगैर कोशिश यानि यत्न के प्राप्त नहीं हो सकते, तो परमार्थ मार्ग में बिना कोशिश के कैसे कामयाबी हो सकती है। भगवान कोई ऐसा भोला-भाला नहीं कि झट ही तुम पर मेहरबान हो जायेगा। फकीर भी तो किसी पर जल्दी मेहरबान नहीं होते। वह भी हृदयों को टटोलते रहते हैं और देखते हैं कि संसारी किस वास्ते दौड़ रहे हैं।