Satguru Ki Aavshyakta, Prapti tatha Pehchan(सत्गुरु की आवश्यकता, प्राप्ति तथा पहचान)

प्रश्न 108: महाराज जी, जीव को संसार के सुखों में ज्यादा रुचि रहती है और सत्संग तथा अच्छे कर्मों के करने के वास्ते उत्साह पैदा नहीं होता, क्या प्रारब्ध के कमाँ की वजह से ऐसा होता है?

उत्तर: प्रेमी, बड़ा अच्छा विचार तुमने किया है। जन्म-जन्मान्तर से जीव का रुख संसार की तरफ बना हुआ है। स्वाभाविक सांसारिक सुख-भोगों की तरफ जन्म काल से इसकी रुचि बनी हुई है। जिस तरफ चित्त का लगाव बहुत ज्यादा हो, उसी तरफ यह वित्त दौड़ता है। शुभ-अशुभ कर्म जीव से होते रहते हैं। जब तक चित्त के अन्दर प्रभु प्रेम, सत्मार्ग की तरफ लगाव न हो, तब तक जीव सत्संग और अच्छे कर्मों को अपना नहीं सकता। पूर्ण भाग उस जीव के हैं जिसके अन्दर प्रभु चरणों का प्रेम बना हुआ है। वह ही सत्संग की ओर जाएगा। सत्संग में जाने वाले के अन्दर सत् विचार पैदा होते हैं, वरना मूढ़मति कुसंग की तरफ तो लगा हुआ होता है। जब सत् विचार होते हैं तब इसका सत् विश्वास ईश्वर के प्रति बनने लगता है। सत् विश्वास करके गुरु की शरण में जाता है। सच्चाई को तीर्थ, वन, पहाड़, गुफा में ढूंढने लगता है। कहीं से कोई सत्पुरुष मिल जाए तो उससे ज्ञान उपदेश लेकर सत् साधन को धारण करके सिद्धता को प्राप्त कर लेता है। बगैर साधना के साधु नहीं बन सकता। अनेक तरह के यत्न-प्रयत्न करने में लगा रहता है। प्रेम के बिना कोई कारज सिद्ध नहीं होता। जिस काम में इसकी रुचि होती है उसे पूरा कर लेता है।
लाल जी, बार-बार अपने आप को प्रभु में दृढ़ करके इस कर्म रोग से खुलासी पा जाता है। जब तक कर्म की वासना क्षय नहीं होती तब तक संसार के सुख भोगों की तरफ चित्त दौड़ता रहता है। जिस वक्त सुरति सत्नाम में लग जाती है, और बाहर की सुधबुध भूलकर केवल निर्वाण हालत में विचरती है, तब भोगमयी वृत्ति गायब हो जाती है। फिर चित्त किधर दौड़ेगा? इस वास्ते निष्काम प्रेम भाव से मालिक के चरणों में दो घड़ी चित्त को लगाया करो। जब तक सत् युक्ति से प्रभु नाम स्मरण में बुद्धि नहीं लगती तब तक वृत्ति दौड़ती रहेगी। किसी गुरु पीर का आसरा लेकर चलने से सफलता मिल जाया करती है। जब संसार के सब कामों को सीखने के लिए उस्ताद की जरूरत रहती है तो प्रेमी, धर्म के मार्ग में भी सत्गुरु की जरूरत है। तुम लोग बड़े व्यापारी हो। सत् का सौदा लेने की ख्वाहिश होगी तब ही तो खरीदीगे। पहले तड़प पक्की बनाओ, फिर यत्न भी बन जाएगा।

प्रश्न 109: महाराज जी, सत्मार्ग का विचार कैसे किया जावे?

उत्तर:


ऐसा ज्ञान विचारों कोई।
सो नर जीवन मुक्ता होई।।
बोलनहार कहां सों हुआ।
कैसे उपजा, कैसे मुआ।।
पवन की गांठ सहज बन आई।
तां पिंगला बिनसिया भाई ।।
खुल गई गांठ खांज नहिं पाया।
पवन का पुतला, पवन समाया।।
जैसे बादल होत आकारा।
तैसे दरसे यह संसारा।।
मिट गया बादल रहा आकासा।
ऐसे आतम को नहीं बिनासा।।
इस बहुरंगी का पार न पाया।
कहें कबीर गुरु भेद सिखाया।।

प्रेमी, गुरु गोसाई मिलें तब ही सत् का भेद लखावें। बिना मुर्शिद के विचार (आत्म चिंतन) का तरीका नहीं मिलता। बिना विचार के ज्ञान नहीं होता। जिस तरह संसार की भक्ति यानी प्राप्ति कठिन है, इसी तरह सत् की धार पर चलना भी कठिन है-
चलो चलो सब कोई कहे, विरला पहुंचे कोये।
जा को सत्गुरु मिलनगे, तां घट सोझो होये।।

तरीका पाकर भी बड़ी मेहनत की जरूरत होती है। तुमको अभी क्या इस तरफ की पड़ी है। तुमने अभी संसार को देखना है। प्रेमी, यह आशिकों का मार्ग अलग और संसारियों का अलग है।
ग्राही हो तो भगत कर, ना तो कर वैराग।
वैरागी बन्धन पड़े, ताको बड़ा अभाग।।
तब लग जोगी जगत गुरु, जब लग रहे निराश।
जब जोगी आशा करे, तो जग गुरु जोगी दास।।

बाहोश होकर बुद्धि खोलकर सुना करो। भाई का कड़ाह (हलवा) नहीं जो जल्दी मुंह में डाल लोगे। सत्संग में आया करो। इस तरह शौक बढ़ता है।

साथ बड़े परमार्थी, घन ज्यों बरसे आय।
तपन बुझावें और की, अपना पारस लाय।।
नदिया बहती जात है, उठ धोइयो शताबी हाथ।
न जाने किस पलक में, नाथ से होवें अनाथ।।

प्रेमी, किसी के होकर चलोगे तब कुछ न कुछ पा लोगे। मनमुखी जीव लोक-परलोक दोनों सुखों से महरूम (वंचित) रहता है।

प्रश्न 110: महाराज जी, गुरु की पहचान कैसे करें? जिस संत के पास जाते हैं उनकी तरफ से प्रेरणा यह होती है कि नाम लो, उपदेश ले लो।

उत्तर: प्रेमी, पहले इस बुद्धि को पारखी बनाओ यानि परखने वाली बनाओ, जिससे संत-असंत की पहचान हो जावे। फिर गुरु की अच्छी तरह सार लो। जिस तरह लोहार लोहे की सार लेता है, अच्छी तरह ठकोरना चाहिए। जब दो पैसे की हांडी लेते हो, किस तरह उसे इधर-उधर से देखकर लेते हो। सारी उम्र के वास्ते रहनुमा बनाना है, फिर उसकी जांच न की जाए। सत् बचनी नहीं बनना चाहिए। पहले यह सोचो गुरु की जरूरत भी है या नहीं। गुरु संसारी कामों की मदद के वास्ते चाहिए या रूह की तसल्ली के लिए गुरु धारण करना है। जिन्होंने अपनी तसल्ली कर ली है वह कभी जवानी किसी को उपदेश लेने के वास्ते नहीं कहेंगे। जिज्ञासु को समझदार देखकर सिर्फ उसे सत् विचारों से जागृत करेंगे। जिज्ञासु बुद्धिमान हुआ तो आप ही प्रार्थना करेगा, मुझे किसी रास्ते पर कृपा करके डालो। सत्गुरु को कोई जरूरत नहीं चेले बनाने की, वह तो नित सत् विचार सुनाते हैं। जिसकी बुद्धि हुई आप ही परख लेगा। गुरु की पहचान यह ही है, जिसके पास बैठने से चित्त को चैन मिले। चित्त अपनी चंचलता छोड़ दे। विचार करने के बाद जब मन के अन्दर कोई हुज्जतबाजी न रहेगी तब समझ लेना यहां कुछ है। फिर वहां सर खम (समर्पण) कर दो। जिस जगह या जिस संत के पास जाकर तसल्ली नहीं होती, आपही मन कह देगा, यहां कुछ बात नहीं बनी।

प्रश्न 111: बड़े-बड़े महापुरुष बिना उस्ताद (गुरु) के ही स्वयं उद्यम से बड़े ऊंचे पहुंच गए तो क्या हमारा काम इसके बिना नहीं चल सकता, जबकि इस काल में एक कामिल उस्ताद (पूर्ण गुरु) का मिलना बिलकुल नामुमकिन (असंभव) है। चारों तरफ डोंग एवं पाखंड के अड्‌डे नजर आते हैं। मैं इस चक्कर में फंसना न चाहूंगा। पता नहीं और मुसीबत ही मोल न ले लू।

उत्तर: महापुरुषों की बात छोड़, तू अपनी बात कर। ऐसे महापुरुष बहुत थोड़े होते हैं जो जन्म के सिद्ध हुए हैं। यह उनके पहले (पिछले) जन्मों की कमाई थी। बाकी सबके सब किसी जरिए (साधन) से ही असल कामयाबी (सफलता) को प्राप्त हुए हैं। इस वास्ते किसी भी सिद्धि को प्राप्त करने की खातिर वाकिफकार (परिचित व्यक्ति) की जरूरत रहती है। यह प्रकृक्ति का नियम है। प्रेमी जी, जरा से काम को करने के लिए तो हर कदम-कदम पर, यहां तक कि व्यापार में भी, सहारे की तथा उस्ताद या एक्सपर्ट की ज़रूरत पड़ती है। इतनी बड़ी मंजिल (उच्च लक्ष्य) परमार्थ की पार करना बच्चों का खेल नहीं, जिसकी अभी शुरुआत (आरम्भ) भी नहीं हुई है। हां, यह ज़रूर है कि इस समय पाखंडे का बाजार गरम है और कामिल सत्गुरु मिलने मुश्किल (कठिन) हैं पर खोजने से सब कुछ प्राप्त हो जाता है. बीज नाश नहीं होता।

प्रश्न 112: आप तो घूमते ही रहते हैं, आप किसी कामिल (पूर्ण) गुरु को बतला सकते हैं? या कम से कम मेरे ख्याल में ऐसी पहचान बतला सकते हैं जिसकी कसौटी पर हम उसे रखकर पहचान ले? मैं तो पाखण्ड तथा गुरुडम का शिकार होने की बजाए बिना उस्ताद के रहना ज्यादा बेहतर समझता हूं। आपकी क्या राय है? शास्त्रों में पहचान ये रखी है। पर आजकल वह किसी में पूरी नहीं उतरती, सो आप कोई आसान-सा उपाय बतलाएं।

उत्तर: लाल जी, यह बिलकुल ठीक है कि पाखंड में फंसने की
बजाए निगुरा (बिना गुरु) ही रहे। परन्तु निरंतर खोज में लगे रहना चाहिए। हां, ये तुम्हें थोड़े से में कामिल गुरु की पहचान बतला सकते हैं। उन पर पूरे उतरे हुए पुरुष से तुम धोखा नहीं खाओगे। तो लो, सुनो या लिख लो
(1) कहनी और रहनी जिसकी एक है।
(2) जो अपने आप में ही पढ़ा हुआ तो, यानी किताबी ज्ञान का जानने बाला न हो बल्कि मन कि किताब पढ़ा हुआ हो।
(3) मानसिक शान्ति का नमूना (आदर्श) हो।
(4) शरीर के मान और धन के लोभ से जो मुबर्रा (मुक्त) हो।
(5) बैठक जिसकी बहुत हो।
(6) स्त्रियों से तो कतई किनाराकश हो, यानी किसी हालत में भी अकेली स्त्री को पास न बैठाने वाला हो।
(7) निहायत दयालुचित्त हो।
(8) वैराग्यवान जिसकी हर वक्त सीरत (स्वभाव) रहती हो, यानी जो लिप्त न हो।
(9) जो नौ दरवाजों की वासना से अतीत होकर सदा महा आकाश (अविनाशी शब्द ब्रह्म) में विराजमान रहता है। ऐसा आत्मनिष्ठ पुरुष परम गुरु है, क्योंकि उसने त्रैगुणी माया से अबूर (पार) पाकर विश्राम पाया है और वह दूसरों के लिए भी परम शिक्षक है। ऐसे गुरु में तत्काल विश्वास करना चाहिए। विश्वास या श्रद्धा के होते ही गुरु कृपा तेरे अन्दर अपने आप उतरने लगेगी और फिर गुरु कृपा से जो साधन प्राप्त होगा, उसको कमाई करके तू उस शक्ति को समझने लगेगा जो तेरे शरीर से बिलकुल अलग है। तेरे शरीर में भय, भूख, प्यास, सरदी, गरमी, मरना, जीना इत्यादि विकार हैं, आत्मा इनसे परे है। जब तू उस आत्म स्वरूप में स्थित होगा तो किसी भी हालत में जीकर शान्त रहेगा। यानी जब तू साधन में लग जावेगा तो चाहे कैसी ही हालतों में से क्यों न गुज़रे, शान्त रहेगा। बगैर साधन के तू ऐसा ही है जैसे पानी बिना घड़ा।

प्रश्न 113: महाराज जी, क्या बगैर उस्ताद के भी किसी और युक्ति से आत्म साक्षात्कार हो सकता है?

उत्तर: नहीं, तुम जैसी अवस्था वालों को नहीं। ठीक साधन का कामिल गुरु की कृपा से ही पता चलता है। इस वास्ते किसी भी कामिल (पूर्ण) गुरु पर पूर्ण विश्वास या ईमान लाने से पहले यह अच्छी तरह ठोक बजाकर देख लें कि जो चन्द बातें अभी पहले गुरु में होनी जरूरी बतलाई हैं, ये हैं कि नहीं। अगर नहीं हैं तो कभी ईमान न लाओ। उस गुरु से तेरा कल्याण होने वाला नहीं है। अगर सब सिफात (गुण) वहां मिलती हैं तो होल-हुज्जत छोड़कर विश्वास कर लेना चाहिए। तब वह सत्गुरु कृपा करके ऐसा साधन बतावेगा जिसके द्वारा तू सब दिक्कतों (कठिनाइयों) से अबूर पाकर परम शान्ति को प्राप्त हो जावेगा। वरना प्रेमी जी, डर है कि कहीं तुम्हारा यह सात्विक जीवन उलटा न हो जावे, और ज्यादा परेशानी में न पड़ जावे, क्योंकि इस रज-तमात्मक संसार में तो तू अपने पुराने उज्वल संस्कार करके फंस नहीं सकता लेकिन कामिल रहनुमाई (पूर्ण नेतृत्व) के बगैर पूर्ण विश्वास कठिन है। इस तरफ संसार की गर्दिश में तो तुझको कुछ मिलेगा नहीं, बस तू गहरे अजाब (घने दुःख) में फंस जायेगा। इस करके जल्द ही किसी कामिल उस्ताद (पूर्ण गुरु) की तलाश करने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रश्न 114: महाराज जी, अभी तक हमने कोई गुरु धारण नहीं किया। क्या गुरु के बगैर कुछ समझ नहीं आ सकती? ये आपने जो बड़े-बड़े ऊंचे शब्द उच्चारण किये हैं, हमको कुछ समझ नहीं आए। केवल पहला पद ही समझ में आया है कि जब तक भ्रम मौजूद है तब तक तृष्णा से मुक्ति नहीं हो सकती।

उत्तर: प्रेमी, गाते-गाते ही गुणवन्त हो जाया करते हैं-

ममता माई जन्मत खाई, काम क्रोध दोऊ मामा।
मोह नगर का राजा खायो, तब पहुंच्यो इस धामा।।

लाल जी, गुरु के बगैर न जीवन संसार में चल सकता है न करतार में। परमार्थ-मार्ग तो वैसे ही कठिन है। श्रद्धा विश्वास के बल द्वारा सत्‌मार्ग में प्रतीत बन जाया करती है। आगे रंग चढ़ाने वाला कोई मिल जाए तो करोड़ बरस का पंथ पल में ही चुक जाता है। वैसे जीव भ्रम में ही कई जन्म गुजार देता है। पढ़कर, सुनकर भी मन नहीं मानता, यह ऐसा दुष्ट है। बाकी सारे मदहोशी की हालत में संसार की मोह माया में फंसकर भटकते हैं। जिस समय कोई राह दिखाने वाला मिल जावेगा तब शब्दों की समझ आने लग जावेगी। किसी रास्ते पर चलने वाले बनो तो सही।
प्रश्न 115: प्रभु के आशिकों (प्रेमी) की क्या पहचान है?

उत्तर: आशिकों की पहचान बड़ी मुश्किल है। एक जरा सा इशारा मात्र पहचान यह है कि आशिक सदा उदास रहता है। दूध पीने वाले मजनू बहुत होते हैं, मगर अपना खून पिलाने वाला कोई ही लाखों में से एक आध निकलता है।

प्रश्न 116: महाराज जी, आशिक तो सदा मस्त रहता है, जैसे मन्सूर इत्यादि, और आप फरमाते हैं कि उदास रहता है, यह कैसे?

उत्तर: प्रेमी, आत्म आनन्द करके तो यह (आशिक) मस्त रहता है मगर शरीर करके वह दुनिया से उदास रहता है। बाकी पहचान करनी बड़ी मुश्किल है।

प्रश्न 117: आत्म आनन्द की क्या पहचान है?

उत्तर: तू भी खूब सवाल करता है। सुन, जब बुद्धि कर्तापन को त्यागकर अकर्ता भाव में खड़ी होगी यानि जब बुद्धि शरीर तथा दुनिया की खुशी से मुवर्य (स्वतंत्र) हो जावेगी और शरीर की खुशियां उसको खुश न कर सकेंगी तो यह बुद्धि आत्म तत्व में स्थित हो जावेगी। यह ही आत्म आनन्द की पहचान है।

प्रश्न 118: महाराज जी, यदि कोई तत्ववेत्ता सत्‌गुरु न मिले तो फिर क्या करना चाहिए?

उत्तर: प्रेमी, जिस जिज्ञासु के अन्दर प्रभु प्राप्ति के लिए अति प्रेम और श्रद्धा होती है तथा लगन और तड़प इस प्रकार की हो कि सिवाय भगवद् प्राप्ति के दूसरी कोई कामना चित्त के अन्दर न हो, उसे स्वयं ही भगवान किसी न किसी रूप में आकर दर्शन दे जाते हैं। एक नुक्ता और समझाते हैं। जरूरी नहीं कि तू मठों और गद्दियों में जाकर ख्वार होता फिरे। अन्तर्यामी घट घट की जानने वाले हैं। किसी न किसी प्रकार से उसे उपदेश मिल ही जाता है। करने वाला सो ही है।

प्रश्न 119: संत और असंत में क्या भेद है?

उत्तर: संत गुस्सा (क्रोध) और ख्वाहिशात (कामना) से परे होते हैं और असंत इनमें गलतान (फंसा) होता है। यानि शरीर में फंसा हुआ असंत है और शरीर से ऊपर उठा हुआ संत है। जिस संत के पास पहुंचकर बुद्धि का तर्क-वितर्क समाप्त हो जाए वह पूर्ण संत है।

प्रश्न 120: अनुभवी सत्पुरुष की क्या पहचान है?

उत्तर: जो किसी पुस्तक का हवाला न देकर अपने ही अनुभव की बात कहे और प्रश्न का उत्तर तुरंत दे (अर्थात् जिसमें सोच-विचार न करना पड़े)। और जो भी बात करे, निर्णायक हो (अर्थात् तर्क-वितर्क से मुक्त हो)। उसके उत्तर में शरणागति का भाव टपकता हो, यानि अहंकार से रहित बात करे, वरना परीक्षा लेने वाले सिर पर आग रखकर भी देख लेंगे कि सन्त शिरोमणि है या मनमुखी।

प्रश्न 121: सही गुरु कौन है?

उत्तर: गुरुपद अति ही कठिन अवस्था है; कोई ही गुरुमुख प्राप्त होता है। जिसने अपने तमाम शारीरिक भोगों से त्याग हासिल किया हो और हर वक्त आत्मस्वरूप में स्थित रहता है, पर उपकारी जीवन जिसका हो, हर एक जीव से अधिक प्रेम रखने वाला हो, लाभ व हानि, खुशी व ग मी, सर्दी व गर्मी, मित्र शत्रु, भय व भ्रम से जिसकी बुद्धि बिल्कुल न्यारी हो चुकी हो, और शब्द सरूप ब्रह्म में स्थित हो गई हो, वह ही गुरु है। यानी पहले उसने अपना अन्धकार दूर किया है और ईश्वर प्रकाश को प्राप्त हुआ है। उसका उपदेश दूसरों के वास्तें भी कल्याणकारी है।
जो नामुकम्मिल साधु के उपदेश को धारण किया होवे, जिसने खुद अपने अन्धकार को दूर न क्रिया हो, तो उस उपदेश में सफलता होनी कठिन है। क्योंकि इस योगमार्ग में गुरु करनी वाले के बगैर सत्पद की प्राप्ति होनी अति कठिन है। जैसे कि आम बनावटी गुरु घर-घर उपदेश देते फिरते हैं, उसका नतीजा महज़ एक व्यवहार है न कि कल्याण है।
नामुकम्मिल साधु का उपदेश न यथार्थ कल्याण दे सकता है और न ही बुद्धि उस पर पूर्ण निश्चयगत हो सकती है। ऐसा अच्छी तरह से समझना चाहिये।
शिष्य ने गुरु की कुर्बानी को देख करके ही कुर्बानी करनी है, गुरु की पवित्रता को देख करके ही पवित्रता प्राप्त करनी है। गुरु के वैराग, अनुराग और निदिध्यास को देख करके ही शिष्य सर्वमयी गुण को धारण करके अपने तमाम अवगुणों से छूट सकता है। जब गुरु औगुणवादी और महज कथनी ही है तो शिष्य भी ऐसी ही गति को प्राप्त कर सकेगा। यह यथार्थ निर्णय समझना चाहिए कि गुरु की सत् स्थिति से ही शिष्य निर्मल हो सकता है।

प्रश्न 122: सद्गुरु के स्वरूप का वर्णन किस प्रकार करना चाहिए?

उत्तर: ईश्वर के रूप को कोई पूछे तो महामंत्र पढ़कर सुना दिया करो। गुरु के रूप का वर्णन करना हो तो उन महागुणों का वर्णन करना चाहिए जिस पर कोई एतराज न कर सके। शारीरिक स्थिति तो हर ज़माने में हर गुरु की, पीर अवतार को अलग अलग तरह की रही है मगर सबके अन्दर एक जैसे महान गुण निष्कामता, निर्मानता, उदासीनता, नेहचलता और पर उपकार आदि प्रकाश करते हुए पाए जाते हैं। यह महागुण ही अवतारी पुरुष के अन्दर हुआ करते हैं। बाकी प्रारब्ध अनुसार कोई योगी राजा के घर आकर इस प्रकृति को लेकर संसार में विचरते हैं कोई गरीबों के घर पैदा होकर ईश्वर आज्ञा में समय व्यतीत करते हैं। बाद में विचरने पर अपने आप ही लोगों के अन्दर इन महापुरुषों का असर होता चला जाता है। और भी राम कृष्ण से पहले कई राजे महाराजे संसार में हो गुजरे हैं उनका नाम क्यों नहीं लेते? उनके अन्दर यह महागुण अधिक रूप से प्रकाश हो रहे थे। राम का त्याग उदासीनता दिखाई पड़ती है, जब लंका को फतह करके राज तिलक विभीषण को देकर इवज (बदला) में कोई नज़राना नहीं लिया केवल फूल की माला द्वारा ही पूजा करवाई। आज तक ऐसा त्याग किसी ने नहीं दिखाया। इसी तरह कृष्ण थे सारी उम्र राजतख्त पर नहीं बैठे। गद्दी पर उग्रसैन नाना ही बैठे रहे। कई राजाओं को ऊपर नीचे किया लेकिन किसी का तख्त नहीं संभाला। क्या यह काफी नहीं? निर्मानता इतनी कि दुर्वासा गुरु को रथ में बिठलाकर रुक्मणी और कृष्ण ने खुद उसे खींचकर सारी द्वारका की सैर कराई फिर हाथ जोड़कर खड़े हो गए, “महाराज, और सेवा के वास्ते कृपा करें।” यह तो थी निर्मानता। फिर उदासीनता इतनी थी कि दिन में संसारियों की सेवा और रात को जंगल में रहना, अन्दर से किसी चीज में प्रीति नहीं थी। मूर्ख लोग महायोगी को महा भोगी के रूप में दिखाते हैं। नेहचलता, जैसे राज में खुश हैं वैसे ही शेषनाग पर चढ़े और खड़े बंसी बजाकर दिखा रहे हैं। हर वक्त अपने सरूप में स्थित रहना, सब कुछ प्राप्त होने पर मान नहीं। सुदामा जैसे भक्तों के चरण धोकर पी रहे हैं। पांडवों को सब कुछ फतह करके दिलवाया, उनसे कोई गर्ज पूरी नहीं की।
प्रेम प्यार से, विचार से जो नहीं समझा उसे तलवार से समझाया। नहीं समझा तो उसे खत्म करके फिर अलेप हैं। महापुरुष कपड़े पहनकर नहीं बनते, यह तो श्रद्धालु लोग पीछे बैठकर ऐसा करते आए हैं। तुम भी कल मूर्ति बनाकर ऐसा करने लग जाओ मना कोई थोड़ा करता है। हमेशा उन गुणों का विचार सामने रखना चाहिए और अपने अन्दर भी यह गुण लाने चाहिए। जब जब जिसके अन्दर यह गुण प्रकाशमान हुए वह ही गुरु, पौर, अवतार कहलाए, चाहे जिस देश विदेश में हों। ऐसी शुभ भावना वाले गुणी पुरुष ही संसार में अन्धकार को दूर करते आए हैं। जब-जब धर्म की हानि होने लगती है कोई न कोई प्रभु आज्ञा से हस्ती आ जाती है। प्रकृक्ति का रूप सदा एक जैसा किसी का नहीं हुआ, न कायम रहा। सब ग्रन्थों में महापुरुषों की महिमा भरी पड़ी है, इन गुणों को दिखा रही है। उनके जीवन देख-देख कर फिर सब जीव सत् धर्म को प्राप्त होने की ख्वाइश करते हैं और प्रेम सरूप में मिल-जुल कर समय व्यतीत करते हैं, फर्ज जानते हैं। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है। बार-बार ईश्वर आज्ञा में दृढ़ होना, अच्छे विचारों में लगे रहने से ही निष्काम भाव को प्राप्त होते हैं। केवल एक प्रभु सरूप को नित प्रकाश जानना और हर समय शरीर को नाशवान तसव्वर करना यह ही निर्मानता का रूप है। ज्यों-ज्यों अभ्यास में दृढ़ होता जाता है त्यों-त्यों आत्म विश्वास में दृढ़ता बढ़ती है, और आत्म विश्वास हो संसार की असारता यानि उदासीनता की तरफ ले जाता है। आत्म अभ्यास ही उदासीनता और नेहचलता की तरफ ले जाने वाला है। हर समय शरीर और संसार मिथ्या भासना और अनुराग विरह प्रेम सत् सरूप के वास्ते पैदा होना असली उदासीनता है।

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