Sansaar, Shareer , Jeev tatha Ishwer Ka Swaroop (संसार, शरीर, जीव तथा ईश्वर का स्वरूप ) ?

प्रश्न 1: देह और जीव का क्या सम्बन्ध है?

उत्तर: जीव और देह का सम्बन्ध मालिक और मकान के मुताबिक (अनुसार) है, अर्थात् शरीर रूप मकान में जीव रूप मालिक है। गीता में अधिभूत, अधिदेव, अध्यात्म स्वरूप प्रकृति का मालिक अधियज्ञ स्वरूप जीवन शक्ति का बयान है। इसका विचार करें।

प्रश्न 2: देह और संसार का क्या भेद है ?

उत्तर: देह और संसार का भेद कोई नहीं है अर्थात् देह धारण करने से संसार का निर्वाह चलता दिखाई देता है। देह के नाश होने पर जाहिरी (प्रत्यक्ष) संसार लोप हो जाता है। देह और संसार का एक ही रूप है। देह करके संसार है। असलियत में संसार कोई चीज नहीं है। जैसी जिसकी देह है वैसा ही उसका संसार है। इसलिए देह पर काबू पाने से संसार पर काबू पाया जाता है। यह निश्चय करें।

प्रश्न 3: महाराज जी, संसार क्या है ?

उत्तर: संसार शकूक (शंकाओ) का समुद्र है।

प्रश्न 4: मेरा इस संसार से क्या सम्बन्ध है ?

उत्तर: अज्ञानता वश जीव अहं बुद्धि धारण करता है। इस कारण ही संसार में फैला हुआ है। जब बुद्धि साधन करते-करते निःसंग अवस्था को प्राप्त होती है तो आत्म स्थिति द्वारा संसार गायब (लोप) हो जाता है। सब शकूक नाश को प्राप्त हो जाते हैं। जीव परम सत्य में लीन हो जाता है।

प्रश्न 5: महाराज जी, रामायण में भगवान राम के लिए आया है कि “चिदानन्दमय देह तुम्हारी”। कृपया इसे साफ करें।

उत्तर: प्रेमी, अवतारों और महापुरुषों का शरीर भी पांच तत्वों का होता है। यहां यह भाव नहीं है कि उनका शरीर सत्-चित् आनन्दमय था। इस भाव को आगे खोला गया होगा।

प्रश्न 6: प्रभु, कई विद्वान लोग कहते हैं कि अवतारों का शरीर पांच तत्वों का नहीं था। उनका शरीर दिव्य था या चिन्मय था?

उत्तर: प्रेमी, ऐसा नहीं है। सबका शरीर जो इस संसार में आया (पीरों अवतारों का भी) पांच तत्वों का था। लेकिन उनमें इतनी शक्ति होती है कि अगर चाहें तो शरीर को लोप कर सकते हैं।

प्रश्न 7: दशरथ के पुत्र राम जी हुए हैं। क्या उनका सिमरन करने से भी कल्याण हो सकता है?

उत्तर:
एक राम घट-घट बोले,
एक राम दशरथ घर डोले।
एक राम का सकल पसारा,
एक राम सब ही से न्यारा।।

बताओ प्रेमी, कौन से राम की भक्ति करना चाहते हो? पहले माया के चक्कर से छूटने की राह विचार करो।

प्रश्न 8: भवसागर क्या है?

उत्तर: शरीर के भोग ही भवसागर हैं।

प्रश्न 9: माया का क्या स्वरूप है ?

उत्तर: हर एक का शरीर ही माया है। आकारमई चीजें माया का स्वरूप हैं। माया ही भ्रम है।

प्रश्न 10: ग्रंथों में मतभेद क्यों है? कोई कहते हैं कि वास्तव में संसार नहीं है। दूसरे कहते हैं कि संसार परमात्मा का ही विकास है?

उत्तर: स्कूल या कॉलेज में एम०ए० तक क्लासें हैं। इल्म ही हर जगह पढ़ाया जा रहा है। दसवीं वाले भी इल्म पढ़ते हैं। कायदे (नर्सरी क्लास) वाले भी इल्म पढ़ रहे हैं। अपनी अपनी बुद्धि के विस्तार के मुताबिक सत्पुरुषों ने संसार के मुतल्लिक (बारे में) बयान किया है। आखिरी फैसला एक ही है। एक ही परमेश्वर हर जगह व्याप्त है। किसी ने कहा है कि हर चीज में ब्रह्म ही विचर रहा है। किसी ने कहा है कि मैं ही ब्रह्म हूं। यह तर्जे बयान (वर्णन शैली) में फर्क है। असलियत एक ही है। जितना बुद्धि को ऊंचा किया जावे उसी कदर ज्यादा अनुभव होता है। जैसे कृष्ण ने कहा है कि मैं ही सब प्राणियों को चला रहा हूं। फिर एक जगह गीता में कहा गया है कि न मेरे में कोई है और न मैं किसी में हूं। बल्कि मैं असंग हूं, निर्लेप हूं। यह बुद्धि की स्थितियां हैं। जितनी-जितनी बुद्धि आगे बढ़ती है उतनी उतनी ही समझ आप से आप आती जाती है।

प्रश्न 11: महाराज जी ईश्वर क्या है?

उत्तर: प्रेमी, कुल कायनात (संसार) में जो जीवन शक्ति चेतन सत्ता है, जिस करके हर शय (वस्तु), हर वजूद जिंदा है उसे ईश्वर कहते हैं।

प्रश्न 12: जीवात्मा यानी जीव किसको कहते है?

उत्तर: प्रेमी, निश्चय शक्ति यानी बुद्धि जो सारे शरीर रूपी संसार के निज़ाम की देखभाल कर रही है, जीव कहलाती है। इस शरीर में ही कर्म इन्द्रियां, ज्ञान इन्द्रियां और मन से बढ़कर परम तत्व बुद्धि को ही माना गया है। बुद्धि से परे आत्मा सबसे श्रेष्ठ सत्तत्व है। इस वास्ते उसको इन्द्रिय अगोचर महापुरुषों ने कहा है। प्रेमी, इस तरह तत्व ज्ञान का वर्णन किसी समय हुआ करता था। यह तालीम ही चित्त के खेद को हरण करने वाली है। इसी तरह विचार करते रहा करो।

प्रश्न 13: महाराज जी, ईश्वर का स्वरूप क्या है?

उत्तर: प्रेमी जी, ईश्वर एक स्थिति का नाम है जो ख्वाहिश और फेल यानि वासना और कर्म से न्यारी है यानी गुणातीत है।

प्रश्न 14: महाराज जी, भगवान् जो अजन्मा है, निराकार है उसका कोई स्वरूप, शक्ल और सूरत नहीं, कोई जिस्म नहीं, कोई हाथ नहीं, आदि आदि। लेकिन आपके ग्रंथ में जगह-जगह वाणी में चरण कंवल का अक्षर आया है। इस पद से आपका क्या तात्पर्य है?

उत्तर: प्रेमी, अन्दर जो सत्स्वरूप विराजमान है, जिसको तुम अभ्यास और सिमरण करते-करते अनुभव करोगे, उसको आदर भाव लिए हुए अपने आप को समर्पण करने की भावना से जो कहा जाता है, उसको चरण कंवल की तशबीह (उपमा) देकर समझाया गया है। परमात्मा का सिर तो आज तक किसी ने देखा नहीं, तो चरण कहां से होंगे? यह एक आजजी (नम्रता) का भाव है कि उस महान् सत्ता के सामने अपने आप को झुका डालना। जब जीव झुकता है तब चरण की तरफ ही पहले दृष्टि जाती है। इस वास्ते भगवान के प्रति जो कुछ भी विचार वाणी में प्रकट हैं वे आजज़ी और आदर के भाव को लेते हुए चरण कंवल के नाम से कहे गए हैं। इस असत् शरीर में जो सत् अविनाशी तत्त्व है, उसको संत लोगों ने चरण कंवल के नाम से पुकारा है। दूसरे भावों में इस दुःख रूपी शरीर में जो पूर्ण सुख रूपी तत्त्व है, उसी को संतों ने चरण कंवल का नाम दिया है।

प्रश्न 15: महाराज जी, ईश्वर का क्या स्वरूप है? मेहरबानी करके इस मसले को साफ करें।

उत्तर: प्रेमी, तुम्हें बहुत थोड़े में इसको साफ कर देते हैं। तसल्ली व नातसल्ली हालत से अबूर (मुक्ति) पाकर अपने आप के निज स्वरूप में स्थित होना ही ईश्वर है, दूसरा बुद्धि की निश्चल हालत ही ईश्वर है।

प्रश्न 16: महाराज जी, शास्त्रों में एक तरफ आत्मा को कर्त्ता मानकर सारी जिम्मेदारी उसके ऊपर डाल दी जाती है और दूसरी तरफ यह भी कहा गया है कि वह अकर्ता है। ये दोनों बातें एक दूसरे की विरोधी हैं, आप इस बारे में जरा साफ करने की कृपा करें?

उत्तर: प्रेमी, आत्मा के ही ये दोनों स्वरूप एक दूसरे के मुकाबले में जीवों की समझ के मुताबिक सत्पुरुष बयान करते आये हैं। असलियत में न वह कर्ता है न अकर्ता। जब तुम इस अवस्था तक पहुंचोगे तो सारा भेद तुम्हारे सामने खुल जावेगा। आत्मा को कर्त्ता मानना और अपने आपको निमित्त मात्र उसकी आज्ञा में देखना, अपने आप को निर्बन्धन करने का एक उपाय है। दूसरी तरफ ऐसा करते-करते बुद्धि जब उस अवस्था तक पहुंचती है, तब सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्व को समझने लगती है और वह देखती है कि गुण-गुण में बरत रहे हैं, आत्मा निर्लेप है, अकर्ता है। इससे और ऊपर जब बुद्धि पहुंचती है तो उसका स्थान और तवाज़न (संतुलन) इतना सूक्ष्म हो जाता है कि वह कर्त्ता और अकर्ता के टण्टे (झगड़े) से उठकर एक ऐसी स्थिति में पहुंचती है जिसका बयान नहीं किया जा सकता। यह स्थिति गूंगे का गुड़ है, जो स्थिति प्राप्त करके ही जाना जा सकता है।

प्रश्न 17: महाराज जी, जीवात्मा और आत्मा में क्या भेद है?

उत्तर: प्रेमी, जो बुद्धि अनानियत (अहंकार) में गिरफ्तार है उसको सत्पुरुषों ने जीवात्मा कहकर पुकारा है और आत्मा के बारे में जो कृष्ण ने गीता के दूसरे अध्याय में वर्णन किया है, वह यथार्थ है। उन्होंने कहा है कि आत्मा पृथ्वी के समस्त प्राणियों में व्याप्त है, तू इसको अविनाशी करके जान। इस अविनाशी तत्त्व का नाश नहीं होता, न ही यह पैदा होता है न मरता है, ऐसा भी नहीं है कि अब है और आगे नहीं होगा या नहीं हुआ था। इस आत्मा को न शस्त्र काट सकता है, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है और न जल गीला कर सकता है। यह मन तथा इन्द्रियों की पहुंच से परे है। यह सदा अजन्मा, नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है। आत्मा अव्यक्त है और विकार रहित है। जैसे एक सूर्य सारी पृथ्वी को प्रकाशित करता है वैसे ही आत्मा संपूर्ण शरीर को प्रकाशित करती है।

प्रश्न 18: महाराज जी, सत् असत् का किस तरह विचार किया जावे ?

उत्तर: दृष्टा दृश्य जिस कदर भास रहा है इस सारे प्रपंच को क्षणभंगुर विचार करो, क्योंकि यह नाना प्रकार का नाम रूप जगत जो देखने में आ रहा है हर घड़ी हर लम्हे बदल रहा है। यह सब असत् है। वक्त पाकर यह सब नाश को प्राप्त हो जाता है। जो चीजें दूसरे के आधार पर हैं सब असत् हैं। जो चीज स्वभाव सहित है वह असत् है। यह पांच तत्व की प्रकृति जो गुण सहित है, यह ही माया का रूप है, सदा बदलती रहती है इस वास्ते यह सब असत् है। यह दृश्यमान संसार तृखावंत और अशान्त स्वरूप है। अज्ञानता के कारण जीव असत् को सत् मान रहा है और दिन रात भटक रहा है। इसे कोई तसल्ली का रास्ता दिखाई नहीं देता। प्रेमी, तुम्हें सत् की खोज की क्या पड़ी है तुम्हारी सेहत अच्छी है, धन दौलत में कमी दिखाई नहीं देती। स्त्री बच्चे और भी सुख भोग मौजूद हों तो वह सत् की तलाश नहीं कर सकता। पहले सब सुख को तिलांजली दो तब सत् का पता लगेगा। सत् को ईसा ने समझा, मंसूर ने जाना, मुहम्मद ने पाया, मोरध्वज, राम, हरीशचन्द्र, गुरु गोबिन्द सिंह, मीरा आदि सत्पुरुषों, गुरु अवतारों ने समझा। इस देश में अनगिनत सत् के मुतलाशी (जिज्ञासु) हुए हैं। यह जितने वेद शास्त्र ग्रंथ आदि आज के भंडार देखते हो सब सतवादी पुरुषों की रचना है।

सत् का मंडन पाखंड खंडन सतपुरुष जग आए।
पाप विखाद का नाश करन ते केते दुख उठाए ।।

सत् की खोज करने वालों के सम्बंध में जितना कुछ सुना समझा जावे उतना ही थोड़ा है। उद्यम धारण करो। सत् को सिमरो तो सत् को पा सकोगे। आम जीवों की तरह पच पच कर मत मरो। संसारी सुखों की प्राप्ति के लिए जीव चिरकाल से यत्न करते चले आ रहे हैं, किसी को आज तक तसल्ली नहीं हुई। हाय हाय करके खत्म हो गए, उनके नामों निशान मिट गए। जिन्होंने सच्चाई का रास्ता इख्तियार (धारण) किया वह खुद अमर हो गए और आने वालों के लिए रास्ता बना गए। आपको चाहिए कि गुणी पुरुषों का जीवन विचार करके अपने आप को सच्चाई के मार्ग पर दृढ़ करें। शारीरिक सुखों से ऊपर उठो। इस समय तुमको मौका मिला है इसका लाभ उठाओ, फिर शायद आने वाले समय में तेरे रास्ते में कई रुकावटें आ जाएं। आज बहुत सुखी है कल दुख भी आ सकते हैं, कभी एक जैसा समय नहीं रहता।

प्रश्न 19: महाराज जी, ब्रह्म किसे कहते है? उसे कैसे जाना जा सकता है?

उत्तर: तेरी अपनी ही एक स्थिति यानी हालत का नाम ब्रह्म है। जब तू उस स्थिति को सिमरण अभ्यास एवं योग द्वारा जान जाएगा, तू ही ब्रहम स्वरूप हो जाएगा और तुझे सारे भेद का पता लग जावेगा। प्रेमी, जब प्राचीन काल में ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों से कोई ऐसा प्रश्न कर देता था तो वे केवल खामोश रहते थे, कोई उत्तर नहीं देते थे, क्योंकि इन्द्रियों द्वारा जिस हालत का बोध न हो सके, और जो मन-बुद्धि से परे हो, ऐसे परम तत्व के बाबत कोई जबान द्वारा क्या बयान करे? जो केवल अनुभव मात्र का विषय है उसे कैसे समझा जा सकता है। बुद्धि जब आत्मा में लीन होती है तब स्वयं ही ब्रह्म स्वरूप हो जाती है।

प्रश्न 20: महाराज जी, चतुर्भुज भगवान नारायण शेषनाग पर विराजमान हैं-इस से क्या भाव है

उत्तर: प्रेमी, यह सब अन्दरूनी (आन्तरिक) अवस्था का वर्णन है। नाभि कंवल को शेषनाग करके दर्शाया गया है और नाद् शब्द को नारायण का रूप दिया गया है क्योंकि शब्द स्वरूप भगवान् की अनुभवता नाभि कंवल से होती है

प्रश्न 21: महाराज जी, शब्द का खुलासा करने की कृपा करें।

उत्तर: प्रेमी, शब्द ही जीवन शक्ति है। उसी को आत्मा, ब्रह्म, नाद इत्यादि नाम करके वर्णन किया गया है। शब्द आत्मा का स्वरूप है। वह अगोचर है।

प्रश्न 22: महाराज जी, ईश्वर का असली नाम क्या है?

उत्तर: प्रेमी, ईश्वर के नाम सत्पुरुषों ने ग्रन्थों में कई तरह बयान किए हैं। जैसी-जैसी प्रभु की महिमा विचार में आई वैसा-वैसा नाम धरते गए। वास्तव में असली नाम कोई नहीं। वह अनामी है।

प्रश्न 23: ईश्वर और जीव में क्या भेद है?

उत्तर: पहले शरीर को समझोगे तब इस नुक्ते का हल होगा। जिस वक्त शरीर को कष्ट होता है, उसमें से वाणी उठती है कि मुझे तकलीफ है। अगर कोई शरीर का अंग टूट जाता है तो कहता है मेरा अंग टूट गया है। इससे मालूम हुआ कि शरीर में एक चीज है जो इस शरीर को मेरा मेरा कहती है, जैसे मेरी आखे, मेरे हाथ, मेरे रिश्तेदार, मेरा कुनबा वगैरा। इससे साबित हुआ कि मेरा कहने वाला दरअसल शरीर से अलैहदा है। वरना वह कहता कि वही शरीर है, न कि ‘शरीर मेरा है’। जो शक्ति शरीर के कर्मों की अभिमानी है उसको जीव कहा गया है। जो शरीर के कर्मों दुःखों -सुखों को महसूस करती है वह ही जीव है। जब तक बुद्धि शरीर की ममता में है तब तक ईश्वर का बोध नहीं हो सकता। सत्पुरुषों की वाणी और शास्त्रों को पढ़कर मानता है मगर अन्दर से न प्रीत है, न प्रतीत। जब तक अन्तर विखे (अंतर्गत) बुद्धि शरीर के दुःखों में गिरफ्तार है, उसको अनुभव नहीं कर सकती। लेकिन जब बुद्धि गंभीर हो जाती है और शरीर के दुःखों और सुखों से अबूर (छुटकारा) पा जाती है, तब उसको बोध हो जाता है कि शरीर तत्वमयी है, मैं शरीर से भिन्न हूं, शरीर किसी खास शक्ति पर चल रहा है। जब शरीर और शरीर की ममता से अलैहदा (विलग) होता है तब वह परम तत्व अन्दर प्रगट हो जाता है। वास्तव में ईश्वर और जीव में कोई भेद नहीं है। विज्ञान को पहुंचा हुआ ईश्वरवादी है। संसार को जीतने वाला वही है जो शरीर को जीतने वाला है। शरीर की ममता से आज़ाद होना ही सही मार्ग है। जब इस पर पूरा कण्ट्रोल हो गया, तब वह सब दुनिया का मालिक हो गया। चक्रवर्ती राजा भी ऐसे गुणी पुरुष की गम्भीर अवस्था को देखकर उसके चरणों में झुकते हैं।

प्रश्न 24: महाराज जी, समता का असली अर्थ क्या है?

उत्तर: ‘समता’ का असली अर्थ यह है कि हर हालत में एक रस रहना, ग्रहण और त्याग की कामना से मुक्ति हासिल करनी…….। समता ईश्वरीय शक्ति का यथार्थ स्वरूप और गुण है। समता स्वरूप ईश्वरीय सत्ता सदैव काल एकरस होकर विचरती है। किसी वस्तु का विखेप (विक्षेप) उसको स्पर्श नहीं कर सकता यानी त्रिकाल आनन्दसरूप है। इसी समताभाव को जब जीव अन्तरविखे अनुभव करता है, तब उसके सब बन्धन कर्म नाश हो जाते हैं और अचल शाँति को प्राप्त होता है।

प्रश्न 25: महाराज जी, कैसे यकीन किया जाए कि आत्म-शक्ति सब जगह मौजूद है। शरीर में वह शक्ति काम करती हुई आंखों से नज़र नहीं आती। कृपा करके इसे ऐसे तरीके से समझायें कि यह समझ आ जाए?

उत्तर: प्रेमी, रोज़ाना तुम्हारे तजुर्बा में यह बात आ रही है कि यह दूध जिसे तुम देखते हो, क्या उसमें घी दिखाई देता है? दूसरे मेहन्दी के पत्ते शायद तुमने सूखे या हरे देखे होंगे, क्या उनमें लाली नज़र आती है? चकमक एक किस्म का पत्थर होता है, उसमें या माचिस या दियासलाई में क्या आग दिखाई देती है? गन्ना तुमने देखा होगा क्या उसमें मिठास यानि गुड़ दिखाई देता है? चीनी भी इसमें से निकलती है। अनुभव द्वारा समझने वाली इन सब चीजों में घी, लाली, अग्नि, मिठास इन आंखों से नहीं देखी जा सकती है लेकिन अंतरविखे बुद्धि, ज्ञान इन्द्रियों द्वारा हर घड़ी इन कोटों चीज़ों में विचार कर रही है। कभी भी गलती नहीं लग सकती। इसी तरह ज्ञानी संसार में हर समय ईश्वर को ज्ञान नेत्रों द्वारा अनुभव कर रहा है। अज्ञानी को जहां पत्थर दिखाई दे रहा है, भक्त को उसमें भगवान नजर आता है। पंडित ने धन्ना भक्त से मखौल किया, तोलने वाला पत्थर दे दिया कि इसकी पूजा किया कर। धन्ने ने उसमें भगवान को पा लिया। मतलब यह कि जिस कद्र दृढ़ विश्वास हो जाए तो हर चीज़ में वह उस परम शक्ति का विचार करते हुए चलेगा। ऐसा समझकर कि वह जीवन शक्ति उसी तरह हर शरीर के अंदर रोम-रोम को शक्ति दे रही है, वह उसे अनुभव करेगा। जिन्होंने इस शरीर के अन्दर उस परम सत्ता को अनुभव किया, उनको ही भक्त, ऋषि, मुनि, गुरु कहा जाता है। जिस तरह साधन द्वारा घी, अग्नि, लाली, मिठास प्राप्त होती है, उसी तरह शरीर के अंदर भी वैसे ही साधन द्वारा उस परम ज्योति का साक्षात्‌कार होता है। तुम जिस समय सही कोशिश करोगे, अपने अंतर विखे आत्म सत्ता को अनुभव कर सकोगे।

प्रश्न 26:महाराज जी, ऐसा कहा गया है- ‘ईश्वर अंश जीव अनिवाशी, चेतन अमल सहज सुखरासी’ अर्थात् जीव शुद्ध ब्रह्म है। वह अज्ञानी कैसे हो गया ?

उत्तर: अंश जीव अनिवाशी, चेतन अमल सहज सुखरासी’ अर्थात् जीव शुद्ध ब्रह्म है। वह अज्ञानी कैसे हो गया ?
उत्तर : [यदि ब्रह्म को सर्वज्ञ मानें तो यह मानना पड़ेगा कि अज्ञान जीव में है, न कि ब्रह्म में। तब कमी जीव में मानी जायेगी, न कि ब्रह्म में। उस स्थिति में जीव और ब्रह्म के भेद को मानना पड़ेगा। उस हालत में ब्रह्म की अनन्तता न रह पायेगी। यदि ब्रह्म को परिपूर्ण मानें तो जीव और प्रपंच की सत्ता के अभाव का प्रसंग आता है। परन्तु जीव और संसार की अनुभूति हो रही है, इसलिये इनकी नितान्त असत्ता का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि जीव और संसार को भ्रम रूप मानें तो प्रश्न उठता है कि यह भ्रम किसे हुआ-जीव को या ब्रह्म को ? यह पुरातन काल से चली आ रही बहस है। इस बहस के सम्बन्ध में गुरुदेव ने उत्तर दिया। यह सब दलीलबाज़ी है। जब तक अपना अनुभव न हो तब तक यह भ्रम निकल नहीं सकता। आखिरी फैसला यह है कि भ्रम स्वरूप सब संसार है। वास्तव में एक ही शक्ति कई सूरतों में दिखाई देती है।… अज्ञान में ये सूरतें दिखाई देती हैं। जब अज्ञान दूर हो गया सब भेद नाश हो गया।……..
दलील-बाज़ी सब व्यर्थ है। हस्ती (अस्तित्व, सत्ता) की तलाश करो और हस्ती के विश्वासी बनो। ‘ब्रह्म को भ्रम हुआ, या जीव का भिन्न रूप है’, यह सब वहम है। फ़नाह (मृत्यु) और बक़ा (जीवन) की तहकीकात (खोज) करो। बका में फनाह न पाओगे, लेकिन फनाह में बका को हासिल कर सकोगे। यह ही आश्चर्य है। माया में ब्रह्म परिपूर्ण है लेकिन ब्रह्म में माया का भेद नहीं है। इस मसले (समस्या) को हल करते-करते सब मर गये, मगर बुद्धि और विचार की दौड़ से इसका हल नहीं मिला ।……….
“सब चक्र फाइलियत (कर्तृत्वभाव) का चल रहा है और फाइलियत (कर्त्तापन) कर्म की कैद में खड़ी है। असलियत में न कर्त्तापन है और न ही कर्म है।” अज्ञान यानी अहंकार की दो सूरतें हैं। मन जब कर्म की कैद में आया तब कर्त्ता (फाईल) होकर उत्पत्ति और प्रलय को देखा, जब कर्त्तापन को छोड़ा, तब न कर्म (फेल) रहा, न सज़ा न जज़ा [दुःख-सुख रूप कर्मफल]। इस वास्ते कर्त्तापन कर्म करके और कर्म कर्त्तापन करके हैं। साक्षी शक्ति इससे अलहदा (भिन्न) है, जो कर्म और कर्त्तापन को महसूस कर रही है। कर्म और कर्त्तापन का नाम ही अज्ञान यानी भ्रम है। जब अपने असली स्वरूप को जान लिया तब सब छाया गायब हो गई। इस मसले को कोई हल न कर सका कैसे कर्ता हुआ क्यों हुआ और कौन हुआ। महापुरुषों ने अपने-अपने विचार द्वारा इन हालात को ब्यान किया है। आखिर सबने हस्ती (सत्ता) को माना, किसी ने उसे कर्त्ता माना, किसी ने अकर्त्ता माना, किसी ने उसे इनसे अलग (अलहदा) करके माना। हर सूरत में एक ही सूरत का करिश्मा (चमत्कार) है। उसी में सब कुछ है और सब कुछ वही है-इस मसले में आकर सब गर्क हो गये।
“अपनी कल्पना से संसार है, अपने अकल्पित होने से खुद आप ही है। इस वास्ते अकल्पित होने के साधन करें…….। जिस्म और जान का विचार करें कि तुम्हारा रूप जिस्म (शरीर) है कि जान (जीवनशक्ति)। अगर जिस्म है तो तुम एक बाल भी नहीं बना सकते, अगर जान मानो तो उसे पहचान नहीं सकते। इस वास्ते अपनी असलियत की तहकीकात करो कि तुम क्या हो और सब वहमों को छोड़ दो। इस जुस्तुजू (प्रयास) से सब हालत को पाओगे।…
“अगर ईश्वर को मानो तो वह एक बात है, अगर अपनी तलाश करो तो वह ही बात है। एक ही असलियत हर रंग में है। तड़प ही ज़िन्दगी है, बेतड़प मुर्दा है। सच्चाई की तलाश ही सच्चाई और शान्ति है, सच्चाई का भूलना ही गफलत (अविद्या) और अज़ाब (दुःख) है।”

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