Manav Jeevan ka Dhyey(मानव जीवन का ध्येय)

प्रश्न 92: मनुष्य जीवन का ध्येय क्या है?

उत्तर: मनुष्य जीवन का मकसद (ध्येय) निर्भय शान्ति है अर्थात् ऐसी खुशी जिसमें तबदीली (परिवर्तन) का डर न हो। यह तब ही हासिल हो सकती है जब जिस्म की तहकीकात (छानबीन) करके उसके अन्दर जो जीवन शक्ति है उसे मालूम किया जावे। यह जीव अज्ञान की वजह से हक कित (वास्तविक) शान्ति की तलाश अपने अन्दर करने के बजाए संसारी पदार्थों में कर रहा है। चूंकि संसार की सब चीजें फानी और नापायदार (नश्वर एवं क्षणिक) हैं इसलिए उनसे मिलने वाले सुख भी फानी और नापायदार होने की वजह से दुःख और अशान्ति का मूजब (कारण) बन जाते हैं। जो जीव सुख चाहता है उसे चाहिए कि अपना सुख दूसरों पर निसार (न्योछावर) करे। इससे उसे सुख मिल जावेगा।

प्रश्न 93: मनुष्य जीवन की सार क्या है?

उत्तर: सत् स्वरूप की तलाश ।

प्रश्न 94: मनुष्य शरीर धारण करने का परम लाभ क्या है?

उत्तर: शरीर रूपी संसार को धारण करके हरएक जीव शारीरिक भोगों की आसक्ति में विचर रहा है। जैसे-तैसे भी भोग प्राप्त किए जाते हैं, उतनी ही अशान्ति बढ़ती जाती है। इन्हीं हालात के मुताबिक जैसे एक चक्रवर्ती निरासा और प्यासा है, ऐसे ही एक दलिद्री भी अपनी अशान्ति में विचर रहा है। यानी जो भी शरीरधारी देखने में आ रहा है वह अपने आप में नित ही अधीर और अशांत है। ऐसे अन्धकारमयी जीवन के पूर्ण भेद को समझ करके सत्-शान्ति प्राप्ति का निर्मल प्रयत्न धारण करना ही मानुष देह का परम लाभ है।

प्रश्न 95: महाराज जी, कामयाबी किस तरह मिल सकती है? मतलब यह कि संसार में विचरते हुए नित नई फिक्र चिंताए बनी रहती हैं, और भी कई विकार खड़े हैं।

उत्तर: पहले अपनी बीमारी की अच्छी तरह जांच कर लो, फिर उसका इलाज भी हो जाता है। जो अपनी बीमारी को समझता ही नहीं वह उसे कैसे ठीक कर सकता है। इस बीमारी में सब शरीरधारी खड़े हैं। तुम सब ईश्वर विश्वासी बनो। बच्चों वाले विचार छोड़कर, नेक अमल, सत्कर्म धारण करें। जिन कर्मों से मन की अशांति बढ़ती है उनको छोड़ दें। इस मानुष देह का असली मकसद जानें। जब जान लोगे तब कहीं सही सोच वाले बनोगे। इस मानुष देह को धारकर सिर्फ भोग प्राप्ति के वास्ते यत्ल करते रहना, यह सही यत्न नहीं है। इस जामे की विशेषता यह ही है कि अपने आप की पहचान करे। यह जाने कि कहां से आया है, किधर जाना है और क्या कर रहा है। ईश्वर क्या है, संसार क्या है, आत्मा क्या है, जिस्म क्या है। आत्मा, शरीर का सम्बन्ध कितनी देर चलेगा। अन्तर विखे जो वासना उमड़ रही है, यह किधर ले जा रही है। इसकी निवृत्ति कैसे होगी। प्रेमी बहुत से विचार सोचते समझते हैं। पहले क, ख पड़ो। मतलब यह कि सादगी धारण करो। सत्य बोलो, सेवा करो। सत्संग में आया करो, और फिर आहिस्ता आहिस्ता किसी गुरु, पौर, अवतार का आधार पकड़ो। आलस छोड़कर सत् पुरुषार्थ धारण करो। इसकी कल्याण एक दो बातों से नहीं हो जाती। इसके सुधार के वास्ते बड़े दिल की जरूरत है। यह मन सांसारिक सुखों की तरफ जल्दी दौड़ता है। जो बात मन में पक्की हो जाती है उधर ही बुद्धि, शरीर भी लग जाते हैं।
चोर कुत्तिया मिल गए पहरा किसका दे
हर वक्त कल्याण के वास्ते सोचते रहो। अंतर विखे जो चोर बैठे हुए हैं पलक-पलक विखे इनसे बचाव करना है। बार-बार सोचो ज़िन्दगी किस वास्ते मिली हुई है। बगैर ईश्वर की खोज के ममता का गुबार खत्म नहीं हो सकता। इस संसार को अश्चर्ज रचना से अबूर (छुटकारा) पाना कोई आसान नहीं। जिन्होंने अपने आप पर काबू पा लिया है उनकी नजदीकी हासिल करो, तब ही तृष्णा रूपी नदी को पार कर सकोगे। इतनी बातें समझाने वाला कोई मुश्किल से ही मिलेगा। ईश्वर नित सत् है, संसार नित झूठ और दुःख रूप है।

प्रश्न 96: महाराज जी, संसारी जीवन में तो ईश्वर की याय नहीं हो सकती है, इसके वास्ते जिज्ञासु को क्या कदम उठाना चाहिए?

उत्तर: ‘परमेश्वर ते भुलयां व्यापन सधै रोग’, मूल वस्तु को भूल जाना एक महान भूल है। अगर कोई साहूकार मूल धन को भूल जाए तो सूद या व्याज उसे कोई क्या देगा। परमात्मा उसकी मदद करता है जो उसका ध्यान करता है। जब तुमको मूल का ही पता नहीं, ईश्वर की याद कैसे बन सकती है। प्रेमी, जीवन में सबके साथ मिलजुल कर रहना, खाना, पोना, उठना, बैठना और धन वगैरा कमाकर शारीरिक भोगों को भोगना ही महाकार्य नहीं है। जीवन के लक्ष्य का विचार करना चाहिए। इसका विचार करके परम पदार्थ की प्राप्ति का पूर्ण यत्न करना चाहिए। सत्संग में आया करो। जो श्रवण करो उस पर अच्छी तरह विचार करो और उसे धारण करो।

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