Ishwer Vishwaas aur Shradha(ईश्वर विश्वास और श्रद्धा)

प्रश्न 97: ईश्वर के साथ मेरा क्या सम्बंध है? क्या मेरे कसूर या गुनाह केवल उसकी खुशामद से बख्शे जा सकते हैं। अगर नहीं, तो ईश्वर से क्या मांगना चाहिए? अगर की गई गलती का फल भुगतना है तो ईश्वर से करना तो जरूरी है। उससे प्रेम क्यों?

उत्तर: ईश्वर एक शक्ति है जो हर वक्त आनन्द स्वरूप है और हर एक सिफ्त (गुण) में पूर्ण है और शाश्वत है। वह दुनियावी राहत और रंज से मुबर्रा (अलग) असली खुशी है। हर एक ताकत का मखज़न (स्रोत) है। इसके मुकाबले में जीव माया की गिरफ्तारी में आकर हर एक तकलीफ में मुब्तला (ग्रस्त) रहता है यानी किसी हालत में भी रंजोगम से छूट नहीं सकता। पैदायश से लेकर मरने तक असली खुशी की तलाश करता रहता है मगर आखिर सब रायगी (व्यर्थ) हो जाता है। दुनिया से बेकरार और बेज़ार हो जाता है। इस बेज़ारी और बेकरारी से अबूर पाने की खातिर ईश्वर की भक्ति और रियाज़त है।
जब तक ईश्वर का विश्वास न धारण किया जावे तब तक झूठी दुनिया की तमन्ना कम नहीं होती बल्कि बढ़ती जाती है और दिन-रात बड़ी से बड़ी कोशिश करके गफलत (अज्ञान) की गिरफ्तारी में आ जाता है। अज्ञानवश होकर वह असली खुशी को पहचान नहीं सकता। यह ही दुनिया की बेज़ारी है। राजा भिखारी, त्वांगर कंगाल सबकी बेज़ारी (व्याकुलता) एक जैसी है यानी ख्वाहिशात (कामनाओं) की आग हर एक को जलाती है। इच्छित वस्तु को हासिल करके भी जीव शान्ति को नहीं पाता और उसके नाश होने से जीव अधिक दुखी होता है। इस वास्ते दुनिया एक रंजोगम की जगह है। ज्यों-ज्यों दुनियापरस्ती में गिरफ्तार होता जाता है त्यों-त्यों अति क्लेशवान होता है। आखिर कालिबे अन्सरी (नश्वर शरीर) को छोड़कर फिर दूसरे कालब (शरीर) की गिरफ्तारी में आ जाता है।
यही हालत बनी रहती है जब तक कि अविनाशी खुशी यानी ईश्वरीय शक्ति के साथ मिलाप न कर लेवे। जीव ईश्वर शक्ति का जुज्य (अंश) है। इस वास्ते यह अपने कुल स्वरूप के जाने बगैर कभी भी ख्वाहिश के अजाब से छूट नहीं सकता। मन की इस बेकरारी को दूर करने की खातिर अपने कुल स्वरूप यानी ईश्वर की प्रस्तिश (पूजा) है। जिस वक्त ईश्वर का विश्वास दृढ़ हो जाता है, उस वक्त फुनाह (नाशवान) जाल से मुख्लसी हासिल करता है। पैदायिश और फनाह (जन्म और मृत्यु) से छूटने की खातिर ईश्वर भक्ति है। बाकी दुनियावी पदार्थों को खातिर जो भक्ति करता है वह जहालत (अज्ञान) है। जो कुछ भी जीव ने नेकी-बद (शुभ-अशुभ) कर्म किया है उसका इवजाना (फल) जरूरी मिलता है, ख्वाहे (चाहे) इबादत करे ख्वाह न करे। ईश्वर की भक्ति विशेष रूप से इस वास्ते की जाती है कि आर्यों दुख-सुख में समता बनी रहे। हर हालत में धीरजवान रहे और ख्वाहिश के अज़ाब से छूट मिले। यही दर्जा निजात (मुक्ति की स्थिति) का है।
जिन लोगों ने ईश्वर की बन्दगी की उनका जीवन विचार कर सकते हो कि किस तसल्ली में उन्होंने राहत व रंज (सुख और दुख) को बरदाश्त किया। यही हालत असली खुशी की है जिसमें आर्यों खुशी व गुमी की मदाखलत (हस्तक्षेप) नहीं। इसी शान्तिमय हालत को हासिल करने की खातिर भक्ति है। जब तक इस हालत को आप प्राप्त न कर लेवें तब तक खुशी व गमी यानी पैदायिश व फनाह के दायरे से नहीं निकल सकते।
ईश्वर शक्ति काल और कर्म से मुबर्रा (मुक्त) है यानी हर हालत में पूर्ण आनन्दस्वरूप है। जीव हर हालत में काल और कर्म की गिरफ्तारी से भयभीत रहता है। इस अज़ाब से छूटने की खातिर अपने कुल स्वरूप से प्रेम और उसको प्राप्ति की जरूरत है। वह ही हालत परमानन्द की है।
दुनियावी सुख (इन्द्रिय भोग) असल में अज़ाब (दुख) हैं। न भोग स्थिर रहते हैं, न मन, इन्द्रियां स्थिर रहती हैं। इस वास्ते झूठा लालच हर वक्त बेसबरी और लाचारी के देने वाला है यानी अधिक भोग पदार्थ हासिल करके भी सबर (संतोष) नहीं होता, ज्यादा हो दुखी होता है। इस घोर दुख को विचार करके महापुरुषों ने उस परम शक्ति का आसरा लिया है जो हमेशा दायम व कायम है और आनन्दस्वरूप है।
जीव देह के सुखों को सत् जानकर हर वक्त मुस्तगर्क (लवलीन) रहता है। जब देह नाश हो जाती है तब सुख कहा? बेज़ारी ही बेज़ारी है। इस दुःख को महसूस करके यानी फनाह के दायरे से निकलने की खातिर ईश्वर की प्रस्तिश है।
जीव देह के भोगों में गुलतान है मगर देह का एक बाल भी नहीं बना सकता। बताओ जो चीज दूसरी ताकत के सहारे है, वह कहां तक सुख दे सकती है। इस वास्ते इस ख्वाबे गफलत (अज्ञानता) को छोड़कर अपने असली हकीकी मालिक की तलाश आशिकों ने की। वजूद (शरीर) एक फ्लाह (नाश) होने वाली चीज है। उसका मोह अधिक दुःख रूप है। इस वास्ते वजूद को जो जिन्दा रखने वाली ताकत है उसको हासिल करना असली खुशी है। जिस ताकत के सहारे यह अनासर (तत्त्वों) का वजूद चलता है और रंग-रंग के अजायबात (स्वरूप) दिखाता है, उस ताकत की तलाश करना ही असली मकसद (ध्येय) है।
ईश्वर सत् है और दुनिया मिथ्या है। इस वास्ते सत् की तलाश असली खुशी है और झूठ की मुहब्बत असली रंज है। ईश्वर से मांगना सिर्फ धीरज और शान्ति चाहिए जो इस अजाब से निजात देवे, और मादी (भौतिक) पदार्थ जीव अपनी कल्पना से हासिल कर सकता है। मगर यह सख्त रंज के देने वाले हैं। गौर करके विचार करें। तमाम कायनात (प्रकृति) का जो आधार है उसकी तहकीकात (खोज) कायनात के रंजोगम से छुड़ाने वाली है। इस वास्ते उस मालिक को बन्दगी की जाए।
असली खुशी जो हमेशा एकरस है वह ईश्वर का स्वरूप है जो हर एक के अन्दर चमक रहा है। इस वास्ते देह के भोगों से आजाद होकर उस ईश्वर की तलाश करनी चाहिए, जिससे सब शरीर की कला का काम चलता है।
जीव बड़ाते खुद (अपने आप) रंज के असबाब (कारणों) में मुस्तगृर्क (डूबा) रहता है। अपने मालिके कुल की बन्दगी से उस अज़ाब से छूटकर हमेशा की खुशी हासिल कर लेता है। मनुष्य जन्म का यही अधिक लाभ है:-

सत ठाकर मन ध्याओ, सम्पत यह तत् सार ।
“मंगत” पावे परम गत, काल से भयो छुटकार ।।
प्रश्न 98: महाराज जी, ईश्वर को मानने से क्या आराम मिलता है और न मानने से क्या तकलीफ मिलती है?

उत्तर: प्रेमी, ईश्वर के मानने से इन्सान विकारी जीवन से बचकर सदाचारी जीवन को अपनाता है और असली दायमी (स्थायी) शान्ति को हासिल करता है। ईश्वर को न मानने से यह जीव संसारी सुख-दुःख में फंसकर नित ही अशांत और अधीर रहता है।

प्रश्न 99: महाराज जी, आपकी बड़ी कृपा होगी यदि आप हमें अपना सत् विश्वास बख्शें। आप हर पत्र में लिखा करते हैं प्रभु तुम्हें स‌त्विश्वास देवे। परन्तु महाराज जी बात कुछ बन नहीं रही। कहीं त्रुटि अवश्य है।

उत्तर: हा प्रेमी, त्रुटि अवश्य है। इसके वास्ते नानक देव की बताई हुई कुरबानी देनी पड़ेगी। बाबा नानक जी कहते हैं:

जिसकी वस्तु तिस आगे राखे ।
प्रभु की आज्ञा माने माथे ।।

प्रश्न 100: महाराज जी, ईश्वर विश्वास की कसौटी क्या है?

उत्तर: प्रेमी, बड़ी गम्भीर परीक्षा है। ईश्वर विश्वास में पक्का इन्सान लाभ और हानि में एक बराबर रहता है। मालिक की मर्जी में (राजी-व-रजा) रहने की आदत पूर्ण और पक्की हो जाती है। चाहे वह राज पर बैठे, वहां भी वह हर्षित नहीं होगा और यदि गहरी मुसीबतों को प्राप्त हो जावे तो वहां भी उसे दुःख नहीं होगा।

प्रश्न 101: महाराज जी, ईश्वर में वृढ़ विश्वास कैसे पक्का हो?

उत्तर: प्रेमी, दृढ़ विश्वास तीन प्रकार से पक्का हो सकता है:
कहीं से भी
(1) संसार के कष्ट कर्म-चक्र वश तुझ पर ऐसे आ जायें कि तुझे किसी सहारे की सूरत नज़र न आवे, तो उस समय ईश्वर पर निश्चय पूरा बैठता है।
(2) यदि बुद्धि पवित्र हो अर्थात् विकारों की अग्नि से कुछ आर्जी तरीके से ठंडक पाई हो अर्थात् पक्की न हो, तो संत, सत्पुरुषों द्वारा यह दृढ़ निश्चय में पक्की हो सकती है।
(3) किसी प्रकार से शरीर के नाश होने का निश्चय तबीयत में बैठ जाये। जिसके अंदर शरीर के नाश होने का निश्चय बैठ गया है वह दुनिया की शान व शौकत और उसके स्वादों से उपरस हो जाता है।
प्रेमी, तमाम श्रुति, स्मृति, वेद, शास्त्र, धर्म मज़हब, पंथ को पढ़ने और जानने का सार यह है कि बुद्धि अपने इस शरीर रूपी मकान की कैद से छुटकारा पाने की कोशिश करे। लाल जी। ये दुनिया के रोग कभी समाप्त नहीं होंगे और न ही दुनिया के काम समाप्त होंगे। तुम्हें पहले अपना इलाज करना चाहिए। सारे संसार का कल्याण इसी में छुपा हुआ है। चाहे कैसी भी मुसीबत या परेशानी आवे, चाहे दुनिया का कुछ भी क्यों न हो जावे यानी दुनिया उलट-पुलट क्यों न हो जावे, तुम्हें चाहिए कि दुनियावी कामों के लिए अपना समय निश्चित करो। उस समय के अतिरिक्त कभी भी दुनियावी कर्मों में अपने आपको न फंसाओ। बाहर एक फट्टा लगा दो कि अमुक समय तक मिल सकते हैं, अमुक समय से अमुक समय तक किसी अवस्था में भी नहीं मिल सकते। तब प्रेमी, कुछ कल्याण की सूरत बनेगी।

प्रश्न 102: महाराज जी, यकीन (विश्वास) के बारे में जरा खोल कर समझावे?

उत्तर: प्रेमी जी. विश्वास की पांच अवस्थायें होती हैं। पहली अवस्था में मनुष्य अपने शरीर के भोगों पर एकमात्र विश्वास करता है। अर्थात् भोगों के सामान को एकत्र करने के वास्ते हर प्रकार की खोज धारण करता है और तमाम जीवन उचित और अनुचित को एक तरफ रखकर भोगों के साधन इक‌ट्ठा करने में ही लगा देता है। इस प्रकार के मनुष्य अधिकतर मिलेंगे। दूसरे विश्वास की अवस्था यह है कि भोगों की उचित प्राप्ति पर विश्वास किया जाता है। अर्थात् भोगों की प्राप्ति तो मनुष्य चाहता ही है परन्तु उसकी बुद्धि जायज़ और नाजायज (उचित व अनुचित) को समझती है और अनुचित छोड़कर उचित पर अपने आपको टिकाती है। यह अवस्था विश्वास की पहली हालत से ऊंची है और इस प्रकार के व्यक्ति कम देखने में आते हैं। तीसरी अवस्था विश्वास की यह है कि भोगों को नाशवान समझकर उनसे घृणा करना। इस प्रकार के विश्वास की अवस्था के व्यक्ति सब प्रकार के भोगों से वैराग्य रखते हुए उन से ऊपर उठने की चेष्टा करते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति बहुत कम दृष्टि में आते हैं। चौथी अवस्था विश्वास की यह है कि एक मात्र परमात्म-सत्ता पर ही दृढ़ता रहती है। इसके विपरीत और जो कुछ भी नज़र आता है वह उनके विश्वास की सीमा से बाहर होता है। इस प्रकार के व्यक्ति बहुत ही कम नज़र आते हैं। पांचवीं अवस्था विश्वास की यह है कि ऐसा व्यक्ति जो परमात्म-सत्ता पर ही दृढ़ आस्था रखता है, वह होनी, न होनी, सब उसकी आज्ञा में देखता है और देह धर्म करके जो कुछ भी सुख दुःख उस पर आ पड़े वह उसे सहन करता है। इस विश्वास को धारण किए हुए व्यक्ति लाखों में उंगलियों पर गिनने लायक होते हैं। प्रेमी जी, पुख्ता यकीन (दृढ़ विश्वास) अपने जीवन में प्राप्त करो तो तुम्हारा कल्याण अवश्य हो जावेगा।

प्रश्न 103: महाराज जी, दृढ़ विश्वास कैसे होता है?

उत्तर: प्रेमी, विश्वास या तो बिल्कुल मुर्ख को होता है या पूर्ण उच्च अवस्था वाले को होता है, वरना बीच वाले व्यक्ति असली विश्वास प्राप्त नहीं कर सकते। पक्का विश्वास होना चाहिए। यदि ऐसा विश्वास लेकर सीधे रास्ते पर चल पड़े तो विजय है और यदि उलटे चल पड़े और विजय न भी हुई, तो भी रास्ता सीधा हो जावेगा। परन्तु शर्त यह है कि दृढ़ विश्वास होना चाहिए और विश्वास से चलना अवश्य चाहिए।

प्रश्न 104: महाराज जी, ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखना आपका मुख्य उपदेश है। क्या अपनी जान बचाने की खातिर एक जगह से दूसरी जगह भागते फिरना इस ईश्वरीय विश्वास में कमी नहीं दर्शाता जबकि यह निश्चित है कि मौत टल नहीं सकती?

उत्तर: प्रेमी जी, ईश्वर का विश्वास रखने वाला हर वक्त निर्भय रहता है और न ही जान बचाने की परवाह करता है। वह सब होना और न होना प्रभु आज्ञा में देखता है और धैर्यवान रहता है।

प्रश्न 105: सच्ची श्रद्धा क्या है?

उत्तर: यह संसार एक बाजी (खेल) है और बाजीगर इसका सच्चा है। ऐसा जानकर जो इस बाजीगर पर सच्चा निश्चय करता है उस निश्चय को सच्ची श्रद्धा कहते हैं।
जिस मालिक ने इस अ‌द्भुत संसार की रचना रची वह ही सब कुछ करन-करावनहार है। इस शरीर का कोई भरोसा नहीं चाहे दस दिन रहे चाहे लाख वर्ष रहे आखिर को नाश हो ही जावेगा। इस वास्ते सब होल-हुज्जत (तर्क-वितर्क) छोड़कर बाजीगर (ईश्वर) से प्रेम करो।
श्रद्धावान होने के लिए श्रद्धावान पुरुषों के चरित्र पढ़ो और विचार करो। पूर्ण श्रद्धावान होने पर गुरुक्षा का अनुभव स्वयं ही होने लगेगा।

प्रश्न 106: महाराज जी, आस्तिक कौन है?

उत्तर: प्रेमी, जिस वक्त जीव यह समझता है कि शरीर नामुकम्मल (अपूर्ण) है, शरीर के सुख भी नामुकम्मल हैं, इस वास्ते ऐसी चीज प्राप्त की जावे जो मुकम्मल हो, उस वक्त वह आस्तिक है।

प्रश्न 107: महाराज जी, बाइबिल में लिखा है कि विश्वास से पर्वत भी हिल जाते हैं। क्या मनुष्य अपने संकल्प मात्र से ऐसा कर सकता है?

उत्तर: प्रेमी, ऐसा तभी हो सकता है जब दृश्यमान संसार संकल्प रूप होकर अनुभव में आने लगता है। जब तक संसार स्थूल रूप में अनुभव हो रहा है, तब तक ऐसा होना सम्भव नहीं।

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