उत्तर: प्रेमी, रोग-सोग तो आते ही रहते हैं। यह मन की स्थिति पर मुनहसर (निर्भर) है। जाहरी (बाहर से) तुमको तकलीफ में प्रतीत होते हैं। आंतरिक ज्ञान अवस्था में न रोग है न अरोग। संसारी लोग शारीरिक एवं मानसिक दुखों में संजोग-वियोग होने पर तपते रहते हैं। इनमें कर्त्तापन दृढ़ है। खाली मुंह से ईश्वर आज्ञा कहने से कोई लाभ नहीं तथा न ही मन की शांति प्राप्त हो सकती है। होना न होना, दुःख-सुख, सारे द्वन्द्व चक्र अन्दर से ईश्वर आज्ञा समझकर यदि अन्दर में दृढ़ हो तो फिर कलह कल्पना नहीं सताती। तुम्हारी बुद्धि बहिर्मुखी रहती है। अन्दर से विचार किया करें। जब तक यह पिंजरा है तब तक खटपट लगी रहेगी। इन बातों से स्थिरता में फर्क नहीं पड़ता। आधि, व्याधि, उपाधि तीन प्रकार के दुखों में जीव पड़ा ही रहता है। ज्ञानी वह ही है जो समस्त क्रिया को ईश्वर आज्ञा में देखता है और हर हाल में उसका शुक्रगुजार रहता है।
उत्तर: प्रेमी, सत्मार्ग में दृढ़ता से चलना होगा। कोई बच्चों का खेल थोड़े ही है। यहां तो जीवन में ही मृत्यु को कबूल करना पड़ता है। जो ड्यूटो तुम्हें मिली है उसे भी ठीक तौर से न निभाओं तो कैसे सफलता हो? प्रेमियों, राजी-ब-रजा (ईश्वर आज्ञा में खुश रहना) का मंत्र याद रखो।
उत्तर: प्रेमी जी, ज्यादा जिन्दगी को क्यों नाहक परेशान करते हो? ज्यादा चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं, न ही अधिक सोचने की तथा विचार करने की जरूरत है। बस इन तीन बातों पर चलने से सारा मतलब हल हो जाएगा-
(1) उस मालिके-कुल को हर चीज का कर्त्ता और कारण जाने।
(2) अपने आप को हर वक्त बिना किसी हील व हुज्जत के यह समझे कि मैं उस मालिके-कुल के हुक्म के अन्दर हूं और जो कुछ भी होता है, उसकी मर्जी से होता है।
(3) गुजरान वाले प्रोग्राम से अपनी जिन्दगी बिताए। बस फिर तेरे अहंकार की मां मर जाएगी और उसके नष्ट होते ही फिर कुछ करना-कराना बाकी न रहेगा।
उत्तर: हां, अगर कामिल उस्ताद हाथ पकड़े और शागिर्द को उस पर पूर्ण श्रद्धा हो और सत्मार्ग का पूर्ण मुतलाशी (जिज्ञासु) हो, तो सब कुछ आसानी से हो सकता है। फिर उस्ताद सब संभाल लेगा।
उत्तर: प्रेमी, तुम्हारे इस सवाल के तीन पहलू हैं-पहली हालत में जब तक मनुष्यों में ईश्वर विश्वास कम है तो उनसे कहा जाता है कि अच्छे व नेक काम करो और बुरे छोड़ दो। ऐसा करते-करते उनकी बुद्धि निर्मल होती जाती है और वह आगे की हालतों को समझने लगती है। लेकिन इस मिथ्या अभिमान में गलतान (लीन) ही रहती है कि मैं बड़ी हूं। फला-फलां कर्मों को करने वाली हूं वगैरह-वगैरह। इस करके वह प्राणी जन्म-मरण के चक्कर में तो पड़ता ही है लेकिन इसकी बुद्धि अधिकारी अवस्था तक पहुंच गई होती है। इतना होने पर भी वह इस चक्कर से छूट नहीं सकती। अब सवाल यह उठता है कि वह कैसे निर्बन्ध और निःकर्म अवस्था प्राप्त करे। यानी इस जन्म मरण के गहरे आजाब (दुख) से कैसे छुट्टी मिले? तब सत्पुरुषों ने हुक्म फरमाया है कि इस निष्कर्म अवस्था को प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि वह दूसरी हालत में अपने नेक कर्म परमात्मा के समर्पण करता जावे तो वह उनके नतीज़ों से छुटकारा पा जावेगा। यानी अपने आप को निर्बन्ध बनाने के लिए, जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाने के लिए और निःकर्म अवस्था प्राप्त करने के लिए वह समर्पण बुद्धि धारण करे। तुम्हारे सवाल का तीसरा और आखिरी पहलू यह है कि ऐसी समर्पण बुद्धि धारण करता हुआ जीव होना, न होना, करना न करना, सब ईश्वर आज्ञा में देखता हुआ उस परमात्मा का हर घड़ी चिन्तन करता रहे। जब ऐसे निश्चय को बुद्धि प्राप्त होगी तब कर्त्तापन अभिमान से निर्बन्ध होकर अपने निज स्वरूप अखण्ड अविनाशी शब्द में निश्चल हो जायेगी। कर्म और कर्मफल के द्वन्द्व रूपी खेद से निर्बन्ध होकर सत् स्वरूप में निश्चल हो जावेगी। इस स्थिति को ही सम पद निर्वाण शान्ति कहा गया है।
सार विचार यह है कि कर्त्तापन के अभिमान से बुद्धि कर्मफल में आसक्त हुई नाना प्रकार की कामनाओं को धारण करके जन्म-मरण रूपी संसार में फिरती है। इस महा अंधकार कर्त्तापन के नाश करने के वास्ते प्रथम निश्चय प्रभु आज्ञा में समर्पण कर्म यानी प्रभु को कर्ता जानना और अखंड प्रेम करके चिन्तन करना ही कल्याण के देने वाला साधन है। इसी को भक्ति कहते हैं। जब समर्पण बुद्धि परिपक्व हो जाती है तब निःकर्म स्वरूप आत्मा में स्थित होकर आनंदित होती है। ईश्वर को कर्ता जानना कर्म बन्धन से छूटने के लिए उपाय है। वैसे बुद्धि कर्त्तापन की अभिमानी होकर खुद ही कर्म करके द्वन्द्व रूपी दुःख-सुख धारण करती है। यह ही संसार का चक्र है। वैसे तो प्रकृति तीन गुणों के खेल को आप ही कर रही है। उसमें सिर्फ जीव होमैं (अहम् भाव) करके फंसा हुआ है। इससे छूटने के लिए प्रभु आज्ञा में समर्पण कर्म करने से ही छुटकारा प्राप्त होता है। वैसे प्रभु तो निःकर्म स्वरूप है।
उत्तर: यह सुनी सुनाई बात है, निश्चय में नहीं है, क्योंकि जब ईश्वर को कर्ता मान लिया तो अपना आप नहीं रह सकता। दूसरे शब्दों में जब अपने कर्त्तापन को त्यागकर हर काम प्रभु आज्ञा में समझकर किया जाएगा तब ही कर्म की कैद से मुख्लसी (मुक्ति) हासिल हो सकती है। जब तक खुद कर्त्ता बनता है खुद ही भोगना पड़ेगा।
उत्तर: लाल जी, जो प्राणी मैं करता हूं, फलाने (अमुक) कर्मों को करने वाला मैं हूं, ऐसा सोचते हैं, वे स्वयं कर्त्तापन के अभिमान में फंसकर सुख, दुख, जिल्लत और परेशानी उठाते हैं और जो प्रभु आज्ञा में लापरवाह रहते हैं उनके सत् संकल्प द्वारा ही ऐसे कारण बन जाते हैं कि वे काम स्वयं पूरे हो जाते हैं। यदि देव इच्छा से कार्य पूरा न भी हो तो उनको दुख या परेशानी नहीं होती। यह बात पक्के और पूर्ण विश्वास वालों की है जिनका बाहर और भीतर एक ही है।
उत्तर: प्रेमी, यह बात बिल्कुल सत्य है। तुम्हें एक आख्यान (घटना) सुनाते हैं। एक बार की बात है कि एक फकीर औलिया शाहदौला नाम के पंजाब प्रांत के गुजरात इलाके में रहते थे। उसके पास ही दरियाये चिनाब बहता था। साथ ही एक टीले पर एक गांव आबाद था। बरसात के दिन थे अचानक चिनाब दरिया में बाढ़ आ गयी। दरिया गांव के टीले के नीचे से बहने लगा और टीले की मिट्टी कटने लगी। यह देखकर गांव के लोग बड़े चिन्तित हुए और फकीर शाहदौला की शरण में जाकर अर्ज की, हमारी रक्षा करो। फकीर ने पूछा क्या बात है? गांव के मुखिया ने फकीर को सारी बात बता दी। फकीर एक दम उठ खड़े हुए और टीले के पास पहुंचकर सारे सिलसिले को देखा। कहने लगे मेरे मालिक की मर्जी है यह गाँव बहे। हमें अपने मालिक की मर्जी पूरी करनी चाहिए। मेरा पुख्ता यकीन है कि मालिक की मर्जी हमेशा ठीक होती है। वह मस्ती से उठे और फावड़ा लेकर टीले से नीचे मिट्टी काटकर नदी में फेंकने लगे ताकि जल्दी से किनारे टूटें और गाँव बह जाए। कहते हैं फकीर द्वारा फेंकी गई मिट्टी दरिया से कोई दो गज दूर जाकर पड़ी। दरिया ने अपना रूख बदल दिया। वह मिट्टी जहां जाकर पड़ी थी दरिया उस मिट्टी से लगकर बहने लगा
तथा गांव बहने से बच गया। जो लोग निरइच्छित होकर रब की रजा में प्रसन्न रहते हैं उनके लिए कुदरत कामला अजब किस्म के असबाब (साधन) प्रगट कर देती है। फकीर लोग खुद भी हैरान हो जाते हैं कि यह कैसे हो गया। फकीरों की माया अपरम-अपार है।
उत्तर: प्रेमी, क्या हर वक्त ‘मैं मेरा’ ही कहते जावें। इस कर्त्तापन यानि अहंकार से गाफिल नहीं रहना चाहिए। ईश्वर आज्ञा रूपी शस्त्र से कर्त्तापन अहंकार को दूर करते रहना चाहिए, इससे जीव बंधन में नहीं बंधता। और जितने भी जीव हैं ‘मैं और मेरी तेरी’ भावना में ही बंधकर रात-दिन, सब कुछ प्राप्त होने पर भी, गरम-ठंडी फूंके मारते रहते हैं। हर घड़ी मालिक को याद रखने का यह तरीका है, और जीव इस तरह नेहकर्म (निष्काम) अवस्था की तरफ जा सकता है। यह तेरे अन्दर आज्ञा करने वाला कौन है? शायद तू इस कर्त्तापन में आ फंसा हुआ है। सब जीवों ने इस शरीर को सब कुछ समझ रखा है। देह अध्यास से खुलासी पानी है। जब अन्दर बाहर हर तरह से उस मालिक को करता-हरता मानोगे तब छूट पा सकोगे। इनके लिए ईश्वर नित ही अंग-संग है। जबानी जमा खर्च करने वाले हर समय अहंकार में ही स्थित रहते हैं। प्रभु प्रेमी को इस स्थिति में रहना चाहिए कि जो हो रहा है, जो होगा सब उसकी आज्ञा से हो रहा है या होगा। प्रेमी जी, अमल में उतरना बड़ा मुश्किल है। जबानी बहुत ब्रह्म बने फिरते हैं। जब ममतामई वासना यानि मैं-मेरा वगैरा में दृढ़ता हो जाती है, तब राग-द्वेष में फंसकर जीव अनेक सुखों-दुखों को प्राप्त होता है। जब यह वासना दग्ध हो जाती है फिर वह अचेत पुरुष हो जाता है। जब तक अंदर निर्वास, निर्वाह अवस्था नहीं आती जहरी (बाहरी) बे-ख्वाहिश का भेष और दंभ (बनावट) से दूसरों को प्रभावित करने से कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानी की मैं और संसारी की मैं-पन में बहुत अन्तर है। कहने को तुमको जो दृश्यमान संसार भासता है उसी का स्वरूप है, मगर चित्त की हालत लाभ होने पर और तरह की हो जाती है और हानि होने पर और तरह की। यह मानने वाली बात है। जबानी तुम्हारी व्याख्या के सामने किसी का ठहरना मुश्किल बात ही है।
क्योंकि तुम्हें जबानी जमा-खर्च करने वाले ही मिलते हैं। जिस समय अन्दर बाहर आत्म सत्ता को सर्वव्यापक जानने की असली माइनों में कोशिश करोगे तब पता लगेगा। प्रेमी जी, दो घड़ी के लिए संसार के सुख भोग तो त्यागे नहीं जा सकते, जबानी निर्वास भाव की महिमा करना क्या माइने रखता है।