Ishwer Prapti Ya Kalyaan ka Marg(ईश्वर प्राप्ति या कल्याण का मार्ग)

प्रश्न 130: ईश्वर को पाने का रास्ता एक है या अनेक ?

उत्तर: सिद्धों का रास्ता एक है मगर वकीलों के अनेक। सिद्ध अपनी अनुभवी वाणी बतलाते हैं मगर वकील दूसरों की वाणी सुनाकर वकालत करते हैं।

प्रश्न 131: महाराज जी, परमात्मा को कैसे पाया जा सकता है?

उत्तर: जब तक आपके ख्यालात संसार में हैं तब तक मुश्किल है। जब संसार को भूलकर ईश्वर के आधीन हो जाओगे उस वक्त आपको कोई रास्ता बताने वाला भी आ जाएगा।

प्रश्न 132: महाराज जी, क्या सत्गुरु धारण करने से और उनके उपदेश सुनने से मनुष्य का कल्याण हो जाता है?

उत्तर: नहीं प्रेमी, गुरु का काम सही रास्ता बतलाना है, आगे फिर उस रास्ते पर चलना पड़ेगा, तब सिद्धता और कल्याण होगी।

प्रश्न 133: महाराज जी, किसी चीज को पाने के लिए, विशेषकर इस ब्रह्म ज्ञान को पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

उत्तर: जिस चीज को पाना चाहते हो उसके पूर्ण मुतलाशी (जिज्ञासु) पहले बनो। जैसे कि मुसाफिर जब सफर करते हैं तो बड़ी जल्दी से सफर काटने का यत्न करते हैं कि कहीं रात्रि न आ जाए, यानि आराम या आलस्य की तमन्ना छोड़कर चलने का ही यत्न करते हैं कि कहीं शरीर का विनाश न हो जावे। ऐसी धारणा को पक्का करने के बाद तू इस ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी बन जावेगा। यानी तीव्र वैराग को धारण करके संसार की तमाम अड़चनों से अबूर (छुटकारा) पाकर अपने निज स्वरूप में स्थित हो जावेगा।

प्रश्न 134: महाराज जी, इस जन्म में नहीं तो अगले में सही, मुझे तो पक्की आशा है कि पार तो हो ही जाऊंगा।

उत्तर: इस तरह इस शैतान (विकारी) मन को ढील मत दो। ऐसे अधीर हो जाओ कि कल नहीं, आज ही हमें कामिल (पूर्ण) गुरु की तलाशकरनी चाहिए। ऐसी ढील देने से मन को शैतानी का रास्ता मिल जावेगा। शायद यह जो पवित्र संस्कार इस वक्त उदय हुए हैं, कुछ समय के बाद नाश को प्राप्त न हो जावें और फिर तुम अपनी उन्नति की बजाए अपनी तबाही के मार्ग को अख्तियार (धारण) न कर लो। अगर ऐसे वैराग के समय में सही साधन प्राप्त हो जावे तब ही यत्न प्रयत्न करने पर अपना उद्धार कर सकोगे।

प्रश्न 135: महाराज जी, इस परमार्थ के रास्ते पर चला नहीं जाता, इसका क्या कारण है?

उत्तर: : प्रेमी जी, सिदक (विश्वास) की कमी है और फिर यह नाम रूपात्मक संसार में हजारों अजदहा (अजगर) खड़े हैं, वे तुम्हें इस रास्ते पर चलने नहीं देते। अगर प्रेम प्राप्त करने के लिए चलना हो तो बाहोश (चौकस) हो जाओ। एक लम्हा (पल) की देरी न करो।

प्रश्न 136: क्या आप बतला सकेंगे कि जिस आत्म तत्व का आप अभी बयान कर रहे थे, उसको हासिल करने की क्या तरकीब (डंग) है?

उत्तर: हां, तरकीब क्यों नहीं है? वह बराबर निदिध्यासन से प्राप्त हो सकता है।

प्रश्न 137: निदिध्यासन किसको कहते हैं?

उत्तर: जब तू निःसंग, निर्विकल्प तथा चेतन प्रकाश का निरन्तर, एक लम्हा भी न खोते हुए अन्दर और बाहिर एक मुवाफिक ध्यान करेगा, जब उस आत्मस्वरूप के दर्शन करके उसका साक्षी रूप हो जावेगा, इसी को निदिध्यासन कहते हैं। बाकी पढ़ने सुनने से तो विचारों द्वारा रुचि पैदा होती है और अगर यहां पर की तपिश ज्यादा हुई तो वह भी हवा हो जाती है। इसलिए अपने पुराने मलीन

प्रश्न 138: महाराज जी, बहुत से सन्त, जिनमें बुल्हे शाह भी हुए हैं, कहते थे कि किसी का होकर मत रहो। इसका क्या मतलब है?

उत्तर: इसके मानी हैं कि अपनी जात (निज स्वरूप आत्मा) को छोड़ कर बाकी सबसे मुनकिर (निर्लिप्त) हो जा और अपने आप में ही विश्वास कर।

प्रश्न 139: यह कैसे मालूम हो कि हम अपनी जात में निवास करते हैं?

उत्तर: जब तक दुनिया की व शरीर की सूक्ष्म और स्थूल खुशी से तू अपने आप को पवित्र (मुक्त) न कर ले तब तक आत्म तत्व को यानी अपनी जात को नहीं जान सकता। जब तक हानि, लाभ, दुख, सुख, शोक व मोह इत्यादि तुझे चलायमान कर रहे हैं तब तक तू उनका गुलाम (दास) है, और सत् स्वरूप को नहीं पहचान सकता।

प्रश्न 140: महाराज जी, आत्म साक्षात्कार कितने समय में सम्भव हो सकता है?

उत्तर: प्रेमी, यदि तीव्र लगन हो तो सात से चौदह दिन में यह अवस्था प्राप्त की जा सकती है, परन्तु बड़े भारी पुरुषार्थ की आवश्यकता है।

प्रश्न 141: मनुष्य के कल्याण का मार्ग क्या है?

उत्तर: यह शरीर कर्म का जन्तर (यंत्र) है जिससे नाना प्रकार के कर्म
हर पल प्रगट होते हैं और जीव शरीर की ममता को धारण किए हुए तमाम कमर्मों के भोगों में आसक्त होकर हर वक्त चलायमान होता रहता है। किसी हालत में भी संतोष को प्राप्त नहीं हो सकता। इस अशान्ति की निवृत्ति का सहज उपाय यही है कि पहले अनर्थक कर्म जो शारीरिक उन्नति की नाश करने वाले हैं उनका त्याग किया जावे। बाद में जो सत्कर्म बुद्धि को निर्मल करने वाले हैं उनमें दृढ़ निश्चय धारण करके, प्रभु इच्छा को निश्चित करके विचरना ही कल्याण का देने वाला यत्न है।
सादगी, सेवा, सत्य, सत्संग और सत्-सिमरन आदि गुणों के साधनों को धारण करने से बुद्धि अधिक बलवान होकर तमाम अनर्थक कमर्मों का त्याग कर देती है। यानी इन साधनों के बगैर कई प्रकार के अवगुण हर वक्त बुद्धि को भरमाते रहते हैं। अच्छी तरह से विचार करने से सब सार का पता लग जाता है। एक प्रभु विश्वासी होकर तमाम शरीर के दुख व सुख उसकी आज्ञा में निश्चित करना ही असली कल्याण का मार्ग है।

प्रश्न 142: मनुष्य का उद्धार कैसे हो सकता है?

उत्तर: ईश्वर विश्वास व चिंतन, आखरित की याद (मृत्यु की याद) और परोपकार सेवन, यदि इन बातों को नित्य प्रति याद करें तो कुछ अर्से में मनुष्य देवता बन जाएगा।

प्रश्न 143: भक्ति के रास्ते में बाधक क्या वस्तु है?

उत्तर: प्रेमी, सूक्ष्म वासना ही भक्ति में बाधक है। तत्ववेत्ता की बुद्धि इतनी तेज़ होती है कि वह वासना को उठने नहीं देते। अगर एक लम्हा (क्षण) भी वासना उनके अंदर उठती है तो भूचाल आ जाता है। वह होने न होने को ईश्वर आज्ञा में समर्पण करते हैं।

प्रश्न 144: महाराज जी, ‘हंसदियां, खेड़दिया, खांदियां, पींदियां होवे जीवन मुक्त’ कोई ऐसा तरीका बताएं कि आसानी से छुटकारा हो जावे।

उत्तर: प्रेम प्याला जो पिये सीस दक्षना दे। लोभी सीस न दे सके और नाम प्रेम का ले।।
प्रेमी जी, जीभा की रसना को पूरा करने के वास्ते और इन्द्रियों के लवाजमात इकट्ठे करने के लिए किस कद्र यत्न प्रयत्न रात-दिन करते हो। जो भी रस स्वाद प्राप्त होते हैं सब एक पल में गायब हो जाते हैं। दुखों सुखों को भोगता हुआ आखिरकार संसार से खाली हाथ चल देता है। जरा किसी ऐसे सत्पुरुष का नाम तो लो जिसने हंसदयां, खेड़दयां मुक्ति प्राप्त की हो। सर देकर के जीवन में मुक्ति हासिल हो जाए तो भी सस्ती जानो। अपने आपको भुलेखे में न डाले रखो। जिनका शब्द तुमने पढ़ा है, बारह वर्ष ओड़ नी पर बैठकर तप करते रहे। हर हालत में प्रभु आज्ञा माननी कोई आसान नहीं। जब तक अच्छे-अच्छे भोग रस मिलते रहें तो ठीक, जिस समय उलटा चक्कर चलने लगे फिर उस वक्त भी भाना मानो, तब रोओ, पीटो, कल्पो नहीं, तब जीवन मुक्ति का पता लगे। किसने तुझे उलटी मत दी हुई है। सीधे होकर चलो।

प्रश्न 145: महाराज जी, शरीर से अलग आत्मा को कैसे जाना जा सकता है? शरीर को सदा सत् समझ रखा है, आत्मा को नहीं। सांसारिक पदार्थ, सब सम्बंधी, परिवार, कारोबार वगैरा को सत् समझकर इससे चिमट रहे हैं। रात दिन शारीरिक सुखों की प्राप्ति में लगे रहते हैं। इस सांसारिक यात्रा को कैसे समझा जावे। बड़ा ही अश्चर्ज मामला है। बड़ा यत्न करने पर भी मन बुद्धि माया में ग्ररक हो जाते हैं। आपके बचनों को अच्छी तरह सुनते हैं, मगर फिर भी न मालूम कहां-कहां के विचार सामने आकर खड़े हो जाते हैं। मन खूब चक्कर में पड़ जाता है। ऐसा उपाय बताएं जिससे अभ्यास के समय मन न दौड़े। जब अभ्यास में बैठते हैं तब यह ज्यादा ही खप खाना डालता है। संसार के कामों में लगे रहने से इसका पता ही नहीं रहता।

उत्तर: प्रेमी जी, जब तक अंतर से संसार को सत् और सुखदाई समझ रहे हो तब तक स्थिरता कहां बन सकती है। जब यह जीव गुज़रे हुए सुखों को याद करता है तब अति बेचैन हो जाता है। वास्तव में जिस धन, स्त्री, पुत्र, कलत्र में यह सुख मान रहा है, यह कहां सुख देने वाले हैं। इन सबके बढ़ जाने पर भी शांति नहीं मिलती। नहीं होते तब भी बेचैन रहता है और होते हैं तब भी बेचैन रहता है। आज तक कोई ऐसा व्यक्ति दुनिया में नहीं हुआ जिसने धन-परिवार को पाकर सुख पाया हो।
एक लख पूत सवा लख नाती। तिस रावण घर दिया न बाती।।
राम को दुनिया क्यों याद करती है। वह कितने बड़े परिवारी थे। विचार करके देखो कैसे ईश्वर परायण और सत् धारणा को धारण करने वाले पुरुष सुख दुख में सम चित्त रहते हैं। राजगृह और जंगल में रहकर दिखा दिया। दोनों हालतों में कैसे सम चित्त रहे। मूर्ख जीव संसार की चहल पहल भोग पदार्थों को देखकर खुश होते हैं। मोह माया को बढ़ाकर कभी सच्ची खुशी, शांति नहीं मिल सकती। बुद्धिमान गुरुमुख जीव हमेशा संसारी पदार्थों को असत्, दुख रूप जानकर इनकी ख्वाहिशात उठने नहीं देते। जरूरियाते जिन्दगी के पूरा होने और न होने पर दोनों हालतों में एकसा रहकर संसार में विचरों, प्रारब्ध वश जो प्राप्त हो उसमें संतोष रखो। जो न प्राप्त हो उसकी इच्छा न करो। इच्छायें बंधन में डालती हैं। राम, कृष्ण आदि राज में रहते हुए भी निर-इच्छुक थे।
दूसरा विचार यह है कि संसार में सब कुछ आत्म रूप ही जानो और इच्छा या ख्वाहिश रहित होकर विचरो व राग द्वेष से रहित हो जाओ। संसार में कर्म करते रहो मगर निर्लेप रहो। ज़रा अवतारी पुरुषों के जीवन पर विचार करो, कैसे राग-द्वेष से रहित उनका जीवन था। ऐसे जीव सदा ही मुक्त होते हैं। वह नित ही आनन्द में रहते हैं। सर्व सांसारिक सुख होने पर भी उनके अन्दर अहंकार नहीं होता। बनवास हो जाए तब दुख नहीं, राज मिल जाए तब खुशी नहीं। बुजुर्गों के आदर्श सामने रखो। खाली राम-राम कर लेने से खुलासी नहीं हो सकती, जब तक उनके त्याग वैराग्य से सबक न लिया जाए।
जिस कृष्ण को बार-बार पुकारते हो ऊंची स्वरों से, वह सारी आयु शाही तख्त पर नहीं बैठे। किनारे रहकर राज का सारा कार्य भी चलाया और संसार में भी विचरे। इसी वास्ते कृष्ण को महायोगी माना जाता है। संसार में रहते हुए हर घड़ी उससे अलग रहे। और भी महापुरुष हुए हैं महाबीर, बुद्ध, भरतरी वगैरह बड़े-बड़े तपस्वी, ऋषि, मुनि, वशिष्ठ, व्यास, अगस्त, भृगु, अंगिरा वगैरह भी हो गुज़रे हैं। वह भी संसार में रहते हुए अन्दर से अति उदासीन रहे। ऐसी हस्तियां हमेशा ज़िन्दा हैं। उन्होंने असली शांति प्राप्त की जिनकी ग्रहण-त्याग में बुद्धि सम रही है।
प्रेमी जी, जो उपदेश आपको इधर से मिला है उसकी कद्र क्या जानो। कुछ किया कराया नहीं मणि हाथ में आ गई। उस उपदेश को नानक के बाद गुरुओं ने समझा और हजूरी में रहकर किस कद्र सेवा, त्याग, सिमरन, भजन में लीन रहे। उन जैसी कमाई करनी पड़ेगी तब जाकर रंग लगेगा। मिट्टी बनना पड़ता है, खाली ज्ञान चर्चा सुनने से कभी काम नहीं बनता। करनी करो। अगर उस उपदेश में गरक होने का यत्न न करोगे, कामयाबी नहीं हो सकती। बल्कि जीव विश्वास हीन हो जाता है। खाली धर्म के नाम लेवा बन जाओगे जिसका कुछ लाभ नहीं। अज्ञानता ही दुख का कारण है। आत्मबोध से ही परम पद प्राप्त होता है और शांति व शीतलता आती है। और सब टेकों को छोड़कर केवल प्रभु को कर्त्तार्ता हर्ता जानकर अंतरमुख होने में ही एकाग्रता है और असली ठंडक है।

प्रश्न 146: महाराज जी, अब हमको किस तरह चलना चाहिए?

उत्तर: प्रेमी, यदि सही तौर पर यह जीव चलना चाहे तो रास्ता भी मिल जाता है। अपनी बुद्धि तीक्ष्ण होनी चाहिए। विचार लेकर अच्छी तरह इन्हें समझने लगेगा तो फिर ठीक चल सकता है। तुम्हारा कसूर नहीं। तुमको सबक देने वाले भी ऐसे मिल जाते हैं जो पल में ब्रह्म बना देते हैं। दुनिया का मौज मेला भी करते रहें और ईश्वर भी मिल जाये, यह कैसे हो सकता है। ऋषियों, मुनियों को जंगलों में जाकर तप करने की क्या जरूरत थी? बड़े-बड़े राजे, महाराजे राजपाठ छोड़कर घोर जंगलों में क्यों गए? अगर पानी बिलोने से मक्खन निकल आता तो रूखी कोई भी न खाता। माया-मान भी बना रहे और सत् पद भी प्राप्त हो जाए, यह कैसे हो सकता है। ऐसा कोई तरीका, साधन नहीं निकला जिससे दुनिया भी बनी रहे और परम सत्ता को भी जान लिया जावे। यहां तो पहले मरना कबूल करना पड़ता है। पल में ब्रह्म दिखाने वाले महात्मा भी इधर देहरादून में बहुत हैं। मन्सूर की तरह सूली पर चढ़ने वाला मुश्किल से मिलेगा। तुम ब्रह्म को न ढूंढो, पहले पूछो कि संसार की प्रीति कैसे कम हो? पवित्र जीवन कैसे बने? जब मन को शुद्ध करने वाले साधन इख्तियार (धारण) करोगे, आप चलने का भी पता लग जावेगा। फरीद कहता है:


मन मार के मुंज कर, निक्का करके कुट।
भरे खजाने साहब दे, जो चाहे सो लुट।।

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संगत समतावाद धर्मशाला – हरिद्वार
हिमालय डिपो, गली न.1, श्रवण नाथ नगर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)