उत्तर: लाल जी, जिस वस्तु की यह मन इच्छा करता है एवं उसमें सुख प्राप्त करने की कल्पना बना लेता है, जब वह पूर्ण नहीं होती तो दुःख का जन्म हो जाता है अर्थात् मन की चाह की अपूर्ण हालत का नाम ही दुःख है। वैसे दुःख का अपना असली स्वरूप कोई नहीं है। मन की कल्पना करके ही दुःख है, मन की कल्पना करके ही सुख।
उत्तर: शरीर और शरीर से सम्बंधित पदार्थों में ममता ही दुःख का मूल कारण है।
उत्तर: महापुरुषों ने कहा है कि सुखों की इच्छा ही मनुष्यों की असली बीमारी है तथा तमाम अशान्ति का कारण है। प्रेमी जी, यह कथन सही है कि मनुष्य इस सुख की इच्छा करके ही आवागमन के चक्कर में फंसता है। इसके लिए तुम्हें अपने मन को यह कहकर समझाना चाहिए-हे मन, जो सुख बदलने वाला है, वही दुःख का रूप है और इन सुखों को प्राप्त करके भी जो तुमने अपने मन में निश्चय किए हैं उनसे तसल्ली और शान्ति प्राप्त नहीं हो सकेगी। मिसाल के तौर पर, अगर तू जरा ध्यान से सोचे तो पहले के सुख जो तू भोग चुका है उनके भोग लेने के पश्चात् तेरी क्या अवस्था रही। इससे सबक ले सकता है।
उत्तर:
उत्तर: जीव को बंधन अज्ञान का है। जब अज्ञान गायब होगा तब पता चलेगा कि कोई बंधन वास्तव में है ही नहीं। यह ऐसा मसला है जो मुतालया (अध्ययन) से नहीं बल्कि अनुभव से जाना जाता है। स्थूल शरीर में आत्मा उसी प्रकार मौजूद है जैसे दूध में घी मौजूद है, लेकिन नज़र नहीं आता।
आत्मा का ज्ञान होने पर ज्ञानी की सृष्टि का अभाव हो जाता है। इसलिए महापुरुषों ने कहा है कि वह अवस्था बयान से बाहर है बल्कि अनुभव से जानी जाती है। इसलिए अनुभव करो। तब तू स्वयं जान जाएगा कि अज्ञान रूपी बंधन कहीं था ही नहीं।
उत्तर: जमाने की गर्दिश का चक्कर हमेशा और हर वक्त चलता रहता है। फकीर हमेशा इस गति को दृष्टि में रखते हुए उस चक्कर से आजाद रहते हैं। परन्तु साधारण जीव इस चक्कर में आए हुए कोशिश में लगे रहते हैं। और कई दफा आध्यात्मिक बातें भी सुनना गवारा (पसन्द) नहीं करते। लेकिन जब गति का चक्कर मुसीबतों में फंसाता है उस समय तो कई गुणी पुरुष फकीरों की आवाज़ सुनकर उस चक्कर से निकलने की चेष्टा करते हैं और उससे शिक्षा प्राप्त करके सत् मार्ग की ओर प्रवृत्त होते हैं और उसकी खोज करते हैं। दुनिया एक मुसीबत खाना है। उसमें दुख हीदुख है। जिसने ऐसा नहीं जाना वह पशु है। यदि बहुत फैलाव फैलाया तो उसे समेटने में और आगे फैलाने में बहुत कष्ट झेलना पड़ता है। इसलिए जिंदगी में कोई नियम बनाना चाहिए और जीवन उस नियम के अनुसार व्यतीत करना चाहिए ताकि दिल को शान्ति प्राप्त होवे। जीव को पहली कैद कर्त्तापन अर्थात् अहंकार की है, दूसरी कर्म की और तीसरी कर्मफल की।
यही “होमे” रोग अर्थात् तृष्णा की बीमारी जीव को लगी हुई है। सत्पुरुषों ने इस चक्कर से निकलने का सहज उपाय बतलाया है कि कर्त्तापन अर्थात् अहंकार की जड़ में कुल्हाड़ा मारो अर्थात् आपामती को त्याग, और होना न होना प्रभु आज्ञा पर छोड़। ऐसा करते-करते जब बुद्धि निर्मल हो जावेगी तो सत् तत्त में लीन हो जावेगी। तब उसे पता लग जाएगा कि आत्मा सत् है और संसार मिथ्या है। ऐसी अनुभव गति की अवस्था को ज्ञान कहते हैं। अर्थात् बुद्धि इस हालत में सत् और असत् का पूर्ण निर्णय अन्तर्गत अनुभव करती है। ऐसी स्थिति वाला ज्ञानी यदि किसी वक्त मानसिक संकल्प में कैद हो भी जावे तो ऐसा समझे जैसे नदी के तट पर बैठा हुआ कोई पुरुष तपश (गरमी) लगने पर नदी में गोता लगाकर ठण्डक पाता है। ऐसी स्थिति वाला पुरुष उस लगन की अवस्था में डुबकी लगाकर संकल्प की तपश से ठण्डक प्राप्त कर लेता है। जब बुद्धि आत्मयोग में आरूढ़ होकर अपने आपको सत् शब्द आत्मा में लीन कर देती है और शारीरिक विकारों से बिल्कुल असंग होती है, उस समय केवल अपना आप ही सर्व जगत में “मुहीत” (आवृत्त) देखती है। ऐसी अवस्था को ही ज्ञानस्थिति कहा गया है। ऐसी अवस्था में प्राप्त हुए योगीजन केवल आनन्द स्वरूप में ही मगन रहते हैं।
उत्तर: शारीरिक रोग ही तमाम खेदों (दुःखों) के देने वाला है और मानुष जन्म की उच्चता यही है कि इस भोग क्रीड़ा के संग्राम से अधिक से अधिक पवित्रता प्राप्त की जावे। यानी आहार, व्यवहार, आचार और संगत की अधिक से अधिक पवित्रता प्राप्त की जावे। तमाम मुनश्यात से, मांस आदि से परहेज रखना आहार की शुद्धि है। अपने वचन और कर्म को सत् के आधार पर कायम करना आचार की शुद्धि है। नित ही श्रेष्ठ आचारी और सत्-ग्रही पुरुषों की संगत करनी, यह संगत की पवित्रता है। ऐसी नित की पवित्रता जब प्राप्त होती है तब बुद्धि परम आसक्ति से जागृत होकर सत् मार्ग कल्याण स्वरूप में निश्चल होती है। प्रथम जीवन उन्नति का साधन सार यही है।
उत्तर: वासना की गिरफ्तारी ही परम दुःख है और वासना की पूर्ति यानी निवृत्ति ही परम सुख है। तमाम जीव वासना की पूर्ति की खातिर ही नए से नए कर्म करके अपने आप को जकड़ रहे हैं, परन्तु वासना की निवृत्ति नहीं हो सकती है। यह ही माया भ्रमजाल असगाह है। जो मनुष्य कर्मफल द्वन्द्व भोग में वासना की पूर्ति चाहते हैं वे महज एक मूढ़ से भी मूढ़ हैं क्योंकि कर्मफल द्वन्द्व की तबदीली ही वासना को फैलाती है।
इच्छा रहित होना ही परम सुख है और इच्छा सहित होना ही परम दुख है। जब तक इच्छा का कारण कर्तापन (अहंभाव) का अभाव नहीं होता है तब तक कर्मफल द्वन्द्व की आसक्ति जो इच्छा का विस्तार है, इससे असंग होना अति कठिन है।
उत्तर: ख्वाह (चाहे) कोई गृहस्थी है या विरक्ती है, असली सुख आत्म परायण होने से ही प्राप्त होता है जो खुशी गमी से ऊंचा है। मालिके कुल का कानून सबके वास्ते बराबर है। जो सत् मार्ग की तरफ जाएगा वह शान्ति को प्राप्त होगा और जो अभिमान वश होकर उपद्रव करेगा वह परम दुःखी होवेगा। यह सार सिद्धान्त है।