उत्तर: प्रेमी जी, फर्ज वाली जिन्दगी बनाओ, गर्ज वाली जिन्दगी न जियो।
उत्तर: प्रेमी, शरीर और शरीर के सुखों को प्राप्त करके सुख भोगने की लालसा लेकर जो जिन्दगी बिताता है, वह गर्ज वाली जानो। इसके उलट फर्ज वाली जिन्दगी चलाने वाला इन्सान सब कुछ कुर्बान करके दूसरे जीवों के दुखों में अपने सुख अर्पण करता है या यूं कहो कि वह इन्सान जो फर्ज वाली जिन्दगी बिताता है, वह अपने कार्य प्रभु आज्ञा में सौंपता हुआ निमित्त मात्र अपने जीवन की क्रिया करता है और हर वक्त प्रभु विखे (हेतु) अपने आपको समर्पण करता चला जाता है।
उत्तर: प्रेमी, शरीर के कर्म करता हुआ उनकी आसक्ति से अलग हो जा। इसको निःकर्म होना कहते हैं। यह ही आध्यात्मिक जिन्दगी है। फायलियत (कर्त्तापन) ही इस संसार और संसार से सम्बंधित पदार्थों की जड़ है। ज्ञानी पुरुष फायलियत से पवित्र होकर गैर फाइल (अकर्त्ता) होकर कर्म करता है और अज्ञानी फायलियत को पूर्ण रूप से धारण करके कर्म करता है। यही फर्क ज्ञानी और अज्ञानी का है। सत्पुरुष या ज्ञानी पुरुष जो भी काम (कर्म) करता है वह आसक्ति रहित होकर, फर्ज जानकर करता है। मूर्ख (अज्ञानी) संसारी पुरुष हर काम स्वार्थ भाव को लेकर अपनी गर्ज को मुकद्दम (मुख्य) रूप में सामने रखकर करता है।
उत्तर: महात्मा लोग कहते हैं कि इस संसार में ऐसे चलना चाहिए कि जैसे किसी बाग में सैर को जाया जाता है। तब सिर्फ सैर का ही मकसद होता है। वहां उन्स (लगाव) किसी से नहीं की जाती। इस तरह दुनिया में चलना चाहिए । सन्तों के चरित्रों से यह भी जाना जाता है कि किस तरह से चलना चाहिए। या जैसा वे कहें, चलना चाहिए।
उत्तर: आदमी को चाहिए कि ऐसा समझे कि कर्त्ता और कारण सब कुछ परमात्मा हैं और अपने आप को उसके हुक्म के अन्दर चलने वाला सेवक समझे और इस संसार में गुजरान वाला प्रोग्राम बनाकर चले।
उत्तर: हां यह बड़ा जरूरी मसला है। गुजरान वाले प्रोग्राम को गौर से समझ लो। यानी जो प्रोग्राम अपना बनाओ वह जीवन रक्षा की खातिर तथा गैर जरूरी इच्छाओं को त्यागकर, कम खर्च में चलने वाला होवे। अगर प्रारब्धवश ज्यादा धन या माया प्राप्त होवे तो उसे सत्कर्मों में सर्फ (खर्च) करो और दीन-दुखी और अनाथों में बांटो। यह प्रोग्राम बड़ी कोशिश करके निश्चल रहते हुए पालन करना चाहिए। इसमें दलील से काम न लें। बल्कि हर समय अपने बनाए हुए प्रोग्राम के अनुकूल ही चलें। माया तो सबकी महागुरु है, जो हर वक्त सबको सचेत करती रहती है मगर कोई विरला ही इस भेद को समझ सकता है और पतित कर्मों की चोट खाकर बाहोश होता है। वरना लोग ज्यादा मदहोश ही रहते हैं।
उत्तर: परमात्मा को जानने से ही माया के हर पहलू का असली बोध हो सकता है। इस वास्ते परमात्मा को पहले जानने की कोशिश करो तो मायापति की कृपा से माया का बोध आप हो जाएगा। फिर उसे (परमात्मा) जानकर बाकी कुछ जानना नहीं रहता है। वरना अगर पहले माया को जानने की कोशिश करोगे तो एटम बम बनाओगे जो अशांति एवं नाश का स्वरूप है। अगर शांति चाहते हो तो ईश्वर की खोज करो, नहीं तो माया के चक्कर से छूटना मुश्किल है।
उत्तर: तू अपनी निबेड़। पहले अपना सुधार करो। फिर दूसरों का सुधार हो सकेगा। पहले अपनी प्यास बुझाओ फिर तू इस लायक हो जावेगा कि औरों की प्यास बुझा सके।
उत्तर: प्रेमी, अगर इस दुनिया में ठीक चलना चाहते हो तो मुनासबत
और मर्यादा की जिन्दगी बिताते हुए जो कुछ भी खाने पीने के बाद बच जावे उसे जरूरतमंदों की सेवा में लगा देना चाहिए। फिर तुम देखोगे कि अगर सौ आदमियों की मदद तुमने की है तो हजारों आदमी तुम्हारे गुण गावेंगे और तुम बुलंदी पर पहुंच जाओगे। मुनासबत की जिन्दगी का यही असूल है और यह ही इसका असली मेराज (ठिकाना) है जिसे सत्पुरुष समता आनन्द की प्राप्ति कहते हैं।
प्रेमी जी, कोई आडम्बर करने की जरूरत नहीं। एक मोटा सा असूल है अगर अपना लिया जाए तो सब परेशानियाँ हल हो जाती हैं। अगर तू अमीर और दौलतमंद है, घर में बड़ी लड़की है तो तू उसका रिश्ता हमेशा गरीब के घर में करके उसे बराबर का बना ले और उसकी हर तरह से इमदाद (सहायता) कर, ताकि गरीब अपनी गुरबत से उठकर अमीर जैसा ही बन जावे। अगर लड़के का रिश्ता करना है तो हमेशा गरीब घर की लड़ की घर में लावे, ताकि समाज में किसी तरह की बुराई पैदा न हो। इस तरह लड़की वाले जो गरीब हों उनकी यह बड़ी इमदाद होती है कि उनकी लड़ की एक अमीर घर में चली जाए। यह एक ऐसा नुक्ता है कि समाज की काया पलट कर देता है और किसी तरह भी गृहस्थियों को परेशान होने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक बार की बात है कि रावलपिण्डी, जो आजकल पाकिस्तान में है, के रहने वाले रईसे आजम सरदार सुजानसिंह अपने चचा के साथ कूरी नामक गांव की तरफ लेन-देन के सिलसिले में जा रहे थे। गांव के बाहिर एक दरख्त के नीचे थकान दूर करने के लिए पड़ाव डाल दिया। आपस में
कुछ घर के विचार चलने लगे कि लड़की बड़ी हो गई है, आगे के वारते कुछ सोचना चाहिए। इतने में एक खूबसूरत नौजवान खच्चरों पर समान लादे हुए दिखाई दिया। गरीबी की वजह से सामान किराए पर इधर-उधर ले जाया करता था। झट ही सरदार जी ने कह दिया कि ऐसा लड़का मिल जावे तो अच्छा है। उसी वक्त लड़के को बुलाया और उसके घर का पता पूछ लिया। वहां से उठे और उसके घर जाकर उसके पिता को नाता दे दिया। लड़के के पिता ने बहुत कहा कि मैं गरीब हूं, आपसे मेरा क्या मुकाबला है? मगर सरदार जी ने धन-दौलत देकर उसको अपने साथ मिला लिया। लड़की की शादी करके लड़के को अच्छे काम पर लगा दिया।
प्रेमी जी, इस तरह से अगर किसी अभावग्रस्त प्राणी की मदद करके उसको अपने पैरों पर खड़ा कर दिया जाए तो समाज का सही सुधार हो सकता है।
उत्तर: थोड़ा लाभ लेने का मतलब यह समझना चाहिए कि अपने आप को उन अशया (वस्तुओं) का खरीदार बना दे जिसको तू बेचने जा रहा है, तब तू ठीक निश्चय कर सकेगा कि उस पर कितना नफा लगाना चाहिए। फिर तेरे सामने बच्चा, बूढ़ा, जवान, अमीर, गरीब, हाकिम, मुलाजिम, राजा, प्रजा कोई भी क्यों न आवे, तू उनसे एक जैसे दाम ले, यानी किसी के साथ भेदभाव न रख। थोड़ा सूद लेने के बारे में प्रेमी, जो शब्द आया है उसका मतलब यह समझना चाहिए कि सूद थोड़ा जरूर लेना चाहिए क्योंकि इसके बगैर तजारत (व्यापार) में काम करते-करते लेन-देन विच (मे) कई रप्पड़ पड़ते हैं, उसी से मूलधन का नाश हो जाता है। सूद खाना एक अच्छी कमाई नहीं है। सूद की तजारत करना कोई अच्छी तजारत नहीं है। अगर मजबूरी में (यह तजारत) करनी ही पड़े तो कम से कम सूद लेना चाहिए क्योकि सूद खाने वालों का धन नाश को प्राप्त हो जाता है।
उत्तर: प्रेमी, आमदनी से कम खर्च रखोगे तब ही सादगी नाल चल सकोगे। बुजुर्गों ने तो यह भी कहा है कि आमदनी का दसवां हिस्सा दान में दे और दसवां हिस्सा राजा को टैक्स दे, बाकी कुछ बचाकर खर्च करोगे तभी सादगी नाल चल सकोगे।
उत्तर: इस जीवन का यही लाभ है कि जब तक तू जीवित है उस परमेश्वर की शरण ले। एकमात्र उसी से प्रेम कर। उसी के वास्ते जी। उसी के लिए काम कर। उसी में तुम्हारी बुद्धि रमण करे, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। प्रेमी, यदि खाना खाओ तो स्वाद के वास्ते नहीं, बल्कि शरीर रक्षा के लिए ग्रहण करो। ऐसी खुराक लो जो शीघ्र पच जावे और उसका बल अधिक समय तक रहे। लिबास (वस्त्र) ऐसे पहनो जो सर्दी गर्मी से बचने के वास्ते काफी हों। तेरी शक्ल जो “कुदरत कामला” ने बना दी है ऐसी ही रहेगी। कपड़ों से तेरी शक्ल नहीं बनेगी। थोड़े पैसे कपड़ों में लगाकर कम खर्च करो। सादे वस्त्र पहनने से मत हिचको। इससे तेरे अन्दर प्रेम बढ़ेगा और कम आमदनी में तेरा गुजारा अच्छा चल जावेगा। अपना व्यवहार गुजरान के अनुकूल बनाओ, धन जमा करके न रख। ऊंचे विचार वालों की संगत कर। प्रभु का सिमरण कर जिससे तेरे अन्दर ठण्डक पैदा हो। यदि इन नियमों पर तू चला तो बहुत कुछ तेरे दिल में खुशी आवेगी और तेरे दिल को असली शान्ति प्राप्त होगी। यह दुनिया एक बड़ी प्यास है, बड़ा मुसीबतखाना है। इससे तू उस प्रभु के नाम का सिमरण करके पार हो सकता है। प्रेमी, सारी रात तुझे मिली है प्रभु की याद करने के लिए और तू उस रात को गुराड़े लेकर गफलत (लापरवाही) की नींद में सोता है। बाहोश हो जा, रात से बढ़कर तू और क्या एकान्त चाहता है? अब भी समझ ले। अब भी समय है। सिमरण, अभ्यास शुरू कर, तेरा अवश्य कल्याण होगा।
उत्तर: लाल जी, बड़ी गहरी बात तुमने पूछी है, यह आसान सा तरीका तुमको बतावेंगे। अगर अमल में ले आए तो सब आसान हो जावेगा। तुमको चाहिए कि अस्थाई रूप से उनके मध्य रहो और व्यवहार करो अर्थात् बाहिर से तो मिला हुआ रहे पर अन्दर से उनसे अलग थलग रहे, अर्थात् हिले मिले नहीं और अन्य काज में भी अनजान सा बना रहे और कहे कि मुझे तो यह पता नहीं जो ठीक समझें कर लें। वह ही बेहतर (उत्तम) होगा। और अधिकतर चुप रहें। इस चुप रहने करके संसारी लोग तेरे से डरने लगेंगे। डरकर स्वयमेव अलग हो जावेंगे और साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि अपनी आत्मिक उन्नति करता जा। एक समय आवेगा तू ऊंचा उठ जावेगा। तेरे आसपास के लोग देखते रह जावेंगे और आप से आप तेरे आगे झुकेंगे और तुझे मानेंगे।
उत्तर: अभी तो तुम लोग सब कुछ लुटा-पुटा कर आए हो, इस तबदीली से कुछ सबक सीखो, न कि अपने आप को इस घोर अन्धकार में ले जाओ। रोजाना इधर से यह ही कहा जा रहा है अपना जीवन सादा और सरल बनाओ। कुदरती जीवन वाले बड़े सुखी रहते हैं। अनेक तरह के फिजूल नशे वगैरह खान पान जो लगा रखे हैं, उनसे अति परहेज करो। सिनेमा, थिएटर, राग रंगों की तरफ मत जाओ। जब तक इन चीजों से परहेज नहीं करोगे तब तक कभी भी बुद्धि शुद्ध नहीं हो सकती। अपने मन को दुनिया वाले खुद चंचल कर रहे हैं। उधर पाकिस्तान की तरफ लोगों के स्वभाव कुछ अच्छे बने हुए थे अब वह सब बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं।
हया शर्म कोई नहीं रही। किसी की बुद्धि में सादगी वाले विचार नहीं रहे, बाकी तप जप तो बड़े दूर की बात है। अच्छे, बड़े बुजुर्गों के पास जाकर बैठो। उनसे कुछ न कुछ शिक्षा प्राप्त करो। जब महापुरुषों के विचार सुनने वाले बनोगे तब फिर किसी समय अमल भी करने लगोगे। जब किसी बाग में जाते हो तो तुम चाहो न चाहो सुगन्ध आवेगी ही। मन को सेवा, सत्संग में लगाने से तेरे अन्दर से कपट छल, फरेब, झूठ अपने आप दूर होने लगेंगे और इस तरह अनेक तरह के कष्ट और मुसीबतों से बच जावेगा। हरएक अपना मित्र और दुश्मन आप है। जो मनमानी दिन-रात कर रहा है, जिसके अन्दर सत् विश्वास नहीं और न ही ईश्वर प्रेम है, वह गलत काम करेगा ही। यही अपना स्वयं दुश्मन बनना है। तुम्हारी कल्याण कोई दूसरा करने वाला नहीं। तुमने अपनी कल्याण आप करनी है। अपनी ही खराब आदतें दुख का रूप धारण करती हैं। सत्संग और सत् सिमरण से जीव मजबूत और पक्के इरादे वाला बन सकता है और अपनी बड़ी-बड़ी खोटी आदतों पर अबूर पा सकता है, जिससे अपनी गलती को गलती समझने की बुद्धि आ जावेगी। तब ही उनसे (गलती से) नफरत भी करोगे। ईश्वर ही इस समय सत् भाव पैदा करे तब ही कल्याण वाला रास्ता समझ में आ सकेगा।
उत्तर: ऐसा सवाल ईसा के आगे भी एक सज्जन ने रखा था। उन्होंने कहा था कि शरीर जहर का समुन्दर है, जितना इसमें डालोगे, जहर हो जायेगा। एक दफा मोहम्मद साहब ने मिस्र के बादशाह को खत भेजा कि इस्लाम कबूल कर लो। उन्होंने इस्लाम कबूल न किया। मगर खत यानि पत्र को बड़ी ताजीम (इज्जत) से लिया। बड़ी इज्जत से हाथी दांत की डिबिया में बंद करके रख लिया और बहुत से तोहफे देकर कासिद (दूत) को वापिस रवाना किया। तोहफे में बहुत से गुलाम, बांदियां, अशियाएं खुरदनी व कपड़े वगैरा भी रवाना किए। साथ एक हकीम भी रवाना कर दिया। जब सब अशयाएं (वस्तुए) मोहम्मद साहब के आगे पेश की गई, तो उन्होंने सब चीजें देखकर तक्सीम (बांटना) कर दीं और हकीम को वापिस कर दिया कि उसकी हमें जरूरत नहीं क्योंकि हम खूब भूख लगने पर खाते हैं। जब थोड़ी भूख बाकी रहती है, खाना-खाना बंद कर देते हैं। उनकी एक बांदी से मोहम्मद साहब की शादी हो गई। मतलब यह कि किस कदर मोहम्मद साहब और उस वक्त के लोगों में सादगी और खान-पान की मर्यादा थी।
उत्तर: प्रेमी, ‘जीव दया और आतम पूजा, तिस समान धर्म नहींदूजा’। ब्यौहार करते समय जायज मुनाफा लेना हक है। चाहे छोटा आए चाहे बड़ा, सबसे एक जैसा सलूक करे। जब तक ब्यौहार और संगत की पवित्रता नहीं आती तब तक बुद्धि शुद्ध नहीं होती। नित का कर्म पवित्र करो। जो भी तुमसे सौदा लेने आए उसे ईश्वर रूप जानो। उससे नेक बर्ताव करो। उसे ठीक चीज दो, ठीक रकम लो। वह भी खुश जाए और तुम्हारा काम भी हो जाए। खोटी कमाई आती हुई अच्छी लगती है, मगर जब उसके जाने का समय आता है तब बहुत दुख देती है। हक की कमाई तीन काल सुखदाई है। फिर हक की कमाई करके पुण्य दान करो। गरीबों यतीमों की सेवा करो। बिना किसी ख्वाहिश के सेवा करते हुए यानि निष्काम भाव से करके ईश्वर अर्पण कर दो। ऐसा मन का शुद्ध भाव बनाओ। फिर आहार भक्ष्य-अभक्ष न हो। पवित्र सादा दाल रोटी सेवन करे। लाल जी, ऐसा जीवन बनाओ जिससे मन, तन ठंडा रहे। दो घड़ी सुबह व शाम मालिक की याद, जैसी किसी गुरु ने बताई हुई है, प्रेम से करो। किसी का दिल न दुखायें। जबान के पक्के रहना चाहिए। किसी से कोई वायदा करो तो उसे पूरा करो और हर कीमत पर निभाओ। घर में बुजुर्गों की सेवा का लाजमी ख्याल रखो। अपने पुराने ग्रन्थों शास्त्रों का विचार करें। सत्पुरुषों, संत महात्माओं की संगत में समय दें। इस तरह सत्कर्म करते-करते आप ही रंग लग जावेगा। अगर सत् का कुछ चाव हो तो मालिक आप ही राह खोल देता है। प्रेमियों जो कुछ सुना है इसे दिल के कोने में जगह देना। नेक अमल की रत्ती भी भागशाली बना देती है। फकीरों ने ईश्वर का हुक्म सुनाना है, मानोगे तो सफलता प्राप्त कर लोगे।
उत्तर: अगर कोई शख्स बिना वजह तेरे साथ ईर्ष्या बनाए रखता है. तो तू उसका भला ही सोच। फिर भी अगर वह शख्स तेरे खिलाफ कोई बात करता है और तू भी मुद्दत तक उसके साथ कपट बनाए रखता है या उसका कत्ल करने की कोशिश करता है, तो गुरुमुख और मनमुख में क्या
फर्क हुआ। जब किसी की झूठी और नाशयस्ता (अनुचित) बातों का इस कद्र असर तेरे मन या चित्त पर होता है, तो जरूरी है कि तेरी सच्ची भावनाओं का असर भी उसके मन पर जरूर होगा बल्कि बढ़कर होगा। तू अपने मन चित्त को साफ रख।
उत्तर: किसी हद तक तुम्हारा विचार ठीक है। हरएक के साथ एक
जैसा सलूक हो। रोटी, कपड़ा, रहन सहन सबका बंदोबस्त हो। मगर अमीरों को लूटकर गरीबों में तकसीम कर देने से न हो सकेगा। बल्कि इखलाकी तालीम (सदाचारी शिक्षा) देने से होगा। जब तक पहले जनता विचारवान नहीं होती तब तक किसी बात को सही न समझ सकेगी। सिर्फ रोटी, कपड़ा मकान सबको मिल जाने से मसला हल नहीं हो जाता। न ही एक जैसा सबको कर सकते हैं। जमीदार, साधारण आदमी एक जैसे नहीं हो सकते। यह हो सकता है कि सबका विचार दुख भरा सुना जाए और उनकी सेवा का बंदोबस्त अच्छे से अच्छा किया जाये। बताओ तुम्हारी कितनी आमदनी है? महीने के बाद उसको कितने आदमियों में बांटते हो? कितनों को तुमने अपने जैसा बनाया है या खाली खुश्क स्कीमें ही हरएक के आगे पेश करते हो?
इस पर वह प्रेमी खामोश हो गया। फिर श्री महाराज जी ने फरमाया, “प्रेमी, पहले अमली जीवन बनाओ फिर कोई तुम्हारी बात सुनेगा।”
उत्तर: प्रेमी, किसी कौम और मुल्क की दायमी (स्थायी) तरक्की महज़ (केवल) मानसिक ख्वाहिशात यानी जरूरियाते-ज़िन्दगी को निहायत बढ़ाने से कायम नहीं रहती है-जब तक कि त्याग स्वरूप रूहानी ज़िन्दगी की साथ-साथ तहकीकात (खोज) न की जावे। ज़रूरियाते-जिन्दगी की ज़्यादती अक्सर तबाही कर देती है। यह दृढ़ निश्चय होना चाहिए।
हरएक जीव शारीरिक कैद में अपनी-अपनी आर्थिक हालत में लगा हुआ ही रहता है। इसमें कोई ज़्यादा गौर की ज़रूरत नहीं है। स्वभाव-वश हो करके मानुष को ऐसा ज़रूरी करना पड़ता है। गौर इस बात की करनी चाहिए कि आर्थिक तरक्की किस हद तक होनी चाहिए? और उस आर्थिक उन्नति में मानुष का क्या फर्ज़ होना चाहिए, जिससे वह आर्थिक उन्नति को प्राप्त करके महज़ (केवल) विषयाचारी ही न बन जावे। सो इसके मुतल्लिक गौर करने का न किसी बुद्धिमान को मौका मिला है और न ही कोई ज़रूरत समझते हैं। आम लोग तो महज़ आर्थिक तरक्की करके अपने आपको विषयाचारी बनाने के यत्न में लगे हुए हैं, जो थोड़े ही समय में तमाम उन्नति को नाश के स्वरूप में देखेंगे। यह प्रकृति का खेल है। खास निर्णय यह है कि अध्यात्मवाद के सहित आर्थिक तरक्की कल्याणकारी है। इस वास्ते इन सब हालतों का विचार करके सही आर्थिक उन्नति करना, जिससे अध्यात्मवाद परम पवित्रता का निश्चय बना रहे (कल्याण के देने वाला यत्न है)। सही आर्थिक उन्नति असली कल्याण के देने वाली है और समता के अनुकूल है।