Man ,Buddhi tatha Ehankaar(मन, बुद्धि तथा अहंकार)

प्रश्न 48: मन क्या है?

उत्तर: मनन करना। ज्ञान और कर्म इन्द्रियों के भोगों की चेष्टा को मनन करने वाली शक्ति को मन कहते हैं।

प्रश्न 49: महाराज जी, मन को वश में करने का तरीका क्या है?

उत्तर: प्रेमी, पहले जीवन के सही और गलत हालात को समझो। जीवन के हालात को हरएक समझता है। मगर सही नहीं समझ रहा है और सही न समझने के कारण गलत हालात को पकड़ रहा है। मन एक ऐसी चीज है कि जब तक गलत और सही का निर्णय न समझे यह सही की तरफ नहीं जाएगा। मन को पकड़ने का तरीका ईश्वर के परायण होना है। इस तरीका को किसी महात्मा से प्राप्त करके हृदय से धारण करो, सही निश्चय से इसे पकड़ो। उसी तरीका को धारण करते-करते मन बस में हो जाएगा।

प्रश्न 50: महाराज जी, मन सत् परायण कैसे होता है?

उत्तर: प्रेमी, भय से मन सत् परायण होता है। इस वास्ते मौत का भय या गुरु का भय या ईश्वर का भय मानुष के वास्ते होना लाज़मी है। ऐसे भय की दृढ़ता से भाव पैदा होता है, यानि अपनी जीवन उन्नति का विचार प्रकट होता है। भाव से भक्ति और भक्ति से निर्मल प्रेम प्राप्त होता है। यह ही दृढ़ता मानसिक शांति के देने वाली है।

प्रश्न 51: महाराज जी, ऐसी कौन-सी युक्ति है जिससे मन ठिकाने लग जावे ?

उत्तर: हां प्रेमी, यह बड़ा ज़रूरी है। इसे अच्छी तरह समझो। मन को ठिकाने लगाने के लिए चार बातें जरूरी हैं। इनके प्राप्त होने पर मन ठिकाने लग जाता है। मगर यह बात बड़ी जरूरी है कि तुम्हारे अन्दर यह भाव पैदा होना चाहिए कि मैंने अपने मन को ठिकाने लगाकर रहना है-
(1) निश्चय दुरुस्त
(2) रास्ता दुरुस्त
(3) गुरु दुरुस्त
(4) कोशिश दुरुस्त।

प्रश्न 52: महाराज जी, मन चंचल तो पवन से भी अधिक है। बड़ी कोशिश की जाती है, एक धारा पर नहीं आता। आसान युक्ति कृपा करके फरमाएं जिससे चित्त ठहर जावे?

उत्तर: प्रेमी, जिन्होंने सिर पर छाई डाल रखी है, बड़ी जटा बढ़ा रखी है, धूनियां तापते हैं, उल्टे लटकते हैं, पानी में खड़े होकर तप करते हैं, तब भी उनका मन रास्ते पर नहीं आता। मन बड़ा विकराल है। साहिब से प्रेम बनाओ। संसार की प्रीति विल्कुल खत्म कर दो। शरीर रूपी पिंजर को सुखा दो। तब जाकर तार अन्तर विखे खड़केगी। मालिक की कृपा तो रग-रग में हो रही है। अन्तर्मुख होकर सुनो। मन, बुद्धि, इन्द्रियों का विषय नहीं। इन आंखों से देखा नहीं जाता, यह कान श्रवण नहीं कर सकते, रसना चाख नहीं सकती, कर्म इन्द्रियों द्वारा महसूस होने वाला नहीं जो तुम्हें पकड़ कर दिखा दिया जावे। यह अपने स्वयं के अनुभव का मार्ग है।

नाम प्रभु हिरदे बसे, मन पवन कीजे इक ठौर।
अन्तर माही शब्द परगासे, सुरत भायी मखमूर ।।
रोम रोम में नित गुजारे, शब्द पुरख निर्वान।
प्राण उपान को समकर राखे, निरखे अनहद तान ।।
पिंड ब्र‌ह्माण्ड की सोझी पावे, मन वच कर्म कीजे इक ठौर।
गगनगुफा बहती अमृत धारा, पीवे कोई गुरुमुख सूर ।।
आशा तृष्णा जेबड़ी, बांधे चराचर भूत।
माया प्रभु की असचरज है, साध के पाएं वस्त अनूप ।।
जन्म-जन्म का टूटा गांडे, पाए चित्त परतीत।
निर्मल कर्म को धार के, चलियो भवजल जीत ।।
काची काया में अमृत भरया, नित बोले नित बानी।
नित-नित ध्यान धरो प्रभाती, कटे कर्म की खानी ।।
भाग होए अन्तर चानन होया, पाई गत निर्वास ।
‘मंगत’ सरब का ठाकुर पायो, आदि निरंजन अविगत अविनास ।।

प्रेमी, उसके बगैर कोई दूसरा हो तो उसे समझाया जावे। सव जियाजन्त उस मालिक का रूप हैं। रास्ता तुमको पता ही है। जिस प्रेम से संसार की तरफ दौड़ते हो, इससे दुगने प्रेम से यदि मालिक के चरणों में मन चित्त दो तो काम बन जावे। निर्मोह होकर चलना बड़ा ही कठिन है-

चलो चलो सब कोई कहे, बिरला पहुंचे कोय।
जां को सत्गुरु मिलनगे, तां को मालुम होये ।।

फिर कभी आना हुआ तो और पूछ लेना। इतने दिन इधर ठहरे रहे, क्या सोचते रहे हो? जाओ, अब आराम करो। फकीरों के पास ज्यादा न बैठा करो-

घर फूंका जिन अपना, लिया चोहाता हाथ।
अब फूंकेंगे उसका, जो चले हमारे साथ।।

प्रश्न 53: महाराज जी, मन बड़ा विकराल है। इससे किस प्रकार छुटकारा पाया जा सकता है?

उत्तर: प्रेमी, मन ही इसका मित्र है। चाहे इसको विषयों की तरफ लगा दो, चाहे करतार की तरफ। यह एक समय में एक ही काम करेगा। दोनों हालतों में मन, इन्द्रियां, बुद्धि ये ही रहती हैं। सिर्फ इनका स्वभाव बदल जाता है। स्वभाव बदलने के वास्ते वैराग्य और अभ्यास है, और कोई भी साधन ऐसा नहीं है जिसके द्वारा ठिकाने पर पहुंच सके। इस तरह विचार करते रहा करो, किसी ठिकाने पर पहुंचना है तो।

प्रश्न 54: महाराज जी, मेरे मन की स्थिति कभी-कभी इस प्रकार हो जाती है कि किसी काम में तथा किसी भी अवस्था में तबीयत नहीं लगती। मन उचाट हो जाता है और बड़ी बेचैनी प्रतीत होती है। क्या आप कृपा करके इसका कारण बतलाऐंगे? और साथ ही इसका उपाय भी जानना चाहता हूं।

उत्तर: प्रेमी जी, अपने जीवन का सही लक्ष्य और उसके पहुंचने का प्रोग्राम न बनने के कारण ऐसी हालत का सामना करना पड़ता है, सो निश्चय करके जानो।

प्रश्न 55: महाराज जी, यदि ऐसा ही है तो वह अवस्था हर समय रहनी चाहिए। परन्तु यह देखा गया है कि ऐसी अवस्था कभी-कभी आती है। कृपा करके इसे समझाएं।

उत्तर: हां, यह मन बड़ा चालाक है। कोई न कोई उम्मीद खड़ी कर ही लेता है और उसी आशा में, जो उसने निश्चय कर ली है, अपने आप को लगाए रखता है। और उसी आशा को पूर्ण करने की खातिर यत्न भी करता है तथा बड़े जोश के साथ उसी उधेड़-बुन में लगा रहता है। इसी कारण पता नहीं चलता। वास्तव में इस शरीर में तीन गुण मौजूद हैं। जब सतोगुण प्रधान होता है तो बुद्धि शान्त होकर कुछ सुख अनुभव करती है। जब रजोगुण प्रधान होता है तो बुद्धि चंचलता को धारण करके सांसारिक क्रियाओं में प्रवृत्त होती है और एक लम्हा भर शान्ति से नहीं बैठ सकती। जब तमोगुण प्रधान होता है तो यह अवस्था आ जाती है जैसा कि तुम्हारा प्रश्न है अर्थात् बुद्धि हर समय डांवाडोल रहती है और बड़ी बेचैनी महसूस होती है। आलस्य तथा प्रमाद की प्रधानता हो जाती है। ऐसा ही यह अद्भुत खेल माया चक्र संसार है। तुमको चाहिए कि अपने जीवन का एक लक्ष्य निश्चित करो और फिर उसके प्राप्त करने के लिए अपनी ज़िन्दगी का प्रोग्राम बनाओ और फिर कमर कसकर उस पर चल पड़ो, तो फिर इन सब अवस्थाओं से अबूर (छुटकारा) पा जाओगे।

प्रश्न 56: वैसे तो मन चंचल होने जैसा कोई पदार्थ नहीं, किन्तु इससे हटकर क्या और भी कुछ है?

उत्तर: हां प्रेमी, धन, उम्र और जवानी यह कमल पर जिस तरह पानी की बूंद ठहरती है, केवल मात्र उसी तरह स्थिर दृष्टि होते हैं।

प्रश्न 57: महाराज जी, हम ग्रन्थ साहब की वाणी का पाठ करते हैं परन्तु मन की बेचैनी दूर नहीं होती। कृपया हमें मन की शान्ति का सही रास्ता दिखाएं

उत्तर:
प्रेमी रोजाना गुरु वाणी में पढ़ते हो-
: जां का हिरदा शुद्ध है, खोज शब्द में ले।
इसका क्या मतलब है? वाणी का पाठ करते-करते कितनी आयु बीत गई क्या इस बात का पता नहीं लगा है?
गुरु लोभी शिष्य लालची, दोनों खेडन दांव ।
बाबे की वाणी गलत नहीं है तुम आगे की खोज नहीं करना चाहते। शब्द स्वरूप परमेश्वर घट-घट में प्रकाश कर रहा है। गुरुओं ने कहा है नाम रूपी मदिरा पीओ, तुम ठूठे चढ़ाने लगे हो।
‘नाम खुमारी नानका, चढ़ी रहे दिन रात’।
बार-बार सारे ग्रंथ में नाम की महिमा गाई गई है। इसलिए इस सत्नाम का जब तक लगातार चिन्तन-मनन न करोगे, प्रेमी, शब्द का पार नहीं पा सकते। तुमने मांस को झटका करके खाना प्रधान कर रखा है, मुसलमानों ने हलाल करके खाना जायज़ मान रखा है। कौन सी आप लोगों ने गुरुओं की बात मान रखी है। किसी भी सत्पुरुष ने भक्षा-भक्ष्य खाने की इजाज़त नहीं दी है। खाली कच्छा कड़ा धारण करने से क्या बुद्धि निर्मल होती है? सत् विश्वास रूपी केश धारण करो, ज्ञान रूपी कंधी से अज्ञानता दूर करो, प्रेम रूपी पुंगी सिर पर बांधो। महापुरुषों ने परोपकार रूपी कड़ा पहनाया था ताकि यह सत् भाव कभी न भूले। लज्जया, शर्म-पत का कच्छा धारण करें। जत (यतिपन) का खण्डा हाथ में ले तब गुरु का सच्चा शिष्य कहलाने का हकदार है। धर्म मार्ग में अहिंसा रूपी तप बहुत जरूरी है। मन, वचन द्वारा भी सख्त अक्खर (कठोर वचन) न सोचने बोलने की आज्ञा जहां सत्पुरुष देते हैं वहां वह बे जवान जीवों का गला काटने की तालीम कैसे दे सकते हैं। अब तो आम लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है। जन्म-जन्मान्तर की भरमना गुरु कृपा से ही दूर होती आई है। सच्चा सिख वही है जो सब पाखण्डवाद को छोड़कर गुरु वचन में भेंट हो जावे। जब तक कर्म निर्मल नहीं होते, बोल स्वच्छ नहीं होता और मन चित्त का साधन जुगति (युक्ति) अनुकूल नहीं बनता तब तक कैसे उस अलख पुरुष को पा सकते हो। जब कमाई करके शब्द प्रगट होगा तब असली गुरु के द्वारे (गुरुद्वारों) की भी समझ आ जावेगी और तभी जाकर मन शान्त होगा।

प्रश्न 61: बुद्धि क्या है?

उत्तर: निश्चय करना। मन के दोषों को अच्छा या बुरा समझने वाली शक्ति को बुद्धि कहते हैं।

प्रश्न 62: महाराज जी, बुद्धि के आगे परदे कौन-कौन से है?

उत्तर: प्रेमी, बुद्धि के आगे परदे हैं कर्ममई सृष्टि, वासनामई सृष्टि, गुणमई सृष्टि। इनको आधिभौतिक सृष्टि, आधिदैविक सृष्टि और आध्यात्मिक सृष्टि भी कहते हैं। यह ही त्रिलोक है। इन परदों को दूर करने वाला ही त्रिलोकीनाथ है। गुण से वासना प्रगट होती है, वासना से कर्म और कर्मफल। शरीर, मन, बुद्धि यह ही तीन लोक हैं।

प्रश्न 63: महाराज जी, बुद्धि वासना रहित कैसे होती है?

उत्तर: शरीर वासना का समुद्र है। आत्मा वासना व कर्म से न्यारा है। बुद्धि शरीर को समझ रही है और इसकी वासना को भी समझ रही है। जब तक आत्मा को नहीं समझती, वासना रहित नहीं होती। जो साधन सत्पुरुषों ने आत्म अनुभवता को प्राप्त करने के बतलाये हैं, उन्हें धारण करो। तब बुद्धि वासना रहित हो जावेगी।

प्रश्न 64: महाराज जी, यह कैसे समझा जाए कि हम सत् स्वरूप की तरफ बढ़ रहे हैं। हमारा तो हर कार्य प्रकृति की फैलावट में ही रहता है और उसके इकट्ठा करने के लिए दिन-रात लगे रहते हैं। कृपा करके समझावें कि यह क्या बात है?

उत्तर: प्रेमी जी, तुम ठीक कह रहे हो। प्रकृति में ही सब कर्म होते हैं और तुम्हारी बुद्धि अहंकार में स्थित होकर कर्मों की कर्त्ता बनती है। जब बुद्धि आत्म-तत्त्व में लीन हो जाती है तो प्रकृक्ति शरीर द्वारा जो कर्म करवाती है, वह स्वयं उसे भोगती है और बुद्धि निःकर्म अवस्था को प्राप्त हो जाती है। इस हालत में शरीर प्रकृति द्वारा सहज कर्म करता हुआ चलता रहता है। शरीर का समय पूरा होने पर शरीर नाश को प्राप्त हो जाता है। निःकर्म बुद्धि का इससे कोई ताल्लुक नहीं रहता। मिसाल के तौर पर यह समझो कि जैसे आंख का काम है देखना, वह देखेगी ज़रूर परन्तु उसमें अच्छा बुरा अनुभव नहीं करेगी। जीभ खायेगी भी परन्तु किसी प्रकार का रस ग्रहण नहीं करेगी। ऐसी हालत में जब बुद्धि हो जावे तब ही निःसंग हालत प्राप्त हुई समझो। जैसे-जैसे बुद्धि आत्म तत्त्व में स्थित होती जाएगी वैसे-वैसे सब सुख भोग, जो शरीर की इन्द्रियों द्वारा प्रतीत होते हैं, उनमें उसे बेलागपन, बेरसपन पैदा हो जाएगा। तब समझना कि तुम उस आत्म-तत्त्व की तरफ बढ़ रहे हो।

प्रश्न 65: महाराज जी, जब जीव सत् स्वरूप में स्थित हो जाता है तो उसकी बुद्धि की क्या स्थिति होती है?

उत्तर: प्रेमी जी, बुद्धि नाम की चीज सत् स्वरूप में स्थित होने पर रहती ही नहीं। सब एक आत्मस्वरूप ही भासता है। उस स्थिति में तमाम प्रकार के तर्क-वितर्क खत्म हो जाते हैं। अगर मगर, क्यों-क्या अगर बनी रहे तो फिर सत् स्वरूप की स्थिति नहीं है। वह कोई बुद्धि की अपूर्ण हालत है।

प्रश्न 66: महाराज जी, बुद्धि का क्या काम है?

उत्तर: प्रेमी, बुद्धि का काम है सोचना, निर्णय करना और खोज करना।

प्रश्न 67: महाराज जी बुद्धि की क्या खुराक है?

उत्तर: प्रेमी, बुद्धि विचार की खुराक खाती है। जिस प्रकार के विचार इसको खाने के लिए मिलेंगे वैसा ही असली मानों में बुद्धि का स्वरूप बन जावेगा। इसलिए सत्पुरुष हमेशा विचार की पवित्रता पर जोर देते हैं।

प्रश्न 68: महाराज जी, अक्ले सलीम या उत्तम बुद्धि किसे कहते हैं?

उत्तर: जिस बुद्धि का ऐसा निश्चय पक्का हो जाता है कि एक ईश्वर सत् है और बाकी जो कुछ भी नाम रूप संसार है वह फनाह (नाशवान) है तो उसी कुल होश बुद्धि को ‘अक्ले सलीम’ कहते हैं। बुद्धि की चार अवस्थाएं हैं, वह भी सुन लो।
(1) बेहोश बुद्धि
(2) मदहोश बुद्धि
(3) बाहोश बुद्धि
(4) कुल होश बुद्धि यानि ‘अक्ले सलीम’
बेहोश बुद्धि-बिना सोचे विचारे जो बुद्धि देखा-देखी चलती है और संसार में विचरती है जिसको कुछ पता ही नहीं। कुछ बस ऐसे ही अपने काम में लगी हुई है। ऐसी बुद्धि वाले मनुष्य तुम्हें आम मिलेंगे।
मदहोश बुद्धि-बुद्धि यह जानती है कि क्या ठीक है और क्या गलत है परन्तु जानबूझकर वह गलत काम करती है। ऐसी बुद्धि वाले मनुष्य तुम्हें काफी मिलेंगे।
बाहोश बुद्धि- जो बुद्धि ठीक समझती है और ठीक उसके अनुसार सही आचरण भी करती है। ऐसी बुद्धि वाले मनुष्य ‘बाहोश’ होते हैं। ये बहुत कम नज़र आते हैं और होते भी थोड़े हैं।
कुलहोश बुद्धि यह आखिरी मंज़िल (अन्तिम स्थिति) है ऐसी बुद्धि वाले पुरुष को ‘अक्ले सलीम’ रखने वाला पुरुष कहा गया है, उसने ही असल में सही तौर से जाना है और समझा है और अपने आप को इस त्रयगुणी नाम-रूपात्मक संसार से असंग करके केवल अखण्ड अविनाशी शब्द में पूर्ण निश्चय से स्थिति प्राप्त की है।

प्रश्न 69: मनुष्य को विद्या, ज्ञान की चाह क्यों बनी रहती है? भौतिक जगत की जितनी खोज बुद्धि करती है उतनी ही क्लेश को प्राप्त होती है। महाराज जी, ऐसा क्यों, कृपया इसे स्पष्ट करें।

उत्तर: बुद्धि का स्वभाव तहकीकात (छानबीन) करना है। जब तक पूर्ण बोध आत्म स्वरूप का प्राप्त नहीं होता तब तक इसकी तहकीकात-दर-तहकीकात की इच्छा बनी रहती है।
‘माया परस्ती’ की तहकीकात अधिक से अधिक रंज व गम (संताप) और खोज दर खोज को बढ़ाने वाली है अर्थात् ठहराव या पूर्ण शान्ति कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। यह ही खेद स्वरूप संसार है। जब बुद्धि सत् तत्व आत्म स्वरूप की खोज में लगती है तब पूर्णता को प्राप्त होती है अथवा पूर्ण बोध, पूर्ण सूझ को प्राप्त करके शान्त हो जाती है। इस अवस्था को ‘निर्वाण’ कहा गया है। सत् की खोज के बिना जितनी भी कोशिश है वह शोक और संताप को देने वाली है जैसी कि प्रायः विद्वानों की अवस्था होती है।

प्रश्न 70: महाराज जी, बुद्धि की ‘जड़’ और ‘जागृत’ अवस्था को समझावें।

उत्तर: लाल जी, जितनी बुद्धि जड़ होती है, अहंकार वाली होती है, वह शरीर को अच्छा और भला करके देखती है। अथवा शरीर के इन्द्रिय सम्बंधी सुखों को अपना सार साधन मानकर उनको ही मुहैया (प्राप्त) करने में अपना समय व्यतीत कर देती है, लेकिन जागृत बुद्धि जब मनुष्य की होती है तो उसे यह दीखने लगता है कि यह शरीर नाशवान है। इस शरीर में कोई भी ऐसी चीज नहीं जिसमें दिल लगाया जावे। ऐसा विचार जब इसका परिपक्व होता है तो उस समय प्रभु प्रेम पैदा होता है और वह बुद्धि विचार करती है कि जिस महान शक्ति ने उसे बनाया है क्यों न उसकी बन्दगी (याद) की जावे। फिर प्रभु के याद करने से जितना प्रेम इस शरीर से है उससे अधिक प्रेम से परमात्मा की तरफ लग जाता है। महापुरुषों की यह ही निशानी है कि वह अपनी चेष्टा शरीर में न रखकर शरीर की प्रकाशक शक्ति में रखते हैं-

अमृत छोड़कर बिख को खावे, यह देखा संसार।
बिख को छोड़ जो अमृत खावे, सो विरला बलहार।।

प्रश्न 71: अहंकार क्या है?

उत्तर: कर्म का कर्त्ता बनना।

प्रश्न 72: महाराज जी, यह कर्त्तापन या अभिमान ‘मैं करता हूं’ ऐसा भाव किधर से आया। ईश्वर को क्या जरूरत पड़ी थी इतनी लम्बी चौड़ी सृष्टि बनाने की

उत्तर: प्रेमी, कर्त्तापन कहां से आया, इसका कारण आज तक किसी ने नहीं बताया। यह भाव तो ऐसे पैदा हुआ जैसे जल में तरंग पैदा होती है। इसका कारण कौन बताए? जिस प्रकार तरंग और जल भिन्न नहीं एक ही वस्तु हैं तथा सूक्ष्म रूप से देखने से तरंग का स्वरूप लोप हो जाता है और जल ही जल रह जाता है उसी प्रकार संसार का भी आत्म सत्ता के अलावा अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है। इसी को भ्रम, अन्धकार, अविद्या, अज्ञान कहते हैं जिसका न शुरू है, न आखिर। दरम्यान में आश्चर्यजनक फैलाव दिखाई दे रहा है। बाकी जब उस परम सत्ता आत्मानन्द में बुद्धि प्रवेश करती है, उस अवस्था में संसार का नामो-निशान नहीं रहता। यह आश्चर्य अवस्था है। जब तक आंख खुली है इसमें जीव ग्रस्त है। जन्म से लेकर मरण काल तक किसी चीज की प्राप्ति-अप्राप्ति से असली खुशी समता शान्ति को प्राप्त नहीं हो सकता। जब तक ग्रहण-त्याग, रग़बत नफरत (लगाव व घृणा) का सिलसिला जारी है तब तक दुखी रहता है। राजा से लेकर रंक तक, ब्रहमा से लेकर चींटी तक, हर एक जीव भयभीत है। जब तक एकाग्र चित्त से इस मोहमाया के जाल का विचार न किया जाए, तब तक असलियत का पता नहीं लग सकता।

प्रश्न 73: महाराज जी, यह कर्त्तापन कहां से और क्यों पैदा हो जाता है?

उत्तर: ‘मैं’ रूपी अहंकार या कर्त्तापन के पैदा होने का कोई कारण नहीं है। बगैर कारण के ही यह खेल हो रहा है। यह ही उपाधि जीव को लगी हुई है। इसे ही अनवर चित् माया कहा गया है जो विस्माद स्वरूप है। कर्म का जीव अभिमानी होकर भोगों की इच्छा लेकर अनेक तरह के यत्न-प्रयत्न में दिन रात लगा हुआ है। जब कर्म करके फल प्राप्त होता है तब उसके राग द्वेष में अग्नि की तरह पल-पल विखे तपायमान होता रहता है। यह ऐसा आश्चर्य खेल है। एक पलक के वास्ते भी जीव उसे छोड़ना नहीं चाहता, नछूट सकता है। अनेक तरह के यत्न करने पर भी कर्त्तापन नहीं जाता। विकारों की मूल जड़ यह ही है। जब तक बुद्धि यह समझ रही है, मैं और मेरा शरीर, तब तक विकार साथ ही हैं।

प्रश्न 74: महाराज जी फायलियत और अनानियत किसे कहते हैं?

उत्तर: प्रेमी, फायलियत कर्त्तापन को कहते हैं और अनानियत अहंकार को कहते हैं।

प्रश्न 75: महाराज जी, अहंकार का क्या स्वरूप है?

उत्तर: प्रेमी, द्वन्द्व को महसूस करने वाली चीज अहंकार है।

प्रश्न 76: महाराज जी, क्या हम अंधमति हैं?

उत्तर: प्रेमी, जब तक जीव कर्त्तापन के चंगुल में फंसा हुआ है यानि हौमें के रोग में मुवतला (ग्रस्त) है तब तक तृष्णा की अग्नि से शीतल नहीं हो सकता। तृष्णा द्वारा हर समय शुभ अशुभ कर्म हो रहे हैं। इस द्वन्द्व विकार कर्म जड़ से तब ही छुटकारा होगा जब मन से सत्नाम का उच्चारण करेगा। द्वन्द्व विकार से राग द्वेष पैदा होते हैं। राग द्वेष, ग्रहण, त्याग, प्राप्ति, अप्राप्ति से जीव लाचार होता है। इस भ्रम की फांसी में मुबतला हुआ जीव सत्नाम के बिना खुलासी (छुटकारा) नहीं पा सकता। सत्नाम सत्श्रद्धा, दृढ़ विश्वास से लिया जाता है। नाशवान दुख भरे संसार से तब ही जाकर छुटकारा प्राप्त होता है जब किसी महापुरुष के चरणों में जाने का सौभाग्य प्राप्त हो और नम्र भाव से उनसे शिक्षा ग्रहण करे। फिर बड़े यत्न, प्रयत्न द्वारा चिरकाल के बाद विवेक बुद्धि पैदा होती है, तब जाकर द्वन्द्व चक्कर से आजाद होता है। पूर्ण यत्न द्वारा ही भरम का नाश होता है। सच्ची प्रीति ही मुक्ति प्रदान करती है, तब जाकर कर्म के बंधन से छुटकारा पाकर निष्कर्म अवस्था में प्रवेश करता है। बस फिर आगे जाने का रास्ता खुल जाता है। लेकिन यत्न यानि त्याग, वैराग्य, अभ्यास के बगैर कुछ नहीं बन सकता। मैं पन यानी अभिमान गंवाना आसान बात नहीं।
जंगल बेले ढूंढत फिरी, बहु विध जतन कमानी।

‘मंगत’ खाक खलक सर डारी, तब वा घर भेद पिछानी।।
बिन गुरु भेद न पाया, लखी न नाम तत् सार।
‘मंगत’ जब सत्पुरुष भेंटया, गई त्रिखा संसार।।
अंतर शब्द परगासया, भेंट हुई भगवान।
‘मंगत’ उपरस मनवा भाया, पाया पद निर्वान।।
कहता हूँ कह जात हूं, परसो नाम तत्‌सार।
‘मंगत’ सत् यत्न सत् विश्वास से, परगट हुए मुरार।।

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