उत्तर: बुद्धि नाशवान दुःख रूप इन्द्रियों के भोगों में अविनाशी सुख प्रतीत करती हुई नित ही इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होकर नाना प्रकार के भोग भोगती है। मगर नित ही अशांत और भयभीत रहती है। आखिर शरीर विनाश को प्राप्त होता है और बुद्धि अधिक संकट लेकर इस शरीर से जुदा होती है। फिर वासना अनुसार दूसरे शरीर को धारण करती है। इसी तरह शारीरिक भोगों की आसक्ति को धारण करके अनेक योनियों में विचरती है और दुःख-सुख में भरमती रहती है। यह ही आवागमन रूप संसार है।
उत्तर: जीव के देह धारण करने का कारण कामना है। जिस वक्त कामना अन्तःकरण से प्रकट हुई उस वक्त देह की कैद में आ गया अर्थात् देह स्वरूप को धारण करके जीव अपनी कामना पूर्ण करने की कोशिश करने लगा। इस कामना का नाम ही माया भ्रम है।
उत्तर: देह के नाश होने से जीव दूसरी देह को धारण करता है, उसी क्षण में अपनी ख्वाहिश के मुताबिक। यह उपदेश अर्जुन को श्रीकृष्ण ने समझाया है कि जैसे मनुष्य पुराने कपड़े उतारकर नये धारण कर लेता है, उसी तरह एक देह से दूसरी देह में जीव प्रवेश करता है। नग्न हालत अर्थात् बगैर योनि प्रवेश के एक लम्हा (क्षण) भी अलग नहीं रह सकता।
उत्तर: जब तक भोग वासनायें चित्त में उत्पन्न होती रहती हैं, जीव चाहे जिस हालत में भी रहे भटकन बनी रहती है, जीव का सफर ख़त्म नहीं हो सकता यानि ठिकाने नहीं लग सकता। शारीरिक यात्रा का सफर खत्म हो जाने से इसकी खुलासी नहीं हो जाती। एक शरीर छोड़ने के बाद दूसरा शरीर धारण करने तक कोई देर नहीं लगती। जिस तरह जोंक चल रही है, (इशारा जोंक की तरफ करते हुए) अगला मुंह जब तक तिनका पकड़ नहीं लेता तब तक पिछला हिस्सा उठाकर आगे नहीं बढ़ती, यह ही हर एक जीव का हाल है। जिस भी शरीर में जीव रहे हर तरह की शारीरिक कैद दुख का ही स्वरूप है। भोग वासनायें बार-बार जीव को जन्म-मरण के चक्कर में ले जाती हैं। राजा, राना, अमीर, गरीब, भिखारी, पशु, पक्षी या जल में विचरने वाले या आकाश में उड़ने वाले सब भोग वासना को पूर्ण करने में लगे हुए भटक रहे हैं। किसी भी आकारमई हालत में हो किसी को आराम नहीं। बगैर तत्व ज्ञान के कभी भी जीव इस जीवन संग्राम में शांति नहीं पा सकता। न ही इसका सफर पूरा होता है। पशु, पक्षी, जमीन के अन्दर रहने वाले कीड़े मकोड़े, सांप, लाखों किस्म के शरीरधारी जीव जो हैं, अपनी-अपनी प्रकृति का ज्ञान सबको है। मगर तत्व ज्ञान इस मनुष्य देह में ही पाकर बन्धन से जीव निर्बन्धन हो सकता है। दूसरी रूहों को छोड़ो। अपनी रूह की बन्धन अवस्था को पहले जानो और फिर बन्धन से निर्बन्ध होने की सोचो।
उत्तर: प्रेमी जी, शरीर की कोई खास उम्र नहीं होती। कर्म के मुताबिक शरीर बनता है और कर्म के मुताबिक बिगड़ता है। कोई खास मियाद बिगड़ने की नहीं होती है। वास्तव में शरीर ही कर्म रूप है। इसको क्षणभंगुर कहा गया है अर्थात् एक पलक में नाश होने वाला। इस वास्ते जो भी समय जीवन-यात्रा का गुज़रे, पवित्र भाव से गुजारना चाहिए। यह ही लाभ इस नाशवान शरीर का है।
उत्तर: प्रेमी जी! भावार्थ तो यह है कि मेरी इतनी लम्बी उम्र हो कि मैं अपने निज स्वरूप की प्राप्ति कर सकूं और फिर बाकी ज़िन्दगी जनता की सेवा में गुजार सकूं। और लाल जी! यह शरीर तो तीन काल नश्वर है। सौ साल उम्र प्राप्त कर भी ली तो खोखले पिंजर को रखकर क्या करोगे। इसलिए जल्दी-जल्दी आवागमन के चक्र से निकलने का उपाय करो।
उत्तर: अकाल मृत्यु कोई चीज नहीं है, सिर्फ तीन तापों से शरीर का
नाश होता है:-
(1) आधि अर्थात् मन के अत्यधिक खेद से।
(2) व्याधि अर्थात् शारीरिक रोग से।
(3) उपाधि अर्थात् बाहर के किसी हादसा (दुर्घटना) से।
ये तीनों ताप कर्मानुसार प्राप्त होते हैं और लाज़मी (अनिवार्य) हैं।
शरीर का मृतक होना इन्हीं कारणों से है। यह संसार अधिक कठिन है। एक प्रभु के परायण होकर ही तमाम तोहमात (भ्रमो) से छुटकारा मिलता है और जीवन-यात्रा के सही मकसद (उद्देश्य) को हासिल कर सकता है। शरीर का नाश होना लाज़मी (अनिवार्य) है ख्वाहे (चाहे) किसी वक्त भी होवे। इस वास्ते इस क्षणभंगुर शरीर से जो कार्य परमार्थ अनुकूल होवे जल्दी कर लेना चाहिए।
उत्तर: प्रेमी, कुरान शरीफ में दिया हुआ है या नहीं, कि आकबत के दिन रूहें उठेंगी और उनको उनके एमाल के मुताबिक दोज़ख (नरक) या जन्नत
(स्वर्ग) मिलेंगे।
प्रेमी: जी हां, ऐसा दिया हुआ है।
श्री महाराज जी अच्छा प्रेमी जी, अब यह बतलाइये कि एक इन्सान बड़ा परहेज़गार है, उसके एमाल (कर्म) बहुत नेक हैं, मगर उसका जिस्म बड़ा नाकिस है, किसी जगह से टेढ़ा, लंगड़ा, काना और भी जिस्म में कई नुक्स हैं। क्या उसको उसके नेक एमाल के मुताबिक बहिश्त मिलेगी या नहीं? अगर मिलेगी तो बतलाइये कि किस जिस्म में मिलेगी। अगर इसी नाकिस जिस्म में मिलती है तो खुदा बे-इन्साफ हो गया, उसे क्या बहिश्त मिली? अगर नया जिस्म मिलता है तो यह आवागमन नहीं तो और क्या है?