उत्तर: प्रेमी, पहले अच्छी तरह शब्द पढ़ा करो। जिस बात का पता न होवे पहले पूछ लेना चाहिए। शरीर तो नित्य ही रोग रूप है, चाहे सन्त का हो, चाहे संसारी का। कल्याणकारी जीवन उन ही सत्पुरुषों का है जिनकी बुद्धि नित्य ही परम तत्व आत्मा में स्थित है, आत्मा की खोज में लगी हुई है, आत्म परायण होने का यत्न कर रही है। पारब्रह्म परमेश्वर के ही रूप में जिनकी बुद्धि अन्तर्गत नित्य लीन हो रही है, इन नौ द्वारों के कोट गढ़ में विचरती हुई इसके दुःख सुख से उपरस है और हर समय ब्रह्मानंद में विचरने वाली है, वह ही असल में ब्रहमचारी है। उनको ही अरोगी समझो। शरीर तो मियादी है और नित्य ही रोगी है। जो इन नौ द्वारों के भोग पदार्थों को प्राप्त करके क्षणभंगुर रसों में फंसा हुआ है वह ही नित्य तृष्णा रूपी रोग में ग्रसा हुआ है। जिसने शब्द स्वरूप में स्थिति पाई है वह ही असली ब्रह्मचारी है। वैसे तो हर शरीरधारी जीव की बुद्धि पलक-पलक विखे शारीरिक लालसा में फंसी रहती है एवं शारीरिक मानसिक रोगों में जकड़ी हुई युग-युग तक भटकती रहती है। ब्रह्म तत्व का विचार करने वाले, उसका रूप हो जाने वाले, दीर्घ आयु वाले (हमेशा की शान्ति) को प्राप्त कर लेते हैं। जिनके अन्दर से इस बात का अभाव हो गया है कि मैं मर जाऊंगा, मैं दुःखी हूं, सुखी हूं वह ब्रह्मचारी नित्य ही अपने आप को अजर-अमर अविनाशी जानते हुए अरोग रहते हैं। शारीरिक रोग आते-जाते रहते हैं। शरीर एक मियादी चीज है। समय पर इसके तत्त्व बदल जाते हैं, चाहे कितनी ही इसकी हिफाजत (रक्षा) क्यों न की जाए। गुरु शंकराचार्य और गोरखनाथ को भगंदर ने घेर रखा था, रामकृष्ण परमहंस को कण्ठमाला ने। कर्मगति अपार और गहन है। प्रारब्ध कर्म सबको भोगने पड़ते हैं।
उत्तर: बच्चू, शरीर रोग रूप ही है। नौ द्वारों से हर समय ही गंदगी झड़ रही है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा सब ही दुखदाई अवस्थाएं हैं। बचपन में जवानी छिपी हुई है, जवानी में बुढ़ापा, अरोग में रोग और ज़िन्दगी में मौत छिपी हुई है। जी-जी कर आखिर इस शरीर को गिरना है। चाहे सौ नहीं हजार वर्ष तक भी इसे रख लो, फिर मौत माई ने आकर गिरा ही देना है। जायज़ (मर्यादा में) ख्याल रखना ज़रूरी है। इतना परहेज़ रखते हुए भी फिर तकलीफ का आ जाना कर्म रोग है। सबको कर्म दण्ड भोगना पड़ता है।
उत्तर: कई जन्मों के कमाँ के फल भोगने होते हैं। शायद किसी जन्म के कर्म का फल भोगना पड़ गया हो जिसे भोगना जरूरी हो। महापुरुष, जो निर्वाण अवस्था को प्राप्त कर चुके होते हैं, वे अपना सब हिसाव बेबाक करके चोला छोड़ते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को कण्ठमाला के आर्जे (रोग) ने बहुत दुखी कर रखा था। स्वामी रामतीर्थ को संग्रहणी का आर्जा (रोग) हो गया था, वगैरह। लेकिन उन्होंने प्रभु के हुक्म को नहीं तोड़ा। बाज़ औकात (प्रायः) महापुरुष अपने शिष्यों के क्रूर कर्मों की सजा को अपने ऊपर ले लेते हैं और शिष्यों के तमाम ताप हरण कर लेते हैं। यह उनकी बड़ी उदारता और दयालुता है, यानि बाज़ दफा महापुरुषों ने संसार के सुधार की खातिर बड़े कष्ट अपने शरीर पर उठाए। यह उनकी परम उच्च अवस्था का लक्षण है। इस वक्त के शारीरिक कष्ट को संसार के कल्याण का मूजब (हेतु) समझें।
उत्तर: प्रेमी, बदला तो देना ही पड़ेगा ।
उत्तर: छोटी चोरी के लिए प्रायश्चित में बड़ा दान करना पड़ता है। जैसे कतरा जहरीले पानी में सेरों मीठा डालोगे तब कहीं कड़वाहट जावेगी। जीवों की सेवा और भजन बंदगी की जावे तो अजाब (दुख) की पीड़ा की तुरशी कम हो सकती है।
उत्तर: प्रेमी जी, सन्तों का मिलना बड़ा मुश्किल है। फिर उनके पास बैठकर उनकी शिक्षा व विचार सुनकर सब समझ में आ जावे, यह बड़ा दुर्लभहै। उसके बाद यह और भी दुर्लभ है कि इस समझी हुई शिक्षा पर चला जावे। जब तक सिख्या (शिक्षा) पर चला नहीं जाता, सन्तों के मिलने और न मिलने का कोई मतलब नहीं। क्योंकि यह सब दुर्लभ ही है, इसलिए यह दुर्लभता करके बात कही गई है:
बिन हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता। सतसंगति संसृति कर अन्ता ।।
उत्तर: (स्वार्थ) करके जो काम किया जाता है, वह बन्धन का कारण होता है और फर्ज़ करके किया हुआ काम आज़ादी देता है।
उत्तर: प्रेमी, पिछले कर्मों के अनुसार ही यह मौजूदा जिस्म और इसकी आदतें बनती हैं। उन आदतों के ज़ेरेअसर (प्रभावित) होकर ही जीव कर्म करता है। घबराना नहीं चाहिए। हिम्मत करके सत्पुरुषार्थ में लगे रहना चाहिए। हर इन्सान के अन्दर अच्छे और बुरे तरह के संस्कार रहते हैं। अगर सत्संग सेवन करके अच्छे संस्कारों को जाग्रत कर लेवे तो बुरे संस्कारों पर वे हावी हो जाते हैं। इस तरह से जीव अपने कर्मों का सुधार कर सकता है। सत्संग का इसलिए बड़ा प्रभाव है। मनुष्य योनि में एक खसूसियत (विशेषता) है कि जीव अपने नुक्स और कर्मों को समझ सकता है और उस नुक्स (कमी) पर अबूर पाने की कोशिश कर सकता है और अबूर (छुटकारा) पा सकता है। यहां तक भी मुमकिन है कि इस आवागमन से हमेशा के वास्ते मुख्लसी (मुक्ति) हासिल कर सकता है।
उत्तर: प्रेमी, कर्म चक्र अमिट है। फकीर खुद इस समय कर्म चक्र की लपेट में डेढ़ मास से आये हुए हैं। यह अपनी तकलीफ दूर नहीं कर सकते और किसी का क्या इलाज करेंगे। जिस विश्वास और प्रेम से इतनी दूर चलकर आए हो, प्रभु सहायता करने वाले हैं। अमुख प्रेमी तो वैसे भी इनको प्यारा है। न जाने किस कर्म चक्र ने इसे इस समय लपेट रखा है। जन्म-जन्मान्तर के शुभ-अशुभकर्म सुख-दुःख देने वाले बन जाते हैं। इस जगह इस जन्म में तो प्रेमी ने कोई ऐसा कर्म नहीं किया जिस करके ऐसी तकलीफ मिल रही है। प्रभु कृपा करें, जल्दी खुलासी मिल जावे। प्रेमी, और भी अस्पताल में सैकड़ों बीमार पड़े होंगे। उनके वास्ते तुम क्यों नहीं प्रार्थना करते हो? मोह वश होकर तुमको इधर आना पड़ा। प्रभु भावी को कौन मेट सकता है?
उत्तर: प्रेमी, तुम बच्चों वाली बात करते हो। प्रभु आज्ञा को नहीं मानते। छुटकारा शुभ कर्म करने में ही है। तुम आए हो, तुम्हारा आना कुछ न कुछ लाभकारी ही रहेगा। मगर जितनी देर दुःख भोगना है, भुगतना ही पड़ेगा।
उत्तर: प्रेमी, दिल की तख्ती तो खुदा की बन्दगी के बगैर साफ होनी बड़ी मुश्किल है। जो भी अच्छा या बुरा फेल (कर्म) हो गया है, उसका इवजाना (फल) दुख अथवा सुख जरूर मिलेगा, चाहे इस मौजूदा खाकी वजूद में या किसी और वजूद में मिले।
उत्तर: हां प्रेमी, यह आखिरी मंजिल पर पहुंचने वाले का संदेश है। जो कोशिश करेगा वह ही मौलाना रुम बन सकता है। जितने उलटे कर्म किए हैं उससे दुगने अच्छे फेल (कर्म) करो। जिस तरह खुदा की मखलूक (जीव सृष्टि) को दुख दिया है, अब उसकी खलकत (जीव सृष्टि) की खिदमत (सेवा) करो। सही तरीका से दूसरों के दुख को दूर करने वाले पीर बनो।
उत्तर: प्रेमी, जिस-जिस के अन्दर इनके विचार चले गए हैं, जो सिख्याग्रहण कर चुका है, उनका उद्धार जरूर होगा। ऐसे प्रेमी, दो, चार, दस जन्मों के बाद किसी न किसी समय जरूर अपनी कल्याण का यत्न करेंगे। गुरु ने तो महावाक्य रूपी बीज हजारों के अंदर डाल दिया है। कभी न कभी उगेगा। उचित यही है कि इसी जन्म में आत्म साक्षात्कार करे। जिसके अन्दर जिज्ञासा है उसे कोई न कोई रास्ते में डालने वाला मिल जाता है। फकीरों की सेवा भी खाली नहीं जाती, हर एक के वास्ते इनका आशीर्वाद है। बाद के यह कोई ठेकेदार नहीं। वक्त के गुरु शिष्यों के वास्ते हर समय भलाई ही चाहते हैं। गृहस्थी, विरक्ति जो कोई होवे, श्रद्धा विश्वास से एकान्त में बैठकर प्रभु की भक्ति करेगा वह तर सकता है। बिना यत्न के दोनों ही हैरान परेशान हैं। जो बात करो, पक्के इरादे से करो। वह ही सफलता दिया करती है।