पुण्य तिथि : 28 जुलाई 2017

इनके दादा जी का नाम प्रेमी सुन्दर दास जी , दादी जी का नाम प्रेमी बहन माया देवी जी था और दादी जी श्री महाराज जी से दीक्षित थे। प्रेमी जी के माता पिता (माता प्रेमी बहन वीरां वाली जी एवं पिता प्रेमी राम दास जी) दोनों श्री महाराज जी से दीक्षित थे और श्री चरणों में समर्पित थे।
माता वीरां वाली के साथ करिश्मा:
1952-53 में सम्मेलन सम्पन्न हुआ मीठे (मौसमी जैसा फल) का प्रसाद मिला, इनके मन में भाव आया कि यह प्रसाद मेरे भाई के लिए है परन्तु मैं अपने भाई को कैसे काट सकती हूं यानि मिठे को कैसे काटूं तो गुरुदेव कृपा से घर जाते जाते वह फल नाशपाती बन गया और फिर उन्होंने इस प्रसाद को भाई के साथ बांटा।
प्रेमी जी के साथ करिश्मा :
गुरुदेव के समय की बात है। जगाधरी सम्मेलन में प्रेमी जी खिचड़ी की सेवा कर रहे थे। बड़ा ड्रम गरमा गर्म खिचड़ी का उठाया और वह सारा ड्रम खिचड़ी से भरा इनके ऊपर गिर गया। भगदड़ मच गई, सभी प्रेमी इधर उधर भागने लगे कोई दवा लेने, कोई बरनौल लेने, कोई बेसन लेने, कोई डाक्टर को बुलाने। जल्द ही गुरुदेव तक बात पहुंची और उन्होंने प्रेमियों को कहा, कोई चिंता की बात नहीं है, प्रेमी को कुछ नहीं होगा। और सच में प्रेमी जी के पैर का एक बाल भी नहीं जला था।
नवंबर 1953 में गुरुदेव जी जब बलदेव नगर आश्रम के लिए स्टेशन पहुंचे, प्रेमी जी की तबियत खराब थी और दस्त लगे हुए थे। गुरुदेव की खबर मिलने पर वे तुरंत पीछे पीछे बलदेव नगर आश्रम पहुंचे। माता जी ने मना किया कि तबियत खराब है मत जाओ। परन्तु गुरु से मिलने की चाह में वे भागते भागते आश्रम पहुंचे, गुरुदेव के दर्शन किए और लंगर खाया और वापिस घर आए और तबियत बिल्कुल ठीक हो गई।
प्रेमी जी अपने जीवन में नाम मात्र गुरुद्वारे गए। उनका यह मानना था कि जीवन में एक गुरु को ही मानना चाहिए। गुरु नानक देव जी की शिक्षा और समता की शिक्षा में कोई भेद नहीं है। इसलिए आजीवन वे समता शिक्षा के लिए समर्पित रहे। प्रेमी जी जैसे सेवाधर्मी प्रेमियों का जीवन समता के वास्तविक उद्देश्य का मूर्त उदाहरण रहा। जैसा कि श्री महाराज जी कहा करते थे—‘समता की शिक्षा सभी मज़हबों का सम्मान करती है और अंततः सभी का लक्ष्य एक ही है—परमात्मा की प्राप्ति।
थिर कर बेसों अर्जन प्यारे
सतगुरु तुमरे काज सवेरे…
यह शब्द प्रेमी जी के पिता जी और प्रेमी जगन्नाथ जी** लंगर सेवा करते हुए अक्सर गाया करते थे।
प्रेमी जी का अंबाला शहर आश्रम एवं बलदेव नगर आश्रम के निर्माण कार्यों में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने न केवल आर्थिक रूप से सहयोग दिया, बल्कि अपनी उपस्थिति और मार्गदर्शन से भी आश्रम के विकास में अहम भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त, प्रेमी जी जगाधरी प्रबंधन समिति में एक सम्मानित ट्रस्टी के रूप में कार्यरत रहे और संस्था के हित में सदैव तत्पर रहे। विशेष उल्लेखनीय यह है कि स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद, वे आवश्यक आश्रम संबंधी कार्यों और बैठकों में सम्मिलित होने के लिए समय अवश्य निकालते थे। परिवार मना करता था पर वे उन्हें कहा करते कि,’मुझे मत रोको, मैं आश्रम जाकर ठीक हो जाऊंगा’ , उनकी यह सेवा भावना और समर्पण अनुकरणीय है।