प्रेमी डॉ. उदो राम जी

“संसा त्याग राख विशवासा।।”

Profile Image

प्रेमी डॉ. उदो राम जी

पुण्य तिथि : 5 अक्टूबर 1972

साध सती और सूरमा , तीनों की मत एक ।
जीवन की आसा तजें, रख साहब की टेक ।।

गुरु की चाह होना गुरु कृपा है, गुरु का परीक्षा लेना गुरु आशीर्वाद है, गुरु का शिष्य को शरण में लेना परम कल्याण स्वरुप है। हम बड़े ही भाग्यशाली हैं जो इन तीनों दैवीय घटनाओं को इस लेख में पढ़ेंगे और यह प्रसंग हमें गुरुमुख बनने को प्रेरित करेगा। आज हम प्रेमी डॉ. उदो राम जी का ज़िक्र करेंगे, जो आज संगत के लिए प्रेरणा स्वरुप हैं।
प्रेमी उदो राम जी का जन्म गांव: साई जिला रावलपिंडी(पाकिस्तान ) में हुआ। भगत बनारसी दास जी प्रेमी उदो राम जी को पहले से जानते थे। प्रेमी डॉ. भगत राम जी एवं प्रेमी डॉ. उदो राम जी एक साथ एबटाबाद में प्रैक्टिस किया करते थे।

डॉ. उदो राम जी के सुपुत्र डॉ. सुशील जी बताते हैं कि पिता जी के अनुसार, एक दफा श्री महाराज जी भगत जी को साथ ले कर शांखियारी की पहाड़ियों की तरफ तप हेतु किसी एकांत जगह की तलाश में जा रहे थे तो रस्ते में ऐबटाबाद क्रॉस करते हुए भगत जी भाग कर पिता जी के पास क्लिनिक पर आये और कहने लगे की महाराज जी तप के लिए जा रहे हैं। यदि मिलना हो तो आ जाओ।

प्रेमी उदो राम जी उसी वक्त दुकान छोड़ कर श्री भगत जी साथ जल्दी जल्दी श्री महाराज जो को मिलने चल पड़े। गुरुदेव के पास पहुँच कर उन्हें प्रणाम किया और कहा कृपया चल कर दास के गृह पर भी चरण डालें सत शिक्षा से नवाज़ें। परन्तु गुरुदेव ने फ़रमाया ” प्रेमी अभी तो तप के लिए जा रहे हैं फिर कभी प्रभु आज्ञा हुई इस तरफ आना हुआ तो देखा जायेगा। काफी ज़िद करने पर भी गुरुदेव नहीं माने और अपने सफर की और चल पड़े। डॉ. उदो राम जी भी उनके पीछे पीछे चल पड़े।

ज्ञात हो की जिस जगह का ऊपर ज़िक्र किया है वह पहाड़ी इलाका था और पठानों की आबादी ज्यादा थी। डॉ. उदो राम जी की शादी को हुए अभी दो दिन ही हुए थे। इसलिए जब घर पता लगा की दुकान खाली है और प्रेमी उदो राम जी घर नहीं पहुंचे तो घर वालों ने समझा की कहीं पठान अगवाह करके तो नहीं ले गए। घर वाले आस पास छानबीन करने लगे और ये गुरुदेव के पीछे ही चले गए। आखिर गुरुदेव जहा ठहरे वहां भी इन्होने गुरुदेव से गुज़ारिश जारी रखी। गुरुदेव ने कहा की आपका हठ बहुत है पीछे घर वाले चिंता में है और आप यहाँ। आखिर डॉ. उदो राम जी को गुरुदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और सत् शिक्षा लेने के पश्चात् चौथे पांचवे रोज़ घर वापिस पहुंचे। जिस वक्त दिक्षित हुए प्रेमी जी की उम्र 22 साल की थी।

मार्च 1949 में जब श्री महाराज जी मलोट में थे तो प्रेमी उदो जी व् अन्य प्रेमियों ने गुरुदेव को खत लिखा और बलदेव नगर पधारने की प्रार्थना की। गुरुदेव ने उत्तर में लिख कर फरमाया प्रेमी उदो जी को खुद आना चाहिए। फिर बलदेव नगर अंबाला के प्रेमियों ने मिल कर प्रेमी लेख राज जी को गुरुदेव को अंबाला लाने के लिए भेजा। 21 मार्च 1949 को गुरुदेव अम्बाला के लिए रवाना हुए। जब गाड़ी अम्बाला स्टेशन पर पहुंची “ओ३म् ब्रह्म सत्यम्” का नारा लगाते हुए प्रेमियों ने श्री महाराज जी को गाड़ी से उतारा और चरणों में प्रणाम किया। देश के विभाजन के बाद प्रेमी जी ने बलदेव नगर कैंप में डिस्पेंसरी में प्रैक्टिस करने लगे।

प्रेमी उदो जी के सुपुत्र बताते हैं कि , पिता जी बताया करते थे कि गुरुदेव के शिष्य प्रेमी नरेंदर सिंह साहनी जी, जो उस वक्त संग्रहणी के रोग से ग्रसित थे, जब उन्हें पता लगा की गुरुदेव अम्बाला पधारे हैं तो वे भी बीमारी की परवाह न करते हुए झट से स्टेशन पर पहुँच गए, और गुरुदेव जिस टाँगे पर सवार थे उसके पीछे पीछे भागने लगे। प्रेमी नरिंदर जी फरमाते थे की उस दिन जब बलदेव नगर पहुंचे तो उन्होंने महसूस किया की उनकी बिमारी ठीक हो गयी है।

एक और घटना का ज़िक्र करते हुए प्रेमी उदो जी के सुपुत्र बताते हैं कि , पिता जी बताया करते थे कि बलदेव नगर में एक बार अमरूदों वाले बाग में सत्संग चल रहा था। जोर से आंधी तूफान आया। लोगों में घबराहट होने लगी, श्री महाराज जी कहा आराम से बैठ जाओ धीरज रखो। जब सत्संग समाप्त हुआ सभी वापिस जाने लगे तो बाहर देखते हैं कि पेड़ों के पेड़ गिरे हुए थे, काफी नुकसान हो रखा था परंतु जिस जगह सत्संग हो रहा था वहां जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। सब कुछ सामान्य था।
प्रेमी उदो जी ने डिस्पेंसरी के कंपाउंड में पहली बार 1949 में सत्संग शुरू किया था। हर साल संगत बढ़ने लगी तो जगह कम पड़ने लगी। प्रेमी जी ने अपना घर बनवाने के समय यह खास ध्यान रखा कि घर में हाल जरूरी होना चाहिए जहां सत्संग किया जा सके। घर में हाल बन जाने के बाद सत्संग घर पर ही होने लगा। उनके अनुसार 40 साल तक यह सिलसिला जारी रहा। कहते हैं अंतिम समय उनकी ख़ास चाहत थी उनका एक पुत्र डॉक्टर जरूर बने और सत्संग हमेशां जारी रहे।

डॉ. सुशील जी व् अन्य परिवार के सदस्यों का बलदेव नगर आश्रम निर्माण में भी अमूल्य योगदान रहा। डॉ. सुशील जी ने बड़ी मुश्किलों के साथ लोकल संगत को एकत्रित किया कि आश्रम के लिए जगह का प्रबंध किया जा सके। जगह भी वहीं खरीदी गई जहां गुरुदेव ने सत्संग किया था। इस पुन्य कार्य में दूसरी संगतों ने भी आर्थिक सहयोग किया। प्रेमी जिंदल जी, प्रेमी गुरदास जी व अन्य समकालीन प्रेमियों का उन्हें ख़ूब सहयोग रहा।

प्रेमी उदो जी कभी भी कहीं भी जाते, किसी से मुलाकात करते तो गुरुदेव की बात अवश्य करते और सबको सत्संग के लिए प्रेरित करते। यह उनके स्वभाव की एक खास विशेषत थी। प्रेमी उदो जी कि दिनचर्या सुबह शाम प्रभु का सिमरन करना एवं जब भी समय मिले गुरुदेव द्वारा रचित अमर वाणी का उच्चारण करना था। वाणी उच्चारण करने में उन्हें आनंद आता था तथा गुरुदेव के शिष्य भगत बनारसी दास जी का भी प्रेमी जी के घर आना जाना हुआ करता था। वे महीनों प्रेमी जी के घर ठहरा करते थे। भगत जी हमेशा प्रेमियों को सिमरन के लिए प्रेरित करते रहते थे। वे कहते थे कि गुरुदेव द्वारा रचित ग्रंथ श्री समता प्रकाश एवं समता विलास में हर मर्ज की दवा है। समता शास्त्र और गुरुदेव को आगे रखकर चला करो कभी कोई कमी नहीं आएगी।

प्रेमी उदो जी की सुपुत्री श्रीमती कमलेश जी ने भी अपना अनुभव सांझा किया और बताया कि उन्होंने भी गुरुदेव द्वारा उनके हाथों से सत्संग के दौरान प्रशाद ग्रहण किया था। यह गुरुदेव का आशीर्वाद ही है कि आज भी पूरा परिवार जिसमें दो बहनें मंजू शर्मा, वीरन शर्मा भाई स्वर्गीय प्रीतमपाल शर्मा, श्री भूषण नाल शर्मा, श्री बृजमोहन शर्मा, श्री नेत्र प्रकाश शर्मा, व आगे बच्चे भी गुरुदेव के शिक्षा पर चलने का प्रयास कर रहे हैं।
इनका परिवार हर वर्ष समता वार्षिक सत्संग सम्मलेन जगाधरी में प्रेमियों हेतु दवाइयों की सेवा करता है।
यह लेख आशिकों के मार्ग की झलक और प्रारंभिक स्थिति दर्शाता है जहाँ गुरुमुखता रुपी आग में सांसारिक सुख भस्म हो जाते हैं। गुरुदेव द्वारा लगायी गयी यह समता की फुलवाड़ी आज भी महक रही है और ईश्वरीय हुकुम में आज भी जिज्ञासुओं को तृप्त कर रही है।

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है। उपरोक्त लेख की अधिकांश जानकारी आदरणीय प्रेमी जी के परिवार से ली गयी है।
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Leave a comment



3+4 :

address icon

संगत समतावाद धर्मशाला – हरिद्वार
हिमालय डिपो, गली न.1, श्रवण नाथ नगर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)