प्रेमी श्री तोलाराम जी

“उठ मन मेरे जाग तूं ।।”

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प्रेमी श्री तोलाराम जी

पुण्य तिथि : 17 अक्टूबर 1988

प्रभ अपने से मंगायो , गुरमुखता तत्त सार ।
चार पदारथ तिसमें , ‘मंगत’ कहे पुकार ।।

बहुत ही भाग्यशाली वो शिष्य हैं जो अपनी गुरुमुखता से अपने गुरु को रिझा देते हैं । आज हम बात करेंगे प्रेमी श्री तोलाराम जी की , जिनको स्वयं गुरुदेव ने एक सेवा के दौरान कहा कि मांगो तोलाराम , क्या चाहते हो ।

प्रेमी श्री तोलाराम जी का जन्म 1913 में कानघड़ जिला रावलपिंडी में हुआ, विभाजन के पश्चात सुभाषगढ़ , हरिद्वार रहने लगे । प्रेमी तोलाराम जी की धर्मपत्नी का नाम श्री इशरो देवी था। प्रेमी जी के सुपुत्र श्री चंद्र मोहन जी से वार्तालाप के दौरान जानकारी प्राप्त हुई कि प्रेमी जी दो दो महीने जगाधरी आश्रम में सेवा एवं एकांत के लिए जाया करते थे। जगाधरी में वार्षिक सम्मेलन में परिवार सहित जाते और सेवा कार्यों में अधिक से अधिक भाग लेते। एक बार श्री महाराज के शिष्य भगत श्री बनारसी दास जी का प्रेमी जी के घर पर ठहरना हुआ था और उन्होंने श्री तोलाराम जी के घर सत्संग भी किया था।

प्रेमी तोलाराम जी पाखंड के सख्त खिलाफ थे। इसलिए जब भी कभी गांव में कोई रीति रिवाज पाखंड की सूरत इख्तियार करता तो वे इसका पुरजोर खंडन करते। वे कहा करते थे श्री महाराज जी ने ग्रंथ श्री समता प्रकाश एवं ग्रंथ श्री समता विलास में पूजा, भक्ति, व धर्म का सही सिद्धांत फरमाया है और बड़ी आसान भाषा में समझाया है कि मनुष्य को किस प्रकार धर्म के रास्ते पर चलना चाहिए।

श्री तोलाराम जी का सुबह व शाम का सिमरन अभ्यास का दृढ़ नियम था । धन्य हैं उन प्रेमियों का जीवन , जो गुरु समर्पित हो गया और कल्याण के रास्ते चल पड़ा ।

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है। उपरोक्त लेख की अधिकांश जानकारी आदरणीय प्रेमी जी के परिवार से ली गयी है।
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

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