पुण्य तिथि : 06 दिसंबर 1987
करम के काटन कारने , हवन तपस्या यग ।
बाझ गुरु समरथ के , करम न टूटे तग ।।
आदरणीय श्री ठाकुर दास जी, जिन्हें अपने समय में सच्चे भक्ति-भाव से जुड़े दीक्षित प्रेमी के रूप में जाना जाता था, लगभग 1897 में रावलपिंडी ज़िले के पास स्थित कुरी शहर में जन्मे। रावलपिंडी से दस–पंद्रह किलोमीटर दूर स्थित यह अत्यंत पुराना नगर उस समय संयुक्त परिवार, सभ्यता और आध्यात्मिकता का केंद्र था। ठाकुर दास जी का परिवार भी एक विशाल हवेली में रहता था, जहाँ कई पीढ़ियाँ साथ रहती थीं। धीरे-धीरे परिवार के बड़े सदस्य गुजर गए और हवेली में केवल पिता जी और दादी जी ही बचे। उसी वातावरण में ठाकुर दास जी के संस्कार, सादगी और आध्यात्मिक झुकाव का निर्माण हुआ।
श्री ठाकुर दास जी को श्री महाराज जी से दीक्षा पाकिस्तान में ही प्राप्त हुई। गंगोठियां ब्राह्मण से श्री महाराज जी स्वयं उनके घर—विशाल हवेली—पर पधारा करते थे। प्रेमी ठाकुर दास जी के सबसे छोटे पुत्र शिवलाल जी बताते हैं कि “हमारे घर महाराज जी आया करते थे। मैं छोटा था पर पता चल जाता था—महाराज जी आए, महाराज जी आए। बच्चों में जितना ज्ञान होता है, उतना तो होता ही है।” इससे परिवार और श्री महाराज जी के बीच की आत्मीयता सहज ही प्रकट होती है।
सन् 1947 में, 7 मार्च की रात उस हवेली पर हमला हुआ। पूरा परिवार जान बचाकर गाँव से निकलकर शहर में छिपा और फिर भारत की ओर रवाना हुआ। उस रात हवेली, जड़ें, स्मृतियाँ और पीढ़ियों का बसेरा—सब कुछ वहीं छूट गया। कठिन परिस्थितियों में भी ठाकुर दास जी की दीक्षा और आस्था का संबंध कभी नहीं टूटा।
भारत आने के बाद ठाकुर दास जी दिल्ली के मोतिया खान में रहने लगे, जो सत्संग स्थल से लगभग दो–तीन किलोमीटर दूर था। सत्संग उस समय कड़े खान बाग दया बस्सी में हुआ करता था। प्रेमी ठाकुर दास जी के सबसे छोटे पुत्र शिवलाल जी बताते हैं कि “मेरे पिताजी मुझे अपने साथ सत्संग ले जाया करते थे। कड़े खान बाग दया बस्सी में श्री महाराज जी आया करते थे। पहले श्री भगत जी महामंत्र, मंगलाचरण और ईश्वर प्रार्थना कराते थे, फिर श्री महाराज जी आते थे और सत्संग सुनाते थे।” श्री महाराज जी की करुणा का एक और प्रसंग वे याद करते हैं—“महाराज जी पिताजी से कहते थे—9 बज गए हैं, बच्चा छोटा है, अब घर जाओ।”
श्री ठाकुर दास जी का परिवार पाँच भाइयों वाला बड़ा परिवार था—सूरज प्रकाश, गणेश दास, किशनलाल, बलदेव राज और शिवलाल। इनमें से दो बड़े भाई—सूरज प्रकाश और गणेश दास जी भी श्री महाराज जी से दीक्षित थे। श्री महाराज जी का विशेष स्नेह सूरज प्रकाश जी पर था। शिवलाल जी के शब्दों में—“महाराज जी कहते—सूरज, इधर बैठो… सूरज मेरे पास आओ। छोटे बच्चे की तरह बुलाते थे। बड़ा प्यार था उनका।” यह प्रेम, परिवार और गुरु-शिष्य के रिश्ते की सुंदरता को दर्शाता है।
ठाकुर दास जी स्वयं सादगीपूर्ण, अनुशासित और आध्यात्मिक जीवन जीते थे। वे व्यवसाय करते थे, पर घर में संस्कार और धार्मिक वातावरण बना रहता था। शिवलाल जी बताते हैं—“पिताजी कहते—बेटा, एक गीता का श्लोक सुना दो।” इससे स्पष्ट होता है कि दीक्षा उनके लिए सिर्फ एक परंपरा नहीं थी, बल्कि जीवन का हिस्सा थी, परिवार की दिनचर्या थी।
श्री ठाकुर दास जी का जीवन भक्ति, सरलता और श्री महाराज जी के प्रति गहरे प्रेम से परिपूर्ण था। पाकिस्तान से भारत तक, विस्थापन से पुनर्स्थापन तक, सत्संग से परिवार तक—उनकी आस्था का दीपक निरंतर प्रज्वलित रहा। उनकी स्मृतियाँ आज भी यह संदेश देती हैं कि दीक्षा केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदल देने वाला दिव्य स्पर्श होती है। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें आदरपूर्वक याद करते हैं। पंडित ठाकुर दास जी ने जैसा शांत, सरल और सच्चा जीवन जिया, वह हमें सिखाता है कि भक्ति और अच्छे संस्कार बिना किसी शोर के भी जीवन को सुंदर बना सकते हैं।