पुण्य तिथि : 29 नवंबर 2007
सतपुरष पहचान के, मगन भयो जिन चीत ।
‘मंगत’ ऐसे गुर मिलें, जाये भरम की भीत ।।
“आदरणीय प्रेमी श्री त्रिलोकी नाथ ‘नाशाद’ जी की पुण्यतिथि पर हम सब हृदय-भरे श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं। प्रेमी जी एक दिव्य और आत्मिक व्यक्तित्व थे, जिन्होंने श्री महाराज जी को अपना सच्चा रहबर मानकर जीवन के प्रत्येक क्षण में उनकी याद को संजोया। अपने मुर्शिद की स्मृतियों में लीन रहना ही उनकी साधना, उनका सुकून और उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया था। उनकी आत्मा को कोटि-कोटि नमन।”
आज प्रेमी जी के परिवार से मिलकर पुनः यह अनुभव हुआ कि गुरुदेव की अपार कृपा सदा अपने प्रेमियों तथा उनके परिवारों पर बरसती रही है। आदरणीय प्रेमी जी का जन्म 10 नवंबर 1920, दीपावली के पावन दिन, गाँव नला ब्राह्मनाँ, तहसील कहुटा, जिला रावलपिंडी में हुआ। यह गाँव गंगोठियों के बहुत निकट स्थित था।
प्रेमी त्रिलोकीनाथ जी प्रारम्भ से ही अत्यंत आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले थे। धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन उन्हें अत्यधिक प्रिय था, और धर्म–कर्म से जुड़े सत्पुरुषों से मिलने का उत्साह उनके भीतर सदैव विद्यमान रहता था। वे अक्सर घर में भी साधुओं के साथ रहने की इच्छा प्रकट किया करते थे। जहाँ भी उन्हें साधु-संतों के आगमन का समाचार मिलता, वे अवश्य वहाँ पहुँचते और उनसे आध्यात्मिक वार्तालाप करते।
उनके पुत्र आदरणीय प्रेमी श्री राजीव शर्मा तथा पुत्रवधू श्रीमती नीलम शर्मा ने बताया कि प्रेमी जी कहा करते थे—कि पाकिस्तान में एक साधु ने ही उन्हें श्री महाराज जी के चरणों तक पहुँचाया था। यही उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और दिव्य मोड़ बन गया।
सन 1939 में आदरणीय प्रेमी त्रिलोकीनाथ जी को पहली बार गुरुदेव के दर्शन प्राप्त हुए। प्रेमी जी उस समय अत्यंत युवा थे, और गुरुदेव को आनंदमयी अवस्था में देखने की आकांक्षा उन्हें बार-बार खींचकर ले जाती थी। वे अक्सर झाड़ियों के पीछे छुपकर गुरुदेव की दिव्य लीला का निहारन किया करते थे। भीतर ही भीतर उनके हृदय में गुरुदेव के प्रति गहरा आकर्षण और श्रद्धा पनप रही थी।
जब पहली बार प्रेमी त्रिलोकीनाथ जी का गुरुदेव से प्रत्यक्ष सामना हुआ, तो गुरुदेव ने उन पर दृष्टि पड़ते ही मुस्कुराकर फरमाया—
“अभी आपकी उम्र बहुत छोटी है। पहले कोई कामकाज करो। आर्मी में भर्ती हो जाओ, ताकि किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।”
गुरुदेव के इन वचनों ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। यह पहली मुलाकात न केवल आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत थी, बल्कि जीवन के व्यावहारिक मार्गदर्शन का भी आधार बन गई।
गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार प्रेमी त्रिलोकीनाथ जी युवावस्था में सेना में भर्ती हो गए। सन 1946 में उनका विवाह श्रीमती इंदिरा देवी जी के साथ संपन्न हुआ। गुरुदेव का यह मार्गदर्शन ही था कि जब 1947 में देश का विभाजन हुआ, उससे पहले ही प्रेमी जी आर्मी की तैनाती पर भारत के देवलाली आ गए थे और विभाजन के समय फैली अराजकता एवं हिंसा से सुरक्षित बच गए। यह घटना स्वयं प्रकट करती है कि गुरुदेव की कृपा किस प्रकार अदृश्य रूप से अपने भक्तों का मार्ग प्रशस्त करती है।
प्रेमी जी के जीवन में गुरुदेव की अनुकंपा से अनेक अद्भुत घटनाएँ घटित हुईं। एक बार, जब वे देवलाली में पोस्टेड थे और गुरुदेव देहरादून में विराजमान थे, प्रेमी जी के मन में गुरुदेव के दर्शन की प्रबल इच्छा जागृत हुई। उन्होंने छुट्टी ली और गुरुदेव से मिलने के लिए जगाधरी की यात्रा पर निकल पड़े।
दिल्ली स्टेशन पर उनकी मुलाकात एक सज्जन से हुई, जिनका नाम बाबू अमोलक राम था। त्रिलोकीनाथ जी आश्चर्यचकित रह गए जब उन्होंने देखा कि अमोलक राम जी के हाथ में ग्रन्थ श्री समता प्रकाश था — वही ग्रंथ जिसके माध्यम से गुरुदेव की समता–शिक्षा का गूढ़ संदेश प्रसारित होता था। यह संकेत त्रिलोकीनाथ जी के लिए अत्यंत रहस्यमय और आकर्षक था।
दोनों साथ-साथ जगाधरी पहुँचे और फिर वहाँ से देहरादून के लिए रवाना हुए। बाद में यह पता चला कि यह सब यूँ ही संयोग नहीं था — गुरुदेव ने पहले ही पत्र भेजकर अमोलक राम जी को सूचित कर दिया था कि अमुक तिथि को दिल्ली स्टेशन पर एक प्रेमी मिलेगा, जिसे साथ लेकर आना है। यह जानकर प्रेमी त्रिलोकीनाथ जी गुरुदेव की सर्वज्ञता एवं कृपा से अत्यंत विनम्र और भाव-विभोर हो उठे।
देहरादून पहुँचकर गुरुदेव ने उन्हें अपने प्रेममय सान्निध्य में स्वीकार किया और सत-शिक्षा से विभूषित किया। यही वह क्षण था जब प्रेमी जी को औपचारिक रूप से गुरुदेव से दीक्षा प्राप्त हुई। इसके साथ ही उनका आध्यात्मिक सफर गहराई से प्रारंभ हुआ — समता की शिक्षा, साधना और गुरुदेव की सेवा के मार्ग पर वे आगे बढ़ते गए, अपने पूरे परिवार को भी इसी दिव्य पथ से जोड़ते हुए।
परिवार के अनुसार आदरणीय प्रेमी त्रिलोकी नाथ जी अक्सर गुरुदेव की तस्वीर को देखते ही भावुक होकर रो पड़ते थे। वे हमेशा अपने साथ एक रजिस्टर रखते थे, जिसमें गुरुदेव के प्रति उमड़ते भाव—चाहे कविता हों, शायरी हों या अनुभव—वे तुरंत लिख लिया करते थे। अपनी इसी भावनात्मक प्रकृति के कारण वे अपने नाम के आगे “नाशाद” तखल्लुस का प्रयोग करते थे और अपना पूरा नाम त्रिलोकी नाथ नाशाद लिखा करते थे।
एक बार की बात है, वे फौज में सेवारत थे और उन्हें जगाधरी में होने वाले वार्षिक समता सत्संग सम्मेलन में जाने की तीव्र इच्छा हुई। उन दिनों फौज में छुट्टी मिलना बहुत कठिन था, फिर भी उनके मन में गुरुसंग के प्रति इतने प्रबल भाव थे कि उन्होंने सीधे अपनी यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर से जाकर छुट्टी माँगी। जब उन्होंने अफ़सर से कहा कि वे सत्संग में शामिल होना चाहते हैं, तो उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई और उन्हें छुट्टी प्रदान कर दी गई।
परिवार द्वारा बताई गई एक और महत्वपूर्ण घटना उनके आध्यात्मिक जीवन की गहराई को दर्शाती है। पिताजी जब आर्मी में ड्यूटी कर रहे थे, तब उनके पास गोलियों अर्थात एम्युनिशन का चार्ज हुआ करता था। सेना के सख्त नियमों के अनुसार एम्युनिशन की समय-समय पर गिनती की जाती थी। एक बार जब उन्होंने स्वयं गिनती की तो पाया कि गोलियों की संख्या पूरी नहीं है। परिस्थितियाँ चिंताजनक थीं, परंतु जब आर्मी के अधिकारी द्वारा आधिकारिक रूप से गिनती की गई तो एम्युनिशन पूरा पाया गया।
ऐसी अनेक घटनाएँ उनके जीवन में होती रहीं, जिन्हें परिवार गुरुदेव के निरंतर कृपा-आशीर्वाद का प्रत्यक्ष प्रमाण मानता है। यही अनुभव उन्हें यह विश्वास दिलाते रहे कि आर्मी जैसे कठोर और अनुशासन-प्रधान वातावरण में भी उन्होंने गुरुभक्ति, सिमरन और नियम-निष्ठ जीवन को कभी नहीं छोड़ा।
परिवार में समता सत्संग करना, वाणी का उच्चारण करना और गुरुदेव के सतवचनों को परिवार को एकत्रित कर सुनाना—ये सब उनके आध्यात्मिक जीवन, प्रभु-परायणता और गुरुमुखता की गहराई को दर्शाते हैं। इन्हीं पावन संस्कारों और गहन गुरुभक्ति की छाप आज भी उनके परिवार में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनके पारिवारिक सदस्य—भारत में रहने वाले प्रेमी श्री राजीव शर्मा जी, तथा विदेश में, ऑस्ट्रेलिया में बसने वाले प्रेमी श्री रजत शर्मा जी एवं उनका संपूर्ण परिवार—आज भी उसी श्रद्धा, समर्पण और अपनत्व के साथ संगत समतावाद से जुड़े हुए हैं। गुरुवाणी, समता की तालीम और सत्संग के प्रति उनका अटूट विश्वास इस बात का प्रमाण है कि त्रिलोकी नाथ ‘नाशाद’ जी के आध्यात्मिक संस्कार पीढ़ियों तक प्रवाहित होने वाली अमूल्य धरोहर बन गए हैं।