प्रेमी पंडित रौनक राम जी (जगाधरी निवासी)

“पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।”

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प्रेमी पंडित रौनक राम जी

पुण्य तिथि : 14 मार्च 2015

औगन मेरे अधिक थे , भसम भए गुरु संग ।
शबद गुरु मीठा लगा , काल जाल भयो भंग ।।

श्री सतगुरुदेव फरमाते हैं :”जीव देह के भोगों में गलतान है मगर देह का एक बाल भी नहीं बना सकता। बताओ जो चीज दूसरी ताकत के सहारे है, वह कहां तक सुख दे सकती है। इस वास्ते इस ख्वाबे गफलत (अज्ञानता) को छोड़कर अपने असली हकीकी मालिक की तलाश आशिकों ने की।”आज हम इस लेख में कुछ ऐसी ही प्रभु आशिक़ी का उल्लेख करने जा रहे हैं जहां न तो गुरुभक्ति में कोई कमी थी न ही गुरु मेहर की।

प्रेमी पंडित रौनक राम जी का जन्म लगभग 1910 में रावलपिंडी के गाँव हरनाला में हुआ। बचपन से ही उनमें सादगी, अनुशासन और कर्तव्यपरायणता के संस्कार विद्यमान थे। युवावस्था में वे भारतीय सेना में भर्ती हो गए और देश सेवा में अपना योगदान दिया। द्वितीय विश्व युद्ध (1942–1945) के दौरान वे बर्मा अभियान में भी सम्मिलित रहे। बाद में उनकी पोस्टिंग देवलाली में हुई।

देश विभाजन के समय परिस्थितियों के कारण उनका परिवार अंबाला के गाँव बोह में आकर बस गया। लगभग 1952 में भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वे वापस परिवार के साथ रहने लगे। उसी समय की एक घटना उनके जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन का कारण बनी। एक दिन यमुनानगर में किसी स्थान पर बैठे हुए उन्हें “समता दर्पण” उर्दू का मासिक पत्रिका पढ़ने को मिला। उस पत्रिका को पढ़कर उनके मन में समता मार्ग के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न हुई और वे समता योग आश्रम, जगाधरी में सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी के दर्शन के लिए पहुँचे। सतगुरुदेव जी के सानिध्य में आकर उनके जीवन को नई दिशा मिली और बाद में उन्हें दीक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य भी मिला।

इसके पश्चात उन्होंने फायर ब्रिगेड में लगभग 17 वर्षों तक सेवा की और फिर नौकरी से निवृत्त होकर आध्यात्मिक जीवन की ओर अधिक प्रवृत्त हो गए।

1973 में वे तपोभूमि में अभ्यास और तप के लिए गए। वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने अपना जीवन आश्रम में सेवा और सिमरन करते हुए व्यतीत करने का निश्चय कर लिया। वे अक्सर अपने पुत्र से कहा करते थे—
“अब मैंने अगला जन्म सुधारना है।”

प्रारम्भ में वे हर दो महीने में एक बार घर अंबाला जाकर एक-दो दिन रुकते और फिर वापस आश्रम में आ जाते थे, परन्तु धीरे-धीरे उनका अधिकांश समय समता योग आश्रम, जगाधरी में ही बीतने लगा।

आश्रम में रहते हुए उन्होंने सेवा को ही अपने जीवन का आधार बना लिया। वे प्रतिदिन आश्रम में झाड़ू लगाकर सफाई की सेवा करते, बाग़ और घास की सफाई स्वयं करते और पूर्ण सादगी के साथ जीवन व्यतीत करते। उनका पहनावा अत्यंत साधारण होता था और वे बाहरी आडंबर से दूर रहते थे।

जगाधरी आश्रम में प्रातःकालीन सत्संग में वे निरंतर सम्मिलित होते थे। प्रेमियों का कहना है कि आश्रम में प्रातः सत्संग को नियमित रूप से निरंतर करने की सेवा उन्होंने लंबे समय तक निभाई और इस नियम का दृढ़ता से पालन किया।

वे अक्सर युवा प्रेमियों को समता की तालीम से जोड़ने का प्रयास करते और उन्हें आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करते। वे सादगी और अनुशासन के प्रतीक थे। हजामत भी कई-कई महीनों बाद करवाते और बाहरी दिखावे से दूर रहते थे।

शुरुआत में वे आसपास के क्षेत्रों में सत्संग के लिए जाया करते थे, पर बाद में उन्होंने अपना अधिकतर समय आश्रम में रहकर सेवा और साधना में लगा दिया। परिवार के सदस्य उनसे मिलने आश्रम में आते थे, परंतु वे स्वयं घर के दुख-सुख, विवाह आदि अवसरों पर भी नहीं जाते थे। उनका जीवन पूरी तरह गुरु मार्ग और सेवा को समर्पित हो चुका था।

वे अक्सर कहा करते थे—
“असूल वाली ज़िंदगी बनाओ।”

जो भी प्रेमी, जिज्ञासु या युवा उनसे मिलने आता, वे सबसे पहले उसे पाँच बार महामंत्र पढ़ने के लिए कहते। इसके बाद वे यह दोहा सुनाते—

“तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ में रही न हूँ।
अब आपा पर का मिट गया, जित देखूँ तित तूँ।। ”

फिर वे इस दोहे का भाव समझाते हुए समता की तालीम का सरल ढंग से वर्णन करते। वे सतगुरुदेव जी के आदर्श जीवन के उदाहरण देकर प्रेमियों को महामंत्र के सिमरन और सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते थे।

परिवार के बड़ों के प्रति उनके मन में अत्यंत सम्मान था। वे वीरवार का व्रत रखते और जगाधरी के वार्षिक समता सत्संग सम्मेलन में तीन दिन का व्रत भी करते थे। सतगुरुदेव जी की अपार कृपा से उन्होंने अपने जीवन के अंतिम लगभग 45 वर्ष संगत की सेवा करते हुए समता योग आश्रम, जगाधरी में बिताए और 105 वर्ष की दीर्घ आयु प्राप्त कर 14 मार्च 2015 को इस नश्वर शरीर का आश्रम में ही त्याग किया। उनके पार्थिव शरीर का दाहसंस्कार समता नीति के अनुसार समता योग आश्रम जगाधरी के प्रांगण में ही किया गया।

आश्रम में रहते हुए उन्होंने सतगुरुदेव जी द्वारा स्थापित आश्रम के नियमों, आदेशों और आज्ञाओं का सदैव पालन किया तथा पूर्ण रूप से गुरु-परायण जीवन व्यतीत किया। निःसंदेह उन्होंने अपना जीवन एक सच्चे समता भिक्षु के रूप में जिया, जिसमें तप, त्याग और वैराग्य का अद्भुत संगम था।

संगत समतावाद में जो भी प्रेमी उनसे परिचित हैं, आज भी उनके आदर्श जीवन से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनकी निष्काम सेवा के लिए संगत समतावाद सदैव कृतज्ञ रहेगी।

आज भी उनके सुपुत्र प्रेमी सोम दत्त हरनाल जी तथा पौत्र दीपक कुमार जी (अंबाला निवासी) परिवार सहित निष्काम भाव से समता शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सेवा करते हुए समता सत्संग में सम्मिलित होने का भरपूर प्रयास करते हैं।

प्रेमी पंडित रौनक राम जी का जीवन निष्काम सेवा, सादगी, त्याग और समर्पण की एक प्रेरणादायक मिसाल है। “ तालीम-ए-मुर्शिद को अपनाकर और राह-ए-समता पर चलकर उन्होंने जो अपने नक्श-ए-पा छोड़े हैं, लाज़िमी है कि आने वाली नस्लें उन्हें अपने जीवन में एक रोशनी की तरह देखेंगी, जो उनके आध्यात्मिक सफर को उजाला देती रहेगी।”

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है। उपरोक्त लेख की अधिकांश जानकारी प्रेमीजनों और परिवार से ली गयी जो प्रेमी जी के भिक्षु जीवन के प्रत्यक्ष गवाह हैं।
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

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