पुण्य तिथि : 21 जून 2010
“सत्गुरु महात्मा मंगतराम जी” के प्रमुख शिष्यों मे भक्त बनारसी दास जी के बाद कई शिष्यों का नाम लिया जा सकता है। जिनमे से पंडित रामजी दास, जो कि मटन कश्मीर के रहने वाले थे और पाकिस्तान बनने के बाद काहनूवान (पंजाब) भारत में आ कर रहने लगे। प्रेमी पंडित रामजी दास जी को परम पूज्य श्री महाराज जी ने दीक्षा प्रदान की थी। इन्हें भी श्री महाराज जी की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ। पंडित रामजी दास जो को गुरुदेव ने अनेक बार घर भेजा, लेकिन वे महात्मा मंगतराम जी से इस कदर भक्त थे कि बार-बार उनके आकर्षण से खिंचे चले आते थे। गुरुदेव के कहने पर वापिस घर चले जाते थे। लेकिन घर पर रह नहीं पाते थे। इनकी माता गुरुदेव से बार-बार आग्रह करती थी कि बेटे को सांसारिक क्रिया-कलापों में लगने का आशीर्वाद दो। गुरुदेव सब जानते थे, कुछ न कह कर उनको घर भेजते थे।
आईये एक बार पुनः इस लेख के माध्यम से गुरुकृपा और शिष्य द्वारा सेवा के आदर्श मिसाल को पढ़ें , समझें और ज़रूरी हो सके तो जीवन में धारण करने का प्रयास करें।

पहली मुलाकात: गुरुदेव से पहली मुलाक़ात
पंडित रामजी दास जी मटन (काश्मीर) के रहने वाला थे। इन्हें पहली बार सत्गुरुदेव महात्मा मंगतराम जी के पवित्र दर्शन, जून 1940 में हुए, जब श्री महाराज जी पहली बार जलमादा, कोहाला आदि होते हुए चिनारी (जो अब पाकिस्तान में है) पधारे थे और रात मन्दिर की धर्मशाला में व्यतीत करके भगत बनारसी दास जी के साथ पंडित जी के डेरे पर पहुंचे।
पंडित रामजी दास कहते थे कि ” श्री महाराज जी के प्रथम दर्शन से ही मैं अति प्रभावित हुआ और ऐसा अनुभव हुआ मानो साक्षात् ईश्वर ही साकार रूप में मुझे दर्शन देकर कृतार्थ कर रहे हों।
मन्त्र-दीक्षा और चिनारी से अलग
दो-तीन दिन श्री महाराज जी वहीं ठहरे। पंडित जी की प्रार्थना स्वीकार करते हुए श्री महाराज ने वहाँ ही दूसरे दिन उन्हें मन्त्र-दीक्षा देकर कृतार्थ कर दिया। महाराज जी के वचनों के प्रभाव के कारण वहाँ की जनता के विचारों तथा भावनाओं में परिवर्तन आने लगा। दैवयोग से पंडित रामजी दास जी के घरेलू हालात में परिवर्तन आया। पंडित जी के पिता जी तथा भरजाई जी का देहान्त हो गया और विवश होकर इन्हें अक्टूबर माह, सन् 1941 में वापस मटन जाना पड़ा। घर की सारी व्यवस्था को अब इन्हे ही संभालना था। इस प्रकार पंडित जी चिनारी संगत से अलग हो गए ।
गुरुदेव का शिष्य से प्यार :
पंडित रामजी दास जी कहते हैं कि “अगली बार सत्गुरुदेव जब काश्मीर पधारे तो मुझे पुनः उनके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सन् 1947 में महाराज जी के मटन में हमारे घर पर पधारने प्रार्थना स्वीकार की। अनन्तनाग में श्री रघुनाथ भट्ट ने, जो कि उस इलाके के डिप्टी कमिश्नर थे, अपने यहाँ ठहरने की प्रार्थना की, परन्तु महाराज जी ने कहा कि इनको ती अपने प्रेमी के पास मटन ही जाना है।” गुरुदेव की पंडित रामजी दास जी के ऊपर बड़ी कृपा दृष्टि थी। महाराज जी की सादगी, सच्बाई, नियमित जीवन और सबके प्रति सद्भावना का वहां सभी लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
बिना सेवा के आश्रम में ठहरना अनुचित है — संगत पर बोझ नहीं बनना चाहिए
एक बार की बात है देहरादून में पधारे हफ्ता ही हुआ था कि प्रेमी रामजी दास दर्शन करने आ गया। उसके आने पर श्री महाराज जी ने फरमायाः “कैसे आये हो?”
रामजी दासः सेवा और दर्शन के वास्ते।
श्री महाराज जीः- ‘किस की इजाज़त से आया है? बस दर्शन हो गए। रात रहकर वापिस चले जाओ। वक्त देखना चाहिए। ख़्वाह-म-ख्वाह दूसरों पर बोझ बनना कहां तक अच्छा है? उधर तुम्हारी मां इनको गालियां निकालती होगी। जाकर मां की सेवा करो और थोड़ा बहुत काम भी कर लो। अभी थोड़े दिन हुए उधर काहनूवान ठहर कर आये हैं, फिर इतनी जल्दी दर्शन की क्या जरूरत पड़ गई है?’
रात सत्संग के बाद पूछाः ‘प्रेमी ! तेरे पास कितने रुपये है?’
रामजी दास: “महाराज जी! दो-तीन ।”
श्री महाराज जीः ‘अब वापिस किस तरह जाओगे?’
रामजी दासः- “बनारसी से ले लूंगा।”
श्री महाराजः- ‘उसके पास कौन सा बाप का खजाना पड़ा है जो दे देगा? तुम्हारी नज़र संगत की भेंट पर पड़ी हुई है। खुद उसे खर्च करने से रोकते हैं, तुमको अपने आप कैसे दे सकता है?’
रामजी दासः “महाराज जी! काहनूवान में बाबू अमोलक राम ने भी चलते समय भक्त बनारसी दास से रुपये लिए थे।”
श्री महाराज जी यह सुनकर बनारसी दास पर बहुत नाराज हुए।
भक्त जी: “वह रुपया अदा कर देंगे। खास वज़ह करके मैंने खुद ही रुपये दे दिये थे, उन्होंनेनहीं मांगे थे। भक्त जी ने जवाब दिया।”
श्री महाराज जीः ‘खबरदार, आईदा ऐसा लेन-देन का व्यौपार किया तो’। रामजी दास खामोश रहा। इस प्रकार एक हफ्ता तक प्रेमी को ठहराने के बाद उसे वापिस भेज दिया। जब भक्त जी उसको छोड़कर आए तो आपने फरमायाः ‘प्रमी नाराज तो नहीं हो गया?’
भक्त जी ने अर्ज कीः “महाराज जी! नाराज़ क्या होना था? उसके भले के वास्ते ही आपने फरमाया था।”
सेवा : प्रेमी रामजी दास का हथनीकुंड आश्रम निर्माण में विशेष योगदान रहा , इस रमणीक स्थान पर गुरुदेव ने अनेक बार आकर तपस्या भी की थी, प्रेमी जी ने सतगुरुदेव जी द्वारा स्थापित नियमों, आदेशों एवं आज्ञायों का सदैव जीवन में पालन किया एवं पूर्ण रूप से गुरु परायण जीवन व्यतीत किया। निःसंदेह उन्होंने अपना जीवन एक सच्चे समता भिक्षु के रूप में व्यतीत किया जिसमें कठोर तप, त्याग एवं वैराग भरपूर रूप से शामिल है।
निष्कर्ष : श्री महाराज जी बातों ही बातों में आने वाली घड़ी के बारे में सब कुछ बता रहे थे, परन्तु विश्वास किसको आता है। महाराज जी तो अंतर्यामी थे, सक कुछ जानते हुए भी इस बात को किसी को महसूस नहीं होने देते थे। महाराज जी के सामने कोई भी विचार रखा जाता था तो वे थोड़े से शब्दों में उसका समाधान पेश कर देते थे। प्रश्नकर्ता भी अपने प्रश्न का तर्कपूर्ण उत्तर सुनकर निरुतर हो जाता था। उनका ज्ञान, अनुभव और वाणी का प्रवाह आश्चर्यजनक था। पंडित रामजी दास जी कहते हैं कि “पता नहीं कौन से शुभ कर्मों के फलस्वरूप हमें उनका सम्पर्क मिला। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि चाहे हमको कितने ही जन्म धारण करने पड़े, परन्तु वे हमको जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य की प्राप्ति अवश्य करवाएंगे।”
सच्चा गुरु अपने शिष्य पर सदा दृष्टि रखता है और समय-समय पर उसे कसौटियों से भी गुजारता है, ताकि वह आत्मिक रूप से परिपक्व बन सके। वह शिष्य की भलाई के लिए कभी-कभी कठोर स्वर में भी सच कह देता है — यह उसका क्रोध नहीं, करुणा होती है। सतगुरु कभी झूठी प्रशंसा या मनोहारी शब्दों से शिष्य को भुलावे में नहीं रखता। वह स्पष्ट, खरी और सत्य बात कहता है, ताकि शिष्य भी जीवन में साहस के साथ सच्चाई बोले, किसी को भ्रम में न रखे और ना ही किसी मिथ्या संतोष में जिए।