पुण्य तिथि : 11 अगस्त 2014
ध्यान दें: समता नीति के अनुसार, गुरुदेव ने कभी भी दीक्षित और अदीक्षित प्रेमी में कोई भेद न करने को कहा है और सर्व जगत को संगत समतावाद का दर्जा दिया है। परन्तु साक्षात् गुरु-कृपा प्राप्त करना एक अलौकिक घटना से कम नहीं है; इसका मूल्य एक सच्चे शिष्य को ही ज्ञात हो सकता है।
आदरणीय प्रेमी श्री राजा राम लांबा जी का जन्म सन 1923 में टैक्सला, रावलपिंडी (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ। 1950 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में, जब सतगुरुदेव अंबाला पधारे थे उस समय उन्हें गुरुदेव से सत शिक्षा प्राप्त हुई। गुरुदेव के सान्निध्य में आकर उनका जीवन आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हुआ।
प्रेमी जी हिकमत का कार्य करते थे, जिसमें हड्डी बांधना, मोच निकालना आदि प्रमुख थे। वे इस कार्य को पूर्णतः निष्काम भाव से करते और अपनी तरफ से दूध व दवाई भी उपलब्ध करवाते थे। उनकी सेवा का उद्देश्य केवल दूसरों का दुख दूर करना था, न कि किसी प्रकार का लाभ कमाना।
उनकी दिनचर्या अत्यंत अनुशासित थी। वे सुबह 4 बजे उठकर सिमरन-अभ्यास करते, तत्पश्चात 11–12 बजे तक समता शास्त्र का अध्ययन करते। इसके बाद वे अपने अन्य कार्यों में संलग्न होते। वार्षिक समता सत्संग सम्मलेन अम्बाला, जगाधरी व हथनीकुंड के साथ साथ जहां कहीं भी समता सत्संग का आयोजन होता, वे अवश्य भाग लेते और विशेषतय लंगर सेवा में सक्रिय रहते।
प्रेमी जी अक्सर 15 – 15 दिन का समय निकालकर हथनीकुंड आश्रम में एकांतवास के लिए जाते। वहां वे सिमरन और आत्मचिंतन में समय बिताते।
एक बार प्रेमी जी का फ्रैक्चर हो गया, जिसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। किंतु उन्होंने वहां भी अपने साथ समता शास्त्र की पुस्तकें रखीं। जो डॉक्टर उनका इलाज कर रहे थे, वे उनके इस नियमबद्ध जीवन और आध्यात्मिक निष्ठा से प्रभावित होकर गुरुदेव के बारे में पूछने लगे। गुरुदेव के वचनों और सत्संग को सुनने के बाद वह डॉक्टर इतने प्रभावित हुए कि समय निकालकर प्रेमी जी के पास बैठते और गुरुवाणी का श्रवण करते।
11 अगस्त 2014 को प्रेमी जी का देहावसान हुआ। आज भी उनका पुत्र परिवार सहित संगत समतावाद से जुड़ा हुआ है और समाज सेवा की भावना को जीवित रखते हुए और समता के उसूलों पर अडिग है।