पुण्य तिथि : 13 दिसंबर 2014
करम के काटन कारने , हवन तपस्या यग ।
बाझ गुरु समरथ के , करम न टूटे तग ।।
सत्पुरुषों से मिलन साधारण घटना नहीं होती। वह केवल ईश्वर की विशेष कृपा से ही संभव होता है। इसी सत्य को अपने जीवन से प्रमाणित करने वाले श्रद्धेय प्रेमी नरेन्द्र जिन्दल जी, अम्बाला, सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी के ऐसे दीक्षित शिष्य थे, जिनका सम्पूर्ण जीवन समता, सेवा और अंतर्मुखी साधना का उदाहरण रहा।
सितम्बर 1953 में, जब उनकी आयु लगभग 24 वर्ष थी, उनकी प्रथम भेंट जगाधरी आश्रम में सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी से हुई। यह भेंट उनके मित्र एवं सहकर्मी प्रेमी गुरशरण दास जी के माध्यम से संभव हुई। उस समय तक वे संगत समतावाद से परिचित नहीं थे, किंतु रामायण के नियमित पाठ और पारिवारिक संस्कारों के कारण संत-दर्शन की भावना मन में विद्यमान थी।
जगाधरी आश्रम में सतगुरुदेव को अत्यन्त सादगी में विराजमान देखा गया—न कोई ठाठ-बाट, न कोई आसन-वैभव। एक दरी पर बैठकर शांति और वैराग्य से परिपूर्ण स्वरूप, नेत्रों में विलक्षण तेज और मुखमण्डल पर उदासीन भाव। यह दृश्य मन पर गहरा प्रभाव छोड़ गया।
अगले दिन मूर्ति पूजा के विषय में प्रश्न किया गया। सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी ने अत्यन्त स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा कि केवल मूर्ति पूजा से कल्याण संभव नहीं है, जब तक उस देवता या सत्पुरुष के जीवन आदर्शों को अपने जीवन में नहीं उतारा जाता।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रंथों का पाठ तभी सार्थक है जब उनके विचार व्यवहार में उतरें। यह विचार प्रेमी नरेन्द्र जिन्दल जी के लिए नवीन था। अब तक धार्मिकता कर्मकांड तक सीमित थी, परंतु यहाँ से अंतर्मुखी सोच का बीज पड़ा। यद्यपि उस समय इन वचनों का मर्म पूर्णतः समझ में नहीं आया, पर वे शब्द बार-बार मन में गूंजते रहे। यही वह अवस्था थी जहाँ बाह्य भक्ति से आंतरिक खोज की यात्रा प्रारम्भ हुई।
नवम्बर 1953 में सतगुरुदेव के अम्बाला आगमन के पश्चात् नियमित सत्संग का अवसर मिला। प्रारम्भ में यह भ्रम बना रहा कि सतगुरुदेव राम या कृष्ण का नाम क्यों नहीं लेते। कई दिनों तक सत्संग में जाने के बाद यह भी विचार आया कि उनकी बात समझ में नहीं आती, इसलिए जाना बंद कर दिया जाए।
किन्तु यह संत-कृपा ही थी कि स्वयं सतगुरुदेव के बुलावे पर पुनः सत्संग में पहुँचना पड़ा। वहीं वह ऐतिहासिक क्षण आया जब विचार करने के लिए कहा गया। अपनी असमर्थता के बावजूद जो प्रश्न मुख से निकला—वह श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से संबंधित था। यह प्रश्न स्वयं की बुद्धि से नहीं, बल्कि सतगुरुदेव की कृपा से संभव हुआ।
उसी प्रश्न पर पूरा सत्संग हुआ और वह अमृतवाणी उच्चारित हुई—
तन के सुखिए बहु मिले,
मन का मिला न कोई।
जब मन का सुखिया मिला,
तब पार उतारा होई॥
यहीं से यह निश्चय दृढ़ हुआ कि अब नियमित सत्संग ही जीवन का आधार रहेगा।
जब भगवान राम के दर्शन की अभिलाषा प्रकट की गई, तब सतगुरुदेव ने प्रश्न किया—“कौन से राम?”
उन्होंने स्पष्ट किया कि दशरथनन्दन राम के बाह्य दर्शन अनेक लोगों ने किए, परंतु उनका कल्याण नहीं हुआ। जब तक राम के दर्शन हृदय में नहीं होंगे, तब तक बाहरी पहचान भी संभव नहीं।
तुलसीदास जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब भीतर राम के दर्शन हुए, तभी सारा संसार राममय दिखाई दिया। यही राम के दर्शन अन्दर करने का वास्तविक अर्थ है।
उन्होंने यह भी समझाया कि प्रभु राम का जीवन कर्म और साधना का संतुलन था—दिन में राजकार्य और रात्रि में ईश्वर आराधना। गृहस्थ जीवन में रहते हुए यही सच्ची भक्ति है।
एक रात्रि सतगुरुदेव ने ध्यान में घर आने की बात कही। अगले दिन उन्होंने घर का सटीक विवरण बताया—तीसरी मंज़िल, कड़ियों की छत, अलमारियाँ और खिड़कियाँ। यह सुनकर यह पूर्ण विश्वास दृढ़ हुआ कि यह कोई साधारण संत नहीं, बल्कि पहुँचे हुए सत्पुरुष हैं।अब पूर्ण समर्पण के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं था।
21 नवम्बर 1953 को दीक्षा का वचन मिला और 22 नवम्बर को प्रातःकाल दीक्षा प्रदान की गई। उस समय सतगुरुदेव ने कहा—
“गुरु शिष्य को पकड़ता है,
शिष्य गुरु को नहीं पहचान सकता।”
साथ ही यह कठोर निर्देश भी दिया गया कि कच्ची अवस्था में नाम का प्रचार न किया जाए। 4 फरवरी 1954 को सतगुरुदेव ने अमृतसर में अपनी नश्वर देह का त्याग किया। उनके पूर्व वचन—“पता नहीं लौटें या न लौटें”—का अर्थ तब पूर्णतः स्पष्ट हुआ।
श्रद्धेय प्रेमी नरेन्द्र जिन्दल जी सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी के दीक्षित शिष्य थे। कम आयु में ही उन्हें सतगुरुदेव का अनमोल सानिध्य प्राप्त हुआ और जीवनपर्यंत उन्होंने संगत सेवा को ही अपनी साधना बनाया।
अंबाला, पटियाला, दिल्ली, चंडीगढ़, बरेली, हल्द्वानी, देहरादून, शिमला, जगाधरी सहित अनेक संगतों से उनका गहरा जुड़ाव रहा। साप्ताहिक, मासिक एवं वार्षिक समता सम्मेलनों में उनकी सक्रिय सहभागिता उनके सेवा भाव को दर्शाती है।उनका जीवन निष्काम सेवा, विनम्रता, त्याग और समर्पण की सजीव मिसाल रहा।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और सतगुरुदेव जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें भी सत् विश्वास, सत् बुद्धि और ईश्वर प्रेम प्रदान करें, ताकि हम भी सेवा रूपी अमूल्य धन को अपने जीवन में संचित कर सकें।