प्रेमी श्री नंद लाल बिन्द्रा जी

“गुरु कृपा ही केवलम्”

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प्रेमी श्री नंद लाल बिन्द्रा जी

पुण्य तिथि : 24 जनवरी 2016

पूरा गुरु पूरा सिख, जग को जीवन देत ।
‘मंगत’ तिनके चरन की, धूड़ी सीस रमीत ॥

गुरु कृपा संसार की सबसे दुर्लभ एवं दिव्य घटना है जिसके प्राप्त होने से सब सुलभ हो जाता है , धन्य हैं वो जीव जो गुरु कृपा के पात्र बनते हैं एवं गुरु समर्पित जीवन जीते हैं। आज हम ऐसे ही एक शिष्य प्रेमी श्री नंद लाल बिन्द्रा जी की बात करेंगे जो न ही केवल गुरु कृपा पात्र बने बल्कि गुरु समर्पित जीवन जीते हुए कई दिव्य घटनाओं के साक्षी भी बने।

गुरु द्वारा शिष्य की रक्षा

पाकिस्तान बनने से पहले की बात है। एक बार श्री महाराज जी रावलपिंडी में अपने बड़े भाई पं. ठाकुर दास जी के घर ठहरे हुए थे। नंद लाल जी अपने चाचाजी के साथ वहाँ पहुँचे। उनके चाचाजी श्री महाराज जी से दीक्षा ले चुके थे। चाचाजी ने गुरुदेव से कुरी चलने के लिए प्रार्थना की, क्योंकि उनका निवास स्थान वहीं पर था। गुरुदेव ने प्रार्थना स्वीकार कर ली।
कुरी जाने के लिए दो ताँगे मंगाए गए। अगले ताँगे में श्री महाराज जी और भगत जी बैठे तथा पिछले ताँगे में नंद लाल और उनके चाचाजी। रास्ते में पहली नदी ताँगे ने पार कर ली। उस समय सड़कें तो बनी नहीं थी, बहुत ऊबड़-खाबड़ रास्ता था। दूसरी नदी भी आसानी से पार हो गयी। जब तीसरी नदी घोड़ी पार कर रही थी, तभी अचानक वह रुक गई। नदी के पास ही एक ऐसा मोड़ था कि पीछे से आने वाले पानी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। ऐसा प्रतीत हुआ मानो घोड़ी को आने वाले सैलाब का पता पानी को सूंघकर लग गया था। घोड़ी आगे बढ़ने को तैयार नहीं थी। परन्तु ताँगे वाले ने चाबुक मार-मार कर उसको आगे बढ़ने के लिए मज़बूर कर दिया। अचानक ही नदी में पानी बढ़ने लगा। घोड़ी के पैर उखड़ने लगे। तभी नंद लाल जी की नज़र नदी पार खड़े श्री महाराज जी पर पड़ी। वे हाथ हिलाकर अपनी ओर आने का इशारा कर रहे थे। तभी घोड़ी के पैर पुनः जमने लगे। धीरे-धीरे पानी भी कम होने लगा। सब नदी पार पहुँच गए। बाद में भगत जी ने हमको बताया था कि श्री महाराज जी ने मुझको कहा था कि जब तक दूसरा ताँगा नहीं आ जाता तब तक आगे नहीं जाना है। इससे पता लगता है कि गुरुदेव ने स्वयं हमारी रक्षा की व्यवस्था की थी।

मौत की याद

नंद लाल जी को गोलड़ा (पाकिस्तान) में दीक्षा मिली थी। 1944 में उनकी माता जी का देहान्त हो गया था। किसी प्रेमी ने इसकी सूचना श्री महाराज जी को गंगोठियाँ में दे दी। श्री महाराज जी का अपने कर कमलों से लिखा पत्र आया कि माता जी के क्रिया-कर्म से फ़ारिग होकर गंगोठियाँ पहुँचे। पत्र मिलने के तीन-चार दिन पश्चात् प्रेमी जी अपने मित्र के साथ गुरु चरणों में हाज़िर हुए। जब नमस्कार करके बैठ गए तब गुरुदेव ने फ़रमाया, “प्रेमी ! तुमको यहाँ इसलिए नहीं बुलाया कि तुम्हारी माता का अफ़सोस किया जावे, बल्कि इसलिए बुलाया है कि अपनी मौत को याद रखो। अपनी मौत की याद से ईश्वर की याद आती है। मौत की याद ही पाप कर्म करने से रोकती है और लोक-परलोक का सुधार हो जाता है।”

गुरुदेव द्वारा सत् शिक्षा

रात को बारिश हुई। गुरुदेव रात के दो बजे बाहर तशरीफ़ ले गए। जब सुबह वापिस आए तो देखा कि पांव से खून निकल रहा था। जोंक खून चूस कर उतर गई थी। मिट्टी लगा दी गई, खून बंद हो गया। प्रेमी नंद लाल जी ने अर्ज की: “महाराज जी! बेअदबी माफ़ हो, दास की बिनती यह है कि आजकल मौसम बरसात की वज़ह से जोंकें वगैरा आम हो रही हैं। रास्ता भी घास वगैरा की वज़ह से खराब हो रहा है। बारिश, आंधी वगैरा भी चलते रहते हैं। आप रात को इधर ही ठहरे रहा करें। यह जगह भी एकांत है और यहाँ ही ठहरने में क्या हर्ज है?”
श्री महाराज जी ने फरमायाः “प्रेमी, तुम्हारा कहना ठीक है। यह जगह भी एकान्त है। फ़कीरों का यह बाहर जाने का प्रोग्राम किस लिए है? यह इसलिए है कि तुम प्रेमियों को शिक्षा मिले। कुछ इससे सीखो, सबक लो। जब तुम भी इस तरह का प्रोग्राम बनाओगे तब ही इस निन्द्रा से छुट्टी पाकर एकान्त में समय दे सकोगे। इनके वास्ते हर जगह ठीक है, हर समय ठीक है। अगर यह थोड़ा सा भी आलस करेंगे तुम ज़्यादा करोगे। ख़्याल करोगे, महाराज जी बाहर नहीं जाते थे, अपने रहने वाले जगह ही बैठे रहते थे। ऐसा विचार करके खुद चित्त को ढाँदस दे लिया करोगे। तुमको चेतावनी देने के लिए ऐसा कड़ा प्रोग्राम बना रखा है। गद्दियों पर बैठकर या चारपाइयों पर ही घरों में ऐसे साधन नहीं हो सकता। बाहर खुली हवा होती है। वहाँ बैठने से आलस निंद्रा से निजात मिलती है। घरेलू आराम, आलस देने वाले होते हैं। ऋषि, मुनि, जंगलों, गुफ़ाओं, कन्द्राओं में ही ज़्यादा रहना पसन्द करते थे। जिन्होंने संसारियों में विचरना होता है वह किसी प्रोग्राम को बना कर चलते हैं। इनका स्वभाव रात को बाहर जाने का आज से नहीं है। यह तो सात वर्ष की उम्र से ऐसा शुरू कर दिया था। पहले-पहल ज़रा पौ फूटने से पहले जब माता जी जागती थीं, और काफ़ी रात होती थी वे झाडू लगाना शुरू करतीं, यह आहिस्ता से बाहर निकल जाते। जब अच्छी तरह सूरज निकल आता तब डेरे पर लौटते। यह भी रज़ाइयों में बैठकर तप करते तो तुम प्रेमियों पर इनके जीवन से क्या असर पड़ेगा? इन्होंने बेशक सफ़र तय कर लिया है, मगर जिस तरह का प्रोग्राम शुरू हुआ है वैसा ही आखिर तक चलेगा। चाहे आंधी हो या बारिश, सख़्त सर्दी हो या सख़्त गर्मी, जब-तक इस खलड़े में शक्ति है इसे ढील नहीं दी जावेगी। , किसी समय शरीर में नर्मी-गर्मी के कारण प्रोग्राम में फ़र्क नहीं आने दिया। अलबत्ता रावलपिंडी में कश्मीर चंद के घर जाकर बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हो गई, तब शरीर ने बाहर जाने से आरी कर दिया था, तब कहीं नहीं गए।”

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संत नीम करोली बाबा जी के साथ प्रेमी नन्द लाल बिंद्रा जी

नाद (शब्द) का अनुभव

जब सायंकाल के समय प्रेमी पीर ख़्वाजा जंगल में गए तो श्री महाराज जी स्वच्छ घास वाली जगह पर लेटे थे। उसी समय उठ कर बैठ गए। उनकी अद्भुत मस्ती की हालत थी। श्री महाराज जी वाणी उच्चारण करते रहे, जो कि शब्द की महिमा के बारे में थी। प्रेमी जी ने श्री महाराज जी से प्रश्न किया, ‘महाराज जी ! रोम-रोम में शब्द की ध्वनि कैसे समाई हुई है?’ श्री महाराज जी ने अपनी पीठ से कुर्ता उठाकर नंद लाल जी से कान लगाने को कहा। जो आनन्द उस समय अनुभव हुआ उसकी खुमारी 5-6 दिन तक मन में बनी रही।
दूसरे दिन फिर सायंकाल दोनों प्रेमी जंगल को गए। लेकिन श्री महाराज जी कल वाले स्थान पर नहीं मिले। इधर-उधर ढूंढते-ढूंढते श्री महाराज जी को एक बबूल के पेड़ के नीचे बैठा हुआ पाया। वह स्थान ऊँचा-नीचा था तथा छोटे-छोटे कंकड़ बिखरे पड़े थे। श्री महाराज जी ने हमको बैठने को कहा। बहुत कठिनाई से जगह साफ करके बैठ गए। प्रेमी जी ने श्री महाराज जी से कहा, ‘जहाँ आप कल सायंकाल विराजमान थे वह जगह समतल, साफ और बैठने योग्य थी। जिस स्थान पर आज बैठे हैं यह बैठने के लायक नहीं है। आप कल वाले स्थान पर क्यों नहीं बैठे।’
श्री महाराज जी ने फ़रमाया, “शुरू से ही इनका प्रोग्राम यह रहा है कि जहाँ किसी ने इनको एक स्थान पर देख लिया, दूसरे दिन स्थान बदल दिया।” प्रेमी जी ने इसका कारण पूछा तो श्री महाराज जी ने कहा, “प्रेमी ! यह पत्थर पूज कौम है। सन्तों के वचनों पर तो चलते नहीं, मगर उनके चले जाने के पश्चात् उस जगह की पूजा, अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए, आरम्भ कर देते हैं। इसी कारण इनको ऐसा करना पड़ता है।”

श्रद्धांजलि

आज आपकी पुण्यतिथि पर हम सब आपको याद कर, आपकी अटूट सेवा को शत शत नमन करते हैं और सतगुरदेव जी से सत विश्वास, सत बुद्धि व ईश्वर प्रेम प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं ताकि हम सब भी सेवा रूपी अमोलक धन को अपने जीवन में एकत्रित करने का भरपूर प्रयास कर सकें।

श्री सतगुरुदेव जी के आशीर्वाद से संगत के सभी सदस्य बजुर्गों के सच्चे जीवन से इसी प्रकार प्रेरणा लेते रहेंगे आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और सतगुरुदेव जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें भी सत् विश्वास, सत् बुद्धि और ईश्वर प्रेम प्रदान करें, ताकि हम भी सेवा रूपी अमूल्य धन को अपने जीवन में संचित कर सकें।

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है। उपरोक्त लेख की अधिकांश जानकारी समता साहित्य से ली गयी है।
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

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