तूँ ठाकर मैं तुमरा जीया

प्रेमी श्री लोक नाथ सूरी जी

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प्रेमी श्री लोक नाथ सूरी जी

पुण्य तिथि : 04 अगस्त 1990

गुरु शिष्य सम्बन्ध एक अनकहे अनुबंध जैसा है, जहाँ एक सच्चा गुरु बिना किसी वादे के शिष्य का साथ जन्मों तक नहीं छोड़ता और एक सच्चा शिष्य बिना किसी दावे के अपना पूर्ण जीवन अपने मुर्शिद को समर्पित कर देता है, ऐसा कहें की यह एक सहज प्रक्रिया है जो इस पवित्र सम्बन्ध में अनिवार्य है।

आज के इस लेख में हम सतगुरुदेव महात्मा मंगत राम जी के एक शिष्य प्रेमी श्री लोक नाथ सूरी जी का जिक्र करेंगे ,प्रेमी जी का जनम 1929 में गोल्डा शरीफ जिला रावलपिंडी में हुआ ( जो अब पाकिस्तान में है) । जब आप छोटे ही थे तो आपके पिता जी का देहांत हो गया। आपकी माता जी को श्री महाराज जी के प्रति बहुत श्रद्धा थी और सत्संग से बहुत लगाव था। आप अपनी माता जी के साथ पकिस्तान में ही सत्संग में जाया करते थे।आपका विवाह भी वहीं पकिस्तान मे हुआ। हिदुस्तान पाकिस्तान बटवारे के पश्चात आप अम्बाला में आ कर बसे। जब यहाँ अम्बाला में गुरुदेव का आना हुआ तो आपको और आपकी धरम पत्नी श्री बसंती देवी जी को श्री महाराज जी ने दीक्षित करके सत शिक्षा से नवाज़ा।

प्रेमी जी जगाधरी सम्मलेन में हमेशा पूरे परिवार व बच्चों के साथ जाते थे और आस पास जहा भी सत्संग हो शामिल होते थे। जगाधरी सम्मलेन में परिवार लंगर सेवा, सफाई में और आप मुख्यता पर्ची / रसीद की जगह अक्सर सेवा किया करते थे।

प्रेमी जी की दिनचर्या में सुबह 3 बजे उठना और सिमरन अभ्यास करना, फिर 5 बजे से ग्रन्थ श्री समता प्रकाश एवं ग्रन्थ श्री समता विलास में से वाणी पाठ व सतवचनों का स्वाध्याय करना और फिर बाकी कार्य करने होते थे।
आज प्रेमी जी के सम्बन्ध में हमारे पास जानकारी कम है लेकिन दास दावे से कह सकता है की आज भी प्रेमी जी महाराज जी की छत्रछाया में किसी जन्म में अपने आध्यात्मिक विकास की और अग्रसर हो रहे होंगे।

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है। उपरोक्त लेख की अधिकांश जानकारी आदरणीय प्रेमी जी के परिवार द्वारा प्रदान की गई है, जिसके लिए संगत हृदय से उनकी आभारी है।
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

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