प्रेमी लेखराज शर्मा जी

“सांची जुगती धार के ।।”

Profile Image

प्रेमी लेखराज शर्मा जी

पुण्य तिथि : 25 नवंबर 2003

प्रभ अपने से मांगयो , गुरमुखता तत्त सार ।
चार पदारथ तिसमें , ‘मंगत’ कहे पुकार ।।

गुरु शिष्य सम्बन्ध एक अनकहे अनुबंध जैसा है, जहाँ एक सच्चा गुरु बिना किसी वादे के शिष्य का साथ जन्मों तक नहीं छोड़ता और एक सच्चा शिष्य बिना किसी दावे के अपना पूर्ण जीवन अपने मुर्शिद को समर्पित कर देता है, ऐसा कहें की यह एक सहज प्रक्रिया है जो इस पवित्र सम्बन्ध में अनिवार्य है।

आज के इस लेख में हम सतगुरुदेव महात्मा मंगत राम जी के एक शिष्य प्रेमी लेखराज शर्मा जी का जिक्र करेंगे ,प्रेमी जी गांव साई, रावलपिंडी ( जो अब पाकिस्तान में है) के रहने वाले थे। आदरणीय प्रेमी लेखराज जी संगत समतावाद के उन कर्मठ सेवादार प्रेमियों में से थे जिन्हें श्री महाराज जी का विशेष सानिध्य प्राप्त हुआ। आज़ादी के बाद वे अपने परिवार सहित बलदेव नगर आकर रहने लगे। उनके पांच भाई और पांच बहनें थीं। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती शीला देवी जी भी समता तालीम के प्रति अत्यंत श्रद्धावान थीं।

समता तालीम और गुरुदेव के प्रति अटूट लगन

लेखराज जी का मन समता तालीम के मनन, निध्यासन और उसके आचरण में ही डूबा रहता था। वे हमेशा ही गुरुदेव के निकट रहकर उनकी आज्ञाओं पर चलने की लालसा रखते थे। जब श्री गुरुदेव मलोट में विराजमान थे, तब प्रेमी लेखराज जी ने बार-बार चिट्ठियों के माध्यम से प्रार्थना करते हुए उन्हें बलदेव नगर आने की अरदास की। इस पर महाराज जी भी प्रेमपूर्वक कहा करते थे कि “प्रेमी! तुम औरों के नाम से बहाने बनाकर खुद ही चिट्ठियां लिखते हो—हमें सब मालूम है।”

उनकी निरंतर प्रार्थना पर कृपा करके श्री महाराज जी मलोट से बलदेव नगर पधारे और रावलपिंडी से आई ब्राह्मण बिरादरी को सतमार्ग पर चलने का आशीर्वाद देते हुए सत्संग कराया तथा प्रेमियों को सत-शिक्षा से निहाल किया।

सेवा, सद्भाव और अद्भुत करुणा

आदरणीय प्रेमी लेखराज जी पर गुरुदेव की विशेष कृपा थी। उन्होंने केवल एक वर्ष फौज में नौकरी की थी, फिर भी उन्हें जीवनभर पूरी पेंशन मिलती रही। वे हक़ीमी (औषधि-चिकित्सा) का ज्ञान भी रखते थे और ज़रूरतमंदों की हमेशा नि:स्वार्थ सहायता करते थे। वे कभी भी किसी से उपचार का शुल्क नहीं लेते थे।

एक उल्लेखनीय घटना यह है कि एक व्यक्ति की बाजू में चोट लगने से सेप्टिक हो गया और डॉक्टरों ने बाजू काटने की सलाह दी। प्रेमी लेखराज जी ने उस परिवार से कहा कि “डॉक्टर ने तो कह ही दिया है, पर आप मुझे एक मौका दें।” उनके उपचार से कुछ ही दिनों में वह व्यक्ति पूर्ण रूप से ठीक हो गया और बाद में सारी उम्र मिस्त्री का काम करता रहा।

समता सत्संग की स्थापना और प्रचार

बलदेव नगर में समता सत्संग शुरू करने और उसे निरंतर जारी रखने में प्रेमी लेखराज जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे आदरणीय प्रेमी उधो राम जी के साथ मिलकर संगत को जागरूक करते, समता शिक्षा का प्रचार करते और अपने जीवन को गुरुदेव के बताए मार्ग—सादगी, सत्य, सेवा, सत्संग और सतसिमरन—के पालन में व्यतीत करते रहे।

पत्राचार द्वारा गुरुदेव से वार्तालाप और उनका आध्यात्मिक संवाद

संवत 1999 के एक जेठ माह में, जब श्री महाराज जी एकांत निवास में तप कर रहे थे, तब प्रेमी लेखराज साई निवासी का एक पत्र प्राप्त हुआ। इसमें शिकायत थी कि गंगोठियां में उन्हें पीरों पर बलि चढ़ाने के लिए मजबूर किया जा रहा है और लिखा था:

“प्रभु, आपके पवित्र विचारों से कई लोग लाभ उठा चुके हैं, मगर आपके गंगोठियां के लोग ठीक मार्ग पर नहीं आ रहे। दास के इंकार करने पर भी वे पीर ख्वाजा पर बकरा भेंट करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।”(उस समय वहाँ यह रिवाज़ था कि लड़की की शादी पर बकरे की बली चढ़ाई जाती थी और उसकी खालें पेड़ों पर लटकाई जाती थीं।)

श्री महाराज जी का दिव्य उत्तर

गुरुदेव ने प्रेमी लेखराज जी को उत्तर दिया:

Leave a comment



3+4 :

address icon

संगत समतावाद धर्मशाला – हरिद्वार
हिमालय डिपो, गली न.1, श्रवण नाथ नगर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)