पुण्य तिथि : 28 जून 1972
पूरा गुरु पूरा सिख, जग को जीवन देत ।
‘मंगत’ तिनके चरन की, धूड़ी सीस रमीत ॥
गुरु के प्रति निष्काम प्रेम और सेवा ही वह साधना है, जो व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठाकर लोक-मंगल का माध्यम बना देती है। आदरणीय प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी का जीवन इसी सत्य का सजीव उदाहरण था। उनकी पुण्यतिथि पर हम श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान के साथ उनके प्रेरणादायी जीवन का स्मरण करते हैं।
आदरणीय प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी का जन्म पंजाब के मोहाली ज़िले के सिसवां ग्राम में हुआ। बाद में आपका परिवार अंबाला आकर बस गया। आपके बड़े भाई का नाम श्री राम मूर्ति जी था। बचपन से ही आपका स्वभाव सरल, विनम्र और आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था।
श्री फ़कीर चंद जी के जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण अवसर तब आया, जब अंबाला निवासी श्रद्धेय प्रेमी श्री जगन्नाथ जी के साथ उन्हें श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगत राम जी महाराज के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह प्रथम मिलन ही उनके जीवन की दिशा बदलने वाला सिद्ध हुआ। गुरु-दर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने अपने जीवन को गुरु-चरणों में समर्पित कर दिया। श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी महाराज ने अपनी कृपा से प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी को अपने श्रीचरणों में स्थान दिया तथा मई 1951 में उन्हें दीक्षा प्रदान की।
गुरुदेव जब अंबाला में विराजमान थे, तब प्रेमी फ़कीर चंद जी प्रतिदिन श्रद्धा और प्रेमपूर्वक उनके लिए दूध लेकर जाया करते थे। यह सेवा देखने में भले ही साधारण प्रतीत हो, किंतु उसमें उनकी निष्काम गुरु-भक्ति, समर्पण और प्रेम की गहराई स्पष्ट झलकती थी।
वर्ष 1953 में जब श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगत राम जी महाराज पुनः अंबाला पधारे, तब स्थानीय प्रेमियों ने निवेदन किया कि प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी आश्रम निर्माण के लिए भूमि अर्पित करना चाहते हैं। गुरुदेव की सहमति और आशीर्वाद से उनके द्वारा समता योग आश्रम, अंबाला शहर के लिए भूमि समर्पित की गई। यह सेवा केवल भूमि दान तक सीमित नहीं रही, बल्कि समता के प्रचार-प्रसार और संगठन की सुदृढ़ नींव रखने में उनका यह योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
वर्ष 1953 संगत समतावाद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में स्मरण किया जाता है। श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी के कर-कमलों द्वारा 25 सितंबर 1953 को प्रथम ट्रस्ट का गठन किया गया, जिसके ट्रस्ट सदस्यों में आदरणीय प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी भी सम्मिलित थे। उनके प्रति श्री महाराज जी का यह विश्वास उनके निष्काम सेवा-भाव और अटूट गुरु-भक्ति का सजीव प्रमाण था।
यह उनके लिए अत्यंत गौरव और सौभाग्य का विषय था कि उन्हें बाबू अमोलक राम जी, भक्त बनारसी दास जी, प्रेमी ओम कपूर जी तथा अन्य वरिष्ठ एवं समर्पित प्रेमियों के साथ संगत समतावाद के प्रबंधन, संगठनात्मक एवं सेवा कार्यों में योगदान देने का अवसर प्राप्त हुआ। यह केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं था, बल्कि संगत विस्तार, संगठन की सुदृढ़ता तथा समता के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने की एक महत्त्वपूर्ण सेवा थी, जिसे प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी ने पूर्ण निष्ठा, विनम्रता और समर्पण के साथ निभाया।
समता योग आश्रम, तपोभूमि में रसोई निर्माण के कार्य में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे तपोभूमि, देहरादून तथा ज्योलिकोट स्थित समता योग आश्रम में समय-समय पर जाकर सिमरन, अभ्यास और आध्यात्मिक साधना में लीन रहते थे। उनका विश्वास था कि सेवा और साधना—दोनों का संतुलन ही आध्यात्मिक जीवन को पूर्णता प्रदान करता है।
आदरणीय प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी समता योग आश्रम, जगाधरी तथा अंबाला शहर में आयोजित वार्षिक सम्मेलनों में अपने पूरे परिवार सहित नियमित रूप से उपस्थित रहते थे। तन, मन और धन से सेवा करना उनके परिवार की पहचान बन गया था। वे प्रत्येक सेवा को गुरु-आज्ञा मानकर पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता से निभाते थे।
उनकी गुरु-निष्ठा और सेवा-संस्कारों का ही प्रभाव है कि आज भी उनकी अगली पीढ़ियाँ समता के प्रचार-प्रसार, आश्रमों की सेवा तथा सत्संग की गतिविधियों में उसी समर्पण और श्रद्धा के साथ सक्रिय हैं। यह किसी भी साधक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसके द्वारा बोए गए संस्कार आने वाली पीढ़ियों में भी फलते-फूलते रहें।
प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी उन सौभाग्यशाली शिष्यों में रहे जिन्हें श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगत राम जी महाराज के महाप्रयाण के समय भी उनके निकट रहने का अवसर प्राप्त हुआ। यह सौभाग्य केवल उसी शिष्य को मिलता है जिसने अपने जीवन को पूर्णतः गुरु-चरणों में समर्पित कर दिया हो।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम श्रद्धापूर्वक उन्हें नमन करते हुए यही संकल्प लेते हैं कि उनके जीवन से सेवा, समर्पण, सादगी, गुरु-भक्ति और सत्संग-निष्ठा की प्रेरणा ग्रहण कर अपने जीवन को भी उसी मार्ग पर अग्रसर करें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आदरणीय प्रेमी श्री फ़कीर चंद जी को शत-शत नमन।