पुण्य तिथि : 15 सितम्बर 2008
एक दो का भरम नहीं , पूरन पूर समाये ।
‘मंगत’ शबद पछानया , पद निर्वान अगाहे ।।
श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी महाराज जी फरमाते हैं कि सत्पुरुषों के करीब बैठने से उनकी पवित्रता को अनुभव करके मलीन बुद्धि ठंडक को प्राप्त होती है। यह संग दोष असरात का नतीजा है।
आज हम ज़िक्र करेंगे प्रेमी श्री बरकत राम जी का जिन्होंने श्री महारज जी की संगती में आकर ठंडक प्राप्त की और अपने जीवन की तपिश को शांत किया ।
श्री सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी महाराज जी से दिक्षित प्रेमी श्री बरकत राम जी सुपुत्र श्री भवानी दास का जन्म सन 1922 में पश्चिमी पंजाब प्रांत के उस हिस्से में हुआ जो अब पाकिस्तान में हैं।
देश के विभाजन के बाद जब भारत में आए तो शुरुआत में पहले खन्ना और फिर बदायूं आदि स्थानों पर कुछ समय बिताना पड़ा परंतु अंत में जगाधरी में हलवाई की दुकान कर गुजर बसर होने लगा। प्रेमी जी के परिवार वालों से पता लगा कि पाकिस्तान में उनका परिवार गुरुद्वारों में ईश्वर भक्ति के लिए जाया करता था। यह उस ईश्वरीय वाणी का ही चमत्कार एवं आशीर्वाद था कि जगाधरी में प्रेमी श्री बरकत राम जी को श्री महाराज जी मिले और उनसे सत्-शिक्षा प्राप्त हुई।
गुरुदेव से दीक्षा प्रात करने के बाद प्रेमी जी ने अपनी धर्म पत्नी श्री लाजवंती जी एवं अपने बेटे और बेटियों को श्री महाराज जी की शिक्षा के साथ जोड़ने का प्रयास किया यह उनकी कृपा दृष्टि और अनुशासन का नतीजा है कि आज भी उनके परिवार वाले श्री सतगुरुदेव मंगतराम जी महाराज जी की शिक्षा पर चलने का प्रयास, दृढ़ भावना और पूर्ण लगन से कर रहे हैं।
आदरणीय प्रेमी जी के जीवन का अधिकतर भाग गुरुदेव से दिक्षित अन्य प्रेमियों की संगत में आश्रम सेवा सत्संग में गुजरा जिनमें मुख्यता प्रेमी गोपी चंद ढल, प्रेमी रामस्वरूप जी, प्रेमी रौनक राम जी आदि प्रेमियों के संग उन्हें काफी समय बिताने का मौका मिला। प्रेमी जी अक्सर तपोभूमि में एकांत वास के लिए जाया करते थे और घर में भी सत ग्रंथों का स्वाध्याय किया करते थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनको ग्रंथ श्री समता प्रकाश में दर्ज अमर वाणी के बहुत सारे दोहे जुबानी याद थे। वे अपनी बुलंद आवाज़ में अक्सर समता सत्संग में वाणी पाठ किया करते थे।
परिवार के अनुसार प्रेमी जी बहुत ही सूक्ष्म आहार लिया करते थे और अत्यंत जिंदादिल व्यक्तित्व के मालिक थे। जीवन के अंतिम पड़ाव में जब एक गंभीर बीमारी ने उन्हें घेर लिया तो डॉक्टरों ने यह कह दिया था कि वे केवल दो-तीन महीने ही जीवित रह पाएँगे। लेकिन गुरुकृपा के बल पर उन्होंने न केवल उस बीमारी का बड़ी हिम्मत से सामना किया, बल्कि लगभग 16 वर्ष तक जीवनयात्रा को आगे बढ़ाया। अंततः 15 सितंबर 2008 की अल सुबह, गुरुदेव के शिष्य श्री बरकत राम जी शरीर का परित्याग कर अपने अगले रूहानी सफर की ओर प्रस्थान कर गए।