प्रेमी माता जैय कौर जी

“पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।”

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प्रेमी माता जैय कौर जी

पुण्य तिथि : 29 अगस्त 1994

औगन मेरे अधिक थे , भसम भए गुरु संग ।
शबद गुरु मीठा लगा , काल जाल भयो भंग ।।

श्री सतगुरुदेव फरमाते हैं :”जीव देह के भोगों में गलतान है मगर देह का एक बाल भी नहीं बना सकता। बताओ जो चीज दूसरी ताकत के सहारे है, वह कहां तक सुख दे सकती है। इस वास्ते इस ख्वाबे गफलत (अज्ञानता) को छोड़कर अपने असली हकीकी मालिक की तलाश आशिकों ने की।”

आज हम इस लेख में कुछ ऐसी ही प्रभु आशिक़ी का उल्लेख करने जा रहे हैं जहां न तो गुरुभक्ति में कोई कमी थी न ही गुरु मेहर की
स्वर्गीय माता जैय कौर का जन्म 1914 में पाकिस्तान स्थित जनपद रावलपिण्डी के एक गांव में हुआ। पाकिस्तान बन जाने पर भारत में आने पर अपने पति सरदार गुरदित सिंह के साथ कालका रैलवे स्टेशन के कवार्टर में रहने लगे। बाद में पटियाला में रेहना शुरू किया।

माता जैय कौर जी का बचपन से ही सादा जीवन रहा। इस लिए वे सफेद वस्तर ही मुख्यता धारण करते थे। इसके इलावा इनका शुरू से ही ऐसा विचार था कि इस मानव जीवन का सुधार कर सत मारग की प्राप्ति की जाये। नतीजतन माता जी का कई संतों , साधुओं व सत पुरूषों के सतसंग में आना जाना लगा रहता था। इस ख्याल में कि कोई पूर्ण सतगुरु मिल जाये जिसके उपदेश से सत पद प्राप्त हो सके। इसी उदेश्य से एक दो जगह गुरु धारण भी किये मगर तसलली ना हुई। आखिर यह निश्चय कर लिया कि पूर्ण गुरु उस को ही मानूँगी जो भरे सतसंग में बैठी संगत में से मुझे खुद बुला कर दीक्षा देगें।
जब ईच्छा तीवर और सच्ची होती है तो सत मार्ग पर लगाने वाला सत गुरु मिल ही जाता है। कुछ ऐसा ही माता जी के साथ हुआ और उनकी इच्छा के मुताबिक उन्हें सतगुरुदेव मिल गये।

सन 1950-51 के दौरान की बात है कि माता जैय कौर जी की एक सतसंगी बहन जो अम्बाला रहती थी वह कालका स्थित घर पर अचानक पधारी । उन्होंने माता जी की अधिक उदासीन वृती को देखकर कहा “बहन जी! आप मेरे साथ अम्बाला चलो। वहां आज कल एक पूर्ण सत पुरुष आये हुऐ हैं। बड़े उच्य कोटि के साधारन विचारों द्वारा संगत को निहाल कर रहे हैं, आप भी चल कर उनके सत विचारों को श्रवण करें। हो सकता है उनके विचारों द्वारा आप के मन की मुराद पूरी हो जावे।”

माता जैय कौर जी ने पति सरदार गुरदित सिंह जी को भी साथ लिया और दोनों उस बहन के साथ अम्बाला चले आये। शाम को सतसंग में शामिल हुए, जहां सत पुरुष के विचारों का मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। सतगुरुदेव भी माता जी की अन्तर आत्मा की आवाज को पेहचान गये। दूसरे दिन शाम के सतसंग में भी शामिल होने का मौका मिला।
सत्संग समाप्ति के पश्चात अभी कुछ संगत बैठी थी कि सत पुरुष ने खुद अपने सेवक भगत बनारसी दास से (माता जी की तरफ इशारा करके) फरमाया कि उस देवी से जाकर बोलो कि “कल सुबह अपने पति को साथ लेकर लभ्भू राम के तालाब पर आजाये और अपनी वस्तु (चीज) को संभाल ले,” (क्योंकि सतगुरू अकेली स्त्री को कभी उपदेश नहीं दिया करते थे। इस लिये अपने पति को साथ लाना पड़ता था)। जब भगत जी ने माता जी को ऐसा कहा, तो वे कहने लगीं कि सरदार जी को कल छुटी नहीं है, उनको डयुटी पर हाजिर होना है। भगत बनारसी दास जी ने वापिस जाकर गुरुदेव से कहा कि बहन जी ऐसा केह रही हैं। तो गुरुदेव ने फरमाया: “प्रेमी: उसे जाकर कहो, कि बहन जी, जिस की डयुटी है, वोह आप ही डयूटी देगा” तुम्हें क्या फिकर है। तुम अपनी चीज को संभालो।

गुरुदेव का यह सन्देश सुनते ही माता जी का मन खुश हो गया और उन्होंने खुद से कहा कि अब तेरी इच्छा पूर्ण होने वाली है। ऐसे पूर्ण गुरु कहां मिलेगा ! गुरुदेव ने तो मेरी रमज्ज (इच्छा) को समझ लिया है। बस। फिर क्या था, दूसरे दिन वक्त पर सुबह अपने पति के साथ गुरु चरणों में हाजिर हो गई। गुरुदेव ने परम कृपालता फरमाते हुए दोनों को गुरु दीक्षा प्रदान की, और फरमाया: “तुम जैसी देवियां ही इस भव सागर से कमाई करके पार हो सकती हैं। अब जाओ। अपना जीवन भी बनाओ और दुसरी देवियों को भी सतमारग पर चलाओ।”

जब गुरुदेव ने दफ्तर में डयूटी दी

दीक्षा लेने के पश्चात दुसरे दिन में अपने पति देव के साथ जब माता जैय कौर जी वापिस कालका जा रही थी तो रास्ते में सरदार जी ने गुस्सा किया, कहने लगे, ‘नाम (दीक्षा) तो ले ली है। अब ऑफिस में पता नहीं क्या बनेगा। चलो! एक काम तो हुआ, तेरी इच्छा तो पूरी हुई।’

वास्तव में सरदार जी का सत पुरूष के वचनों पर अभी पक्का विश्वास नहीं था। कालका पहुंचने पर उन्होंने माता जी से कहा कि तुम घर चलो और मैं सीधा ऑफिस जा रहा हूं, डयूटी का पता कर आऊँ। जब ऑफिस के गेट पर पहुंचा तो क्या देखा कि अंग्रेज आफिसर जो सब की हाजरी चैक करके गेट से बाहर आ रहा था, मुझे देख कर कहने लगा, अरे सरदार गुरदित सिंह जी आप हाजरी लगा कर कहां चले गये थे। सरदार जी यह सुन कर चुप हो गये।

आफिसर के चले जाने के बाद जब सरदार जी अन्दर दफ्तर में गए तो क्या देखा कि रजिस्ट्रर में हाजरी लगी हुई थी। यह देखते ही उनकी आंखों में आन्सु आ गये। वो जान गये कि यह हाजरी तो स्वयं गुरुदेव महाराज मंगतराम जी ने ही आकर लगाई है। इस घटना से सरदार जी का सत पुरूष के चरणों में विश्वास और दृढ़ हो गया और फैसला कर लिया कि गुरू देव के चरणों में कुछ दिन जाकर रहूंगा। उसी वक्त पन्दरा दिन की छुट्टी ले ली। जब उन्होंने घर जाकर माता जी को बताया तो वे कहने लगी “यह सब गुरु कृपा है।” तब सरदार जी ने कहा कि अब इस से ज्यादा पूर्ण गुरु कहीं किसी कोने में ना मिलेगा, मैंने पन्द्रह दिन की छुट्टी ले ली है और अब महाराज जी की सेवा में जा कर रहूंगा। दोनों पति-पत्नी उसी वक्त फिर अम्बाला पहुंचे और गुरु चरणों में बैठकर सतसंग के परवचनों का लाभ प्राप्त करने लगे।

गुरुदेव का आदेश

“जब तक पंछी पिंजरे से नहीं निकलता, भोजन नहीं छोड़ना”

गुरुदेव महाराज मंगतराम जी नवम्बर 1953 में अम्बाला शहर में विराजमान थे। रोजाना शाम को सतसंग होता था। एक दिन सतसंग में संगत जुड़ी हुई थी, माता जैय कौर भी अपनी चन्द बहनों के साथ सतसंग में मौजूद थी। गुरुदेव के परवचन चल रहे थे।
श्री महाराज जी ने फरमाया : प्रेमियों। सिमरन तभी ठीक ढंग से हो सकता है, अगर आप थोड़ी भूख रख कर भोजन करोगे। अगर पेट भर कर भोजन कर लिया तो आलस, निन्द्रा आ घेरेगी, फिर सिमरन ना हो सकेगा, यह वचन सुन कर माता जी ने मन में सोच लिया कि मैं एक रोटी सुबह और एक रोटी रात (शाम) को ही ग्रहण किया करूंगी। प्रवचन समाप्त हो गये, आरती के बाद प्रशाद तकसीम हुआ, काफी संगत चली गई, थोड़े प्रेमी और मातायें अभी बैठी थी और माता जैय कौर भी अपनी साथ वाली देवियों के साथ जाने लगी तभी गुरुदेव ने भगत बनारसी दास को कहा, कि बनारसी ! जाओ! और जो कालका वाली देवी है, उससे कहो कि भोजन छोड़ना नहीं। अगर चार रोटी की भूख है तो तीन रोटी ही खाओ, यानि भूख रख कर ही खाओ। तभी भगत बनारसी दास आवाज़ लगा कर बोले कि ओ कालका वाले माता जी। भक्त जी की आवाज सुन कर माता जी रूक गये। तभी भगत जी पास आकर बोले, कि! क्या प्रण कर आयी हो, माता जी चुप हो गये। थोड़ी देर बाद कहा भक्त जी! मैंने तो कोई प्रण नहीं किया, तभी बनारसी दास बोले कि, भोजन छोड़ आयी हो? महाराज जी ने कहा है, “कि जब तक पंछी पिंजरे में से नहीं निकल जाता, तब तक भोजन छोड़ना नहीं, भूख रखकर खाना है। भोजन से खून बनेगा, तभी तो आप सिमरन में ज्यादा समय दे सकोगी। जब यह पंछी पिंजरे से निकल गया, तब उसकी मर्जी खाय ना खाये।” इससे पहले भोजन नहीं छोड़ना।
माता जी का कहना था कि भक्त जी की बात सुन कर वे हैरान रह गई। तब यह विश्वास हो गया कि घट-घट की जानने वाले महाराज जी ने मेरे घट की जानकर ही शिक्षा दी है।

जब गुरुदेव ने अशुद्ध कमाई का प्रशाद ग्रहण नहीं किया

एक बार माता जैय कौर जी सतसंग में जाने लगे तो अपने पति देव से कहा कि प्रशाद के लिए पैसे दे दो, उन्होनें पैसे दे दिये और माता जी ने अंगूर का प्रशाद ले लिया और जाकर जहां महाराज जी बैठे थे पिछली तरफ एक जगह रख दिया, वास्तव में उन का भाव यह था कि श्री महाराज जी इस प्रशाद को खुद (स्वयं) ग्रहण करें, हालांकि वोह जानतीं थीं कि गुरुदेव कुछ ग्रहण नहीं करते थे। अर्न्तयामी गुरुदेव ने माता जी के भाव को भांप लिया और भक्त बनारसी दास को आदेश दिया कि बनारसी! यह जो अंगूर पड़े हैं संगत में बांट दो, उन्होंने खुद वोह प्रशाद ग्रहण नहीं किया।
माता जी ये सोचा कि गुरुदेव ने प्रशाद ग्रहण नहीं किया नाजाने सरदार जी ने कैसे पैसे दिये, अच्छा एक बार फिर कोशिश करके प्रशाद लाऊँगी। ऐसा निश्चय कर लिया। घर वापिस जाकर आस पड़ोस की औरतों को कहा कि आप मुझसे कपड़ों की सिलाई कराया करें। मैं सिलाई बाजार से महंगी नहीं लगाऊँगी। अब अपनी मेहनत की कमाई से कुछ रूपये जमा किये और एक दिन उन पैसों से अंगूर का प्रशाद लिया और गुरु चरणों में सतसंग के समय से कुछ पेहले जा पहुंची और पहले की तरह पिछली तरफ रख दिया।
थोड़ी ही देर गुजरी थी कि गुरुदेव ने भक्त बनारसी दास से फ़रमाया कि यह अंगूर का प्रशाद पड़ा है धोकर दो तीन दाने इन को दे दो और बाकी का प्रशाद संगत में बाँट दो। अन्तर्यामी गुरुदेव ने माता जी की अन्तर भावना को जान लिया था, उनको प्रसन्न करने के लिये दो तीन अंगूर खा लिये।
यह थी सत पुरुष की अपार कृपा अपनी भगतनी की शुद्ध भावना के प्रति।

शिवजी की जटा से गंगा

एक बार जब संगत गुरुचरणों में बैठी थी तो श्री महाराज जी लघुशंका के लिए बाहर जंगल में गये, जब वापिस आये तो भक्त बनारसी दास जी ने महाराज जी के हाथों पर पानी डाल कर धुलवाये मगर महाराज जी ने कुल्ला अपने अन्दर से ही किया यानि इसके लिये पानी भगत जी से नहीं लिया। माता जी यह सब देख रहे थे। उनके मन में विचार आया कि महाराज जी ने कुल्ले के लिए पानी भगत जी से क्यों नहीं लिया और अपने अन्दर से ही पानी का कुल्ला किया। इस का भेद समझ नहीं आया। परन्तु सतपुरुष ने उनके संकल्पों को भांप लिया और फौरन उसकी नवृती करते हुए फरमाया, देवी ! तुसा नूं संशा हो गया है कि महाराज जी ने कुल्ला अपने अन्दर से ही किया है? देवी जी! अगर शिव की जटा से गंगा निकल सकती है तो क्या इनके अन्दर जो पानी के झरने लगे हैं, उन से पानी नहीं मिल सकता। हे देवी! जब तुम इस अवस्था तक पहुंचोगी तो तुम्हें खुद बखुद इस भेद का पता लग जायेगा।

गुरुदेव की आशीर्वाद से दुख दूर

एक बार माता जी की बेटी सतनाम कौर बड़ी सख्त बिमार हो गई। लम्बी बिमारी की वजह से शरीर सारा सूख गया, बहुत इलाज किया मगर आराम ना आया, बल्कि दिन ब दिन तकलीफ बढ़ती गई। सब रिशतेदार बिमारी से तंग आ गये थे। लड़की की उम्र (आयु) केवल ढाई बरस थी। जिससे माता जी के सिमरन, भजन में भी रूकावट पैदा हो गई। आखिर माता जी उसे जगाधरी आश्रम में ले गई, जहां उन दिनों गुरुदेव विराजमान थे। गुरुदेव अपनी कुटिया में बैठे थे, माता जी जाकर चरणों में नमस्कार कर के बैठ गई और प्रार्थना की:
महाराज जी। इस लड़की की बिमारी ने सब को तंग कर रखा है। इसका शरीर बिलकुल सूख गया है (सूखे की बिमारी से) आप कृपा करके इसे आर करो या पार करो। बिल्कुल सूख गई है।
गुरुदेव ने अपना हाथ उठा कर बेटी की कमर पर रखकर आशीर्वाद दिया और फरमाया देवी, आगे से इसके लिए ऐसा मत सोचना, इसी लड़की ने तो आप की सेवा करनी है। आप के पीछे इस को संगत की सेवा करने का मौका मिलेगा।
ईलाज : देवी । आप नयाज़बो (एक जड़ी) के पते को हाथ में लेकर दोनों हाथों से मसल कर जो पानी निकले वो इस को दोनों वक्त यानि सुबह व शाम पिलायें, यह ठीक हो जावेगी। कुछ अर्सा तक यह ईलाज किया गया और गुरुदेव की कृपा से लड़‌की बिल्कुल ठीक हो गई।
नोट : 1994 में माता जैय कौर के पर लोक सिधारने के पश्चात यही बेटी बीबी सत नाम कौर लगातार माता जी द्वारा बनवाये गये समता योग आश्रम , गली नं. 2 गुरबरक्श कालोनी, पटियाला में सतसंग करती रही और हर वर्ष सालाना सम्मेलन भी करती रहीं जो आज भी संगत द्वारा जारी है। इनकी सुपुत्री श्रीमती हरजीत कौर जी हर वर्ष समता वार्षिक सम्मेलन (पटियाला एवं चंडीगढ़) में भाग लेने का भरपूर प्रयास करती हैं। यह था गुरु देव की कृपालता और आशीर्वाद का परिणाम।

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है। उपरोक्त लेख की अधिकांश जानकारी समता साहित्यसे ली गयी है
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

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