तुम बिन और नहीं भरवासा : महन्त रतन दास जी

Profile Image

प्रेमी महन्त रतन दास जी

पुण्य तिथि : 17 जून 1991

कहा जाता है कि एक पूर्ण गुरु की नज़र हमेशा अपने शिष्य पर होती है चाहे शिष्य कईं मील दूर ही क्यों न हो , और जब शिष्य इस सम्बन्ध के काबिल हो जाता है तो गुरु स्वयं प्रकट हो जाते हैं। लेकिन क्या वास्तव में गुरु स्वयं अपने शिष्य को खोजता है? क्या एक जिज्ञासु की आत्मिक पुकार इतनी प्रबल हो सकती है कि उसे सुनने के लिए वह परम तत्व में लीन संत स्वयं जगत में प्रकट हो जाए? जब एक शिष्य संसार की सारी राहें आज़मा कर, अपने भीतर सत्य की पुकार में बैठा होता है — तब क्या गुरु उसके सभी प्रश्नों के उत्तर लेकर, उसकी आत्मा के अंधकार को चीरते हुए आता है?

आज के इस लेख में हम ऐसे ही एक विशेष प्रेमी महन्त रतन दास जी का प्रसंग पढ़ेंगे, जिससे ऊपर दिए गए हमारे सभी प्रश्नो का उत्तर हमें मिलते हैं , यह प्रसंग पुस्तक यादगार पल में भी दर्ज किया जा चूका है।

सन् 1929 की बात है। भादों का महीना था। गुरुदेव रावलपिंडी में पधारे हुए थे। उन ही दिनों सत् के जिज्ञासु श्री रतन दास जी, जो कि अहमदाबाद की कबीर गद्दी के महंत थे, किसी पूर्ण गुरु की तलाश में देश के कोने-कोने में फिरते हुए तथा मशहूर तीर्थों जैसे कि रामेश्वरम्, ऋषिकेश, बद्रीनारायण आदि का भ्रमण करते हुए पंजाब की तरफ़ पहुंच गए। वे कहीं भी कोई पूर्ण सन्त न मिलने के कारण काफी निराश थे। इसी हालत में रावलपिंडी शहर से कुछ दूर लई नदी के किनारे पहुँचे। एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए यह विचार मन में चल रहे थे कि क्या वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, व्यास जैसे ऋषियों को पैदा करने वाली यह भूमि सत्पुरुषों से खाली हो चुकी है ? अब ऐसी हस्ती नजर नहीं आती जो मन के अन्धकार को दूर कर सके?
श्री महाराज जी एकान्तवास के लिए लई नदी की ओर निकल जाया करते थे। एक दिन उन्होंने एक साधू को पेड़ के नीचे बैठे हुए देखा। गुरुदेव उनके पास जाकर खड़े हो गए। उस समय वे लिखने में व्यस्त थे, इसलिए गुरुदेव के आवगमन का उनको आभास नहीं हो सका। यह साधू कोई और नहीं बल्कि रतनदास जी ही थे। श्री महाराज जी अचानक बोलने लगे, “महाराज! मन की कल्पना नित ही भटकाती रहती है। समझ में नहीं आता क्या करूँ। क्या ऋषियों-मुनियों की यह भूमि सत्पुरुषों से खाली हो चुकी है? क्या मन की अज्ञानता के अन्धकार को दूर करने वाला कोई नहीं रहा?”
महन्त रतन दास जी को जब यह शब्द सुनाई पड़े तो सामने सफेद खद्दर के कपड़ों में एक दुबले-पतले पुरुष को खड़े पाया। मन में सोचने लगे कि यह संशय तो मेरे मन के ही हैं। यह कोई साधारण पुरुष नहीं हो सकते। महन्त जी ने तुरन्त उठकर एक कपड़ा बिछाकर श्री महाराज जी से बैठने का आग्रह किया। बैठने के पश्चात् महन्त जी ने कहा, ‘महाराज जी! आपने जो प्रश्न किए हैं वह तो मेरे ही मन की शंकाएं हैं। इसलिए मेरा मन कह रहा है कि आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकते। कृपया मेरी परीक्षा न लीजिए। दास तो समझा था कि यह धरती सत्पुरुषों से खाली हो चुकी है, परन्तु आपके दर्शन से दिल को तसल्ली मिली है। आप सत्पुरुष दिखाई देते हैं।’
बातचीत के पश्चात् श्री महाराज जी के मुखारबिंद से वाणी का प्रवाह प्रारम्भ हो गया। वाणी सुनकर महन्त जी को ऐसा लगा मानो कबीर साहब स्वयं साखी सुना रहे हों। उन्होंने वहीं श्री महाराज जी से दीक्षा के लिए प्रार्थना की। गुरुदेव ने कृपा करके उनकी प्रार्थना स्वीकार की। उनको वहीं पर दीक्षित किया गया। इस प्रकार महन्त रतन दास जी को श्री महाराज जी का प्रथम शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दीक्षा के पश्चात् महन्त जी ने गुरुदेव के चरणों में रहने के लिए प्रार्थना की, परन्तु श्री महाराज जी ने कहा कि अभी यह किसी को साथ नहीं ले जा सकते। फिर उन्होंने गुरुदेव से अहमदाबाद साथ चलने के लिए प्रार्थना की, परन्तु श्री महाराज जी ने साथ चलने के लिए भी मना कर दिया। इसके पश्चात् महन्त जी की प्रार्थना पर गुरुदेव ने गंगोठियाँ का पता बताकर सात दिन बाद आने की आज्ञा दे दी।


दीक्षा मिलने के पश्चात् श्री महाराज जी की कृपा से महन्त जी पर चार-पाँच दिन तक मस्ती सी छाई रही। परन्तु धीरे-धीरे वह मस्ती समाप्त हो गयी। नाम-जप के पश्चात् भी वह मस्ती वापस नहीं लौटी। बड़ी बेचैनी से प्रतीक्षा के सात दिन पूरे हुए। गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज थी। सफ़र भी काफी लम्बा था, परन्तु शाँति प्राप्ति की इच्छा लिए हुए गंगोठियाँ के लिए चल पड़े। काफी यात्रा आपको पैदल भी तय करनी पड़ी। गंगोठियाँ पहुँचने पर आपको पता चला कि गुरुदेव जंगल की तरफ़ गए हुए हैं। महन्त जी गाँव के बाहर ही एक पेड़ के नीचे प्रतीक्षा में बैठ गए। तेज गर्मी में पैदल चलने के कारण प्यास लगी हुई थी, परन्तु फिर भी किसी से पानी तक नहीं माँगा। जब श्री महाराज जी जंगल से वापस लौटे तो महन्त जी को वहाँ प्रतीक्षा करते पाया उनकी श्रद्धा और तड़प को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और प्रेम पूर्वक उनको अपने साथ घर ले गए। वहाँ पहले उनको जलपान करवाया, फिर भोजन करवाया गया।
गंगोठियाँ में महन्त जी ने श्री महाराज जी से अनेक प्रश्न पूछकर अपने संशयों की निवृत्ति की। उनके प्रश्नों के उत्तर के रूप में वाणी का भी प्रवाह चलता रहा। उनकी सारी बौद्धिक शंकाओं का निवारण हो गया। अन्त में उन्होंने श्री महाराज जी से अपनी खोई हुई मस्ती को पुनः प्राप्त करवाने के लिए प्रार्थना की, परन्तु श्री महाराज जी ने कहा कि प्रेमी! प्रभु आज्ञा से जो कृपा होनी थी वह हो चुकी, अब स्वयं मेहनत करके उस मौज को प्राप्त करने की कोशिश करो। इन्हें हर समय हृदय में देखें और आशीर्वाद नित अंगसंग जानें। ये शब्द सुनकर महन्त जी ने जेब से घड़ी निकालकर श्री महाराज जी से गुरु-दक्षिणा के रूप में उसको स्वीकार करने के लिए प्रार्थना की। परन्तु श्री महाराज जी ने कहा कि तुम्हारी सत्श्रद्धा ही गुरु-दक्षिणा है। यह घड़ी तुम्हारे काम आएगी। आशीर्वाद पाकर महन्त जी वापस अहमदाबाद लौट गए।
अक्टूबर 1938 के वार्षिक सम्मेलन के पश्चात् अहमदाबाद आने के लिए महन्त जी ने पत्र द्वारा गुरुदेव से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना स्वीकार करके आप सम्मेलन के पश्चात् माघ माह में अहमदाबाद पहुँच गए। कुछ दिन आप महन्त जी के साथ कबीर मन्दिर में ही रहे। उसके पश्चात् महन्त जी श्री महाराज की इच्छानुसार शहर से 3-4 मील दूर एकान्त स्थान में उनके रहने का प्रबन्ध कर दिया। महन्त जी स्वयं ही गुरु चरणों में साथ रहकर उनकी सेवा करते रहे। यहीं पर ‘चिरंजीव गोष्ठ’ और ‘योग चिंतामणि’ नामक वाणी प्रकट हुई जिसको महन्त जी ने स्वयं लिपिबद्ध किया। अब यह वाणी ग्रन्थ श्री समता प्रकाश में उपलब्ध है। फरवरी 1939 में गुरुदेव वापस पंजाब पहुँच गए।

महन्त रतन दास जी की पुकार इतनी गहन थी कि स्वयं गुरुदेव को प्रभु आज्ञा से गुप्त रूप में प्रकट होना पड़ा। वर्षों की यत्न, यात्रा और पीड़ा के बाद, जब हर ओर छल, कपट और विश्वासघात ही मिला — तब लई नदी के किनारे एक वृक्ष की छाया में, गुरुदेव ने उनके जन्मों की प्यास बुझाने की व्यवस्था कर दी। ऐसे अधिकारी शिष्य महंत रतन दस जी का नाम ग्रन्थ श्री समता प्रकाश में भी आया है , जो कि इस प्रकार है :

अहमदाबाद नगर के भीतर, सन्त रतनदास अधिकारी।
शुद्ध आचार विचार चित राखे, और शरधा अपारी ॥
आज्ञा पुरख अगाध से, गुपत ज्ञान अरथाई।
ब्रह्म योग की खिनता, दास ‘मंगत’ तिसे पहनाई ॥ 275

महंत जी की भक्ति और प्रभु मिलन की तिव्र तड़प ही वह माध्यम बनी, जिसके कारण गुप्त रूप से विचरण कर रहे गुरुदेव को प्रभु की आज्ञा से जगत कल्याण हेतु प्रकट होना पड़ा। ऐसे गुरुभक्त प्रेमियों के प्रसंग सभी जिज्ञासुओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने में सहायक हैं।

ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Note:
उपरोक्त लेख में दास से अवश्य ही गलतियां हो गयी होंगी जिसके लिए दास क्षमा प्रार्थी है और सुझावों का स्वागत करता है।
ॐ ब्रह्म सत्यम सर्वाधार

Leave a comment



3+4 :

address icon

संगत समतावाद धर्मशाला – हरिद्वार
हिमालय डिपो, गली न.1, श्रवण नाथ नगर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)