श्री सत् गुरुदेव जी महाराज आशीर्वाद फरमाते हैं, आप स्वीकार करें जी और घर में सब परिवार को आशीर्वाद फरमावें। आपके प्रेम से तहरीर कर्दा (लिखा हुआ) पत्र द्वारा दर्शन हुऐ। आपने जो संशय लिखा है उसके जवाब में श्री मुख वाक् सेवा में लिखे जा रहे हैं। प्रेम पूर्वक बारम्बार विचार करके कृतार्थ होवें। श्री महाराज जी फरमाते हैं:-
“कि अहंकार की अधिक दृढ़ता से आम मनुष्य अपना जीवन कर्तव्य केवल भोगमयी बनाकर अति भयानक स्वार्थ की अग्नि में जल रहे हैं और तमाम दुनियाँ में जो परेशानी छाई हुई हैं वह महज़ अहंकार की अधिकता का ही कारण है। इस वास्ते इस अधिक तपिश से बचने का उपाय केवल सत् परायणता की दृढ़ता ही है यानी अपना जीवन प्रकाश जो परम तत्व परमेश्वर है उसका आधार और निर्मल विश्वास धारण करके इस नाशवान् शरीर के मद को त्यागकर केवल अपने जीवन को सत् कर्त्तव्याचारी बनाना और सादगी, सत्य, सेवा, सत्संग, सत् सिमरन आदि सत् नियमों को पूर्ण निश्चय से पालन करने का सत् यत्न धारण करना। ऐसे शुद्ध प्रयत्न से ही बुद्धि निर्मल होकर तमाम मलीन वासनाओं पर विजय पाकर सत् शान्ति को प्राप्त हो सकती है। सब प्रेमी इस निर्मल विचार को विचार करके अपनी जीवन उन्नति के मार्ग में दृढ़ होने का यत्न करें। तब ही अधिक स्वार्थ की अग्नि से ठन्डक प्राप्त करके अपना जीवन केवल सत् परायणता में दृढ़ करते हुए सही उन्नति परम शान्ति को प्राप्त कर सकेंगे। ईश्वर सत् अनुराग देवे।”
श्री महाराज जी दुबारा आशीर्वाद फरमाते हैं, स्वीकार करें। गाहे वगाहे (कभी-कभी) कुशल पत्र द्वारा दर्शन देते रहा करें। श्री महाराज जी की दया दृष्टि नित अंग संग जानें। ईश्वर अधिक सत् श्रद्धा और निर्मल भक्ति की दृढ़ता वख्शें। ईश्वर नित सहायक होवें।