Parmarth Par Agrasar Hone Ki Prerna(परमार्थ पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा)

स्वार्थ और परमार्थ दो रास्ते हैं। एक बन्धनकारी है और एक कल्याणकारी है।
अगर स्वार्थ में ज़्यादा (अधिक) समां खर्च करे ख्वाहे (चाहे) अपनी मरजी से ख्वाहे किसी की मजबूरी से, सो इसका इलाज क्या हो सकता है, सिवाय अपनी बदकिसमती के? यह तो तमाम संसार की उलझनों से बड़ी शूरवीरता से कुछ आज़ादी हासिल करके परमार्थ की तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है। ऐसे दलीलों से समां व्यतीत करके अन्त को पछताना ही पड़ता है। अपने हालात को खुद समझें। वक्त निकालकर परमार्थ की तरफ जल्दी जल्दी कदम उठाना चाहिये ताकि जीवन यात्रा में कुछ कल्याण प्राप्त हो सके। ईश्वर सत् अनुराग देवे।

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संगत समतावाद धर्मशाला – हरिद्वार
हिमालय डिपो, गली न.1, श्रवण नाथ नगर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)