यह जीवन का संग्राम अधिक कठिन है। यह जानते हुए भी अपनी कल्याण के यत्न में कायरता धारण करके समाँ निरर्थक हर एक गुणी खो देता है। और अन्त को अधिक पश्चाताप करता है। मगर उस वक्त कुछ बन नहीं सकता है। इस वास्ते अपने जीवन उन्नति के भाव को अधिक प्रतीत करते हुए निहायत स्वतन्त्र बुद्धि धारण करके कल्याण के मार्ग में पूर्ण निश्चय से दृढ़ होना चाहिये, ताकि तमाम यत्न प्रयत्न कल्याण के निमित्त ही धारण करके इस शरीर की विनाश से पहले-पहले निर्भय शान्ति में निःचलता प्राप्त हो जावे। ऐसा परम पवित्र निश्चय ही तमाम सत्पुरुषों का हुआ है। सो प्रेमी जी, केवल विचारों की धारा में अपने आपको गृमगीन करना (लगाए रखना) कोई यथार्थ उन्नति के देने वाला निश्चय नहीं है। इससे समाँ अकार्थ व्यतीत हो जाता है। आखिर वैसे का वैसा ही मूढ़पना अन्तर में बना रहता है। ऐसी मजबूरी के निश्चय से जाग्रत हो करके परमानन्द सत्य स्वरूप के अनुभव करने का यथार्थ यत्न इखत्यार (धारण) करना चाहिये जिससे महालाभ प्राप्त होवे।
इस संसार को यात्रा शरीर के अन्त होने से पहले-पहले संपूर्ण हो जावे, क्योंकि मन इन्द्रियों की चेष्टायें अधिक संकट रूप हैं। और किसी वक्त भी हो सकता है कि सत्य विचारों को नष्ट करके विपरीत भावनाओं को प्रगट कर देखें, और तमाम जीवन यात्रा की सफलता नष्ट हो जावे। इस वास्ते अधिक से अधिक सत्य यत्न द्वारा सत्य मार्ग में अपने आपको दृढ़ करके यथार्थ अध्यात्म उन्नति का साधन इख्त्यार (अपनाना) करना चाहिये जिससे मानसिक दोषों की निवृत्ति होनी शुरू हो जावे और पवित्र विश्वास की दृढ़ता प्राप्त होवे। ऐसे सत्य यत्न से तमाम मानसिक खेद नाश को प्राप्त हो जाते हैं और परम सिद्धि को गुणी अनुभव कर लेता है। मन इन्द्रियों की चेष्टाओं से असंग होना ही परम सिद्धि है। सो ऐसी अवस्था यथार्थ दृढ़ विश्वास और यथार्थ मार्ग सत् साधन के प्राप्त होने से ही होती है। महज विचारों से इस मानसिक संग्राम से विजय हासिल करनी अति कठिन है। अगर कोई गुणी अपनी सही उन्नति करना चाहे तो उसके वास्तें लाज़मी है कि किसी कामिल सत्पुरुष की शरणागत होकर के यचार्य यत्न धारण करे। जो परम सफलता के देने वाला होवे। यह ही सार नीति सत्पुरुषों की है। जब तक अपने अन्तर में सत् स्वरूप अविनाशी तत्व का बोध न होवे तब तक मानसिक संसार का अभाव नहीं होता है और न ही परम तृप्ति प्राप्त होती है। जब बुद्धि तमाम मन इन्द्रियों की चेष्टाओं से असंग होकर के एक परमानन्द स्वरूप में अन्तर विखे निहचल होती है तव निर्भय सुख को अनुभव करती है, जो अकथ और अगोचर है। यह ही स्थिति परम बोध, परम सूझ, परम ठौर और परम विज्ञान स्वरूप है, जिसको अनुभव करके वासना रूपी अगन से बुद्धि पूर्ण शान्ति को प्राप्त हो जाती है। वास्तव में इसी परम शान्ति की सबको चाहना है। और यह ही निर्भय सुख निज स्वरूप है। अधिक सत् यत्न द्वारा ऐसी परम स्थिति को प्राप्त होना ही महाकारज है, और सत्पुरुषों का यथार्थ आदर्श है। इस वास्ते इस कल्याणकारी मार्ग में अपने आपको निहचल करें। इस सत् यत्न से ही जीवन का महालाभ परमानन्द शान्ति प्राप्त होती है। अच्छी तरह से विचार कर लेवें। ईश्वर सत् बुद्धि, सत् अनुराग देखे।