श्री सत् गुरुदेव जी महाराज आशीर्वाद फरमाते हैं। आप स्वीकार करें और श्रीमान भाई साहब परमार्थी जी, मलिक भवानी दास जी, सरदार संतसिंह जी, देवी दित्तामल जी, परषोत्तम लाल जी व दीगर (अन्य) सब माताओं बहनों को आशीर्वाद फरमावें। आपके सत्संग समाचार द्वारा आगाही (जानकारी) हुई। उम्मीद है पहला पत्र भी आपको मिल गया होगा। ईश्वर हम सब संगत के प्रमियों को अधिक प्रेम प्रीति सब जीवों के साथ वख्रों ताकि सत् सेवा के साधन द्वारा अपनी सफलता प्राप्त कर सकें। सत प्रण धारण करने द्वारा ही कल्याण होगा जिससे कुटिल भाव दूर होते हैं। सत् असत् के भावों को समझने के वास्ते प्रभु जी निर्मल बुद्धि देवें जी। श्री मुख वाकों को प्रेम पूर्वक विचार करके सत सोझी प्राप्त हो सकती है। श्री महाराज जी फ्रमाते हैं कि सत् परायणता को छोड़कर केवल असत् परायण होना यानी पूर्ण निश्चय से भोगमयी जीवन की ही स्थिति धारण करनी, उसका नतीजा यह ही होता है कि अधिक वासना के जाल को फैलाकर नाना प्रकार के सुख भोग प्राप्त करके भी मानसिक शान्ति प्राप्त नहीं होती जैसा कि आजकल के समय का चक्कर चल रहा है, न राजा को शान्ति है
न प्रजा को । बल्कि दिन व दिन अपने अधिक लालच के फैलाव में आकर तकरीबन (लगभग) हर एक मानुष एक दूसरे का बाधक हो रहा है। ऐसे भयानक समय को विचार करके गुणी पुरुषों का फर्ज है कि अपने मानसिक भाव को सत् परायणता में पूर्ण दृढ़ करने का यत्न करें यानी अपने बढ़े हुए लालच को त्याग करके जीवन धारा की मुनास्बत (मर्यादा) को धारण करें। मन बचन और कर्म द्वारा सब जीवों की कल्याण का निश्चय दृढ़ करें। तब ही सत् भावना की दृढ़ता से मानसिक शान्ति प्राप्त हो सकती है जो कि हर एक जीव की अन्दरूनी चाहना है और ऐसा यत्न ही मानुष जीवन का परम कर्तव्य है।
इस अन्धकार के समय में जबकि चारों तरफ अशान्ति ही अशान्ति है सत्पुरुषों की सत् सिखया (शिक्षा) द्वारा ही धीरज और सन्तोष की प्राप्ति सब जीवों को हो सकती है अगर विचार करके सत् नियम धारण किये जावें। श्री महाराज जी दोबारा आप सब संगत को आशीर्वाद फरमाते हैं, स्वीकार करें जी। ईश्वर नित सहायक होवें जी।