श्री महाराज जी फ्रमाते हैं कि इतने समय नज़दीक रहते हुये फिर तुम बचपन वाले विचार लिखते हैं। प्रेमी जी, गर्ज़ और फर्ज़ के मसले (विषय) को समझें। और फर्ज़ अदायगी में (कर्तव्य परायणता) शूरवीरता धारण करें। यह खाकी जिस्म (नश्वर शरीर) देश और जनता की सेवा के वास्ते समझें और अभ्यास में समय निर्मल प्रेम से दिया करें, तब मानसिक दोष विनाश को प्राप्त होंगे। ईश्वर सत् अनुराग देवे। देहरादून के प्रेमियों को आशीर्वाद कहनी और जो सेवा का कारज शुरू किया है वह अच्छी तरह से सरेअन्जाम (पूर्ण) होता जा रहा होगा। सत्संग के हालात से मुतला (सूचित) करते रहा करें। ग्रन्थ के मुतालिक (बारे में) भी छपवाने का बन्दोबस्त (प्रबन्ध) कर लिया होगा। ईश्वर सत् अनुराग देवे।