आशीर्वाद पहुंचे। पत्र मिला, ईश्वर सत् बुद्धि देवे। तमाम संगत को आशीर्वाद कहनी। ईश्वर सत् उद्धार की शक्ति देवे। प्रभु आज्ञा को दृढ़ निश्चय से अपनायें और खुशी व ग़मी के तवाज़न (सन्तुलन) को बराबर जानें, तब ही ज़िन्दगी के असली भेद को पायेंगे। दीगर (अन्य) जो प्रश्न लिखे हैं उनका तहरीर (लिखित) द्वारा उत्तर नहीं मिल सकता। यह बच्चों का खेल नहीं है। जब कभी हाज़िर दर्शन करें तब मुनासिब (उचित) हालात का विचार कर लेना। तुम अपनी अवस्था के मुताबिक मुतालया (अध्ययन) किया करें। जिन-जिन असूलों से मानसिक शान्ति प्राप्त होती है उनको धारणा में लावें और अपनी उन्नति करें। यह जो सिद्ध अवस्था के शब्द हैं अभी तुम्हारे समझने में नहीं आ सकेंगे। इस वास्ते समां ज्यादा ईश्वर भक्ति और सेवा के असूलों को ग्रहण करने में खर्च करें जिससे सही उन्नति प्राप्त होवे। बार-बार स्वाध्याय में वाणी का गौर करें और फिर अमली जीवन बनायें। तब ही असली सार प्राप्त होवेगी। वाणी का मुतालया इस वक्त तुमको वह ही गुणकारी है जिसमें वैराग, भक्ति, सेवा, सत् विश्वास और उच्च आचरण का प्रसंग आया होवे। जिससे तुम खुद समझकर अपने आपके बोधक हो सकें। निहायत प्रयत्न करते हुए अपनी ख्वाहिशों का दमन करें और प्रभु विश्वासी होकर प्रभु इच्छा को मन में दृढ़ करें। तब ही इस भयानक अन्धकार कर्मजाल से मुखलसी (छुटकारा) हासिल करके सत् आनन्द आत्मा को अनुभव कर सकोगे। ईश्वर नित ही गुरु-वचन विश्वास और सत् परायणता बख्शें ताकि अपनी सही उन्नति कर सकें। तमाम प्रेमियों को दुबारा आशीर्वाद कहनी। ईश्वर सत् अनुराग देवे।