आशीर्वाद पहुंचे, पत्र मिला। आगे प्रेमी जी पत्र लिखा गया है। तुम अपनी सत श्रद्धा द्वारा हर वक्त हमको हृदय में रखें। नित ही जीवन आला (श्रेष्ठ) पवित्र बनावें। यह संसार बड़ा कठिन है। अन्तर हृदय से प्रभु परायण होकर अपना जीवन निहायत शुद्ध स्वरूप वाला बनावें। अविनाशी परमेश्वर का अनुभव करने का मकसद (उद्देश्य) है। मगर शारीरिक विकारों में भूलकर हर एक जीव दुःखी हो रहा है। अब प्रेमी जी, अपनी जिन्दगी के सही कर्त्तव्य को पालन करने का पुरुषार्थ करें, यानी मानसिक शान्ति की प्राप्ति करें। नित्य ही मन में नाम स्मरण का भाव बनाये रखें। तमाम विकारों से अपने आपको पवित्र करें और नित ही सत्पुरुषों के जीवन आदर्श को विचार करते हुये अपनी कल्याण करें। यह ही गुरु का आशीर्वाद है, प्रभु सहायक होवें। अपनी कुशल पत्रका लिखते रहा करें। अधिक तुम्हारी ज़िन्दगी प्रेममयी, धर्ममयी और कल्याण स्वरूप वाली चाहते हैं। प्रभु नित ही तुमको सत् आचरण प्रबलता देवें। हर वक्त हमको हृदय में देखें। ऐसे ज़िन्दगी बनाओ जो सर्वानन्द स्वरूप होवे। प्रभु सत् परतीत देवें।