पत्र मिला, ईश्वर सत् श्रद्धा देवें। प्रेमीजी, जो कुछ होना है वह होकर ही रहेगा। इस वास्ते प्रभु इच्छा में निश्चित रहना चाहिए। और जो हालात पूछा है उसके मुतालिक (बारे में) तुम खुद मुनासिब (उचित) विचार कर लेवें। अगर माता जी का हुक्म है और दुनियावी मजबूरियाँ तुमको मजबूर कर रही हैं तो फिर इनकारी (मना) करना मुनासिब नहीं है। हाँ, अगर अपनी ज़िन्दगी को असली मार्ग की तरफ ले जाना चाहो तो फिर आज़ादी की ज़रूरत है, मगर संसारी पाबन्दियाँ तुमको इस तरफ रागिब (बढ़ने में) होने में मुश्किलात पेश करेंगी। और न ही तुम्हारा इतना प्रबल निश्चय है। वक्त गुज़ार देने के बाद अगर फिर पछताना हो तो माता जी के हुक्म को तस्लीम (स्वीकार) कर लेना। प्रेमी जी, यह तुम्हारे मन का जज़बा (भाव) है, ख्वाहे (चाहे) जो भी बात करो हमारी तरफ से तुमको आज़ादी है। जो मुनासिब होवे वह विचार कर लेवें। ईश्वर बुद्धि देवे। प्रेमी जी, गृहस्थ में रहकर भी धर्म की पालना हो सकती है अगर विश्वास दृढ़ होवे तो। वैसे जो मन का संकल्प है वैसा करो। अगर तुम आज़ाद रहना चाहो तो बहुत बेहतर है। मगर तमाम तकलीफों का मुकाबला करना पड़ेगा। अगर ऐसी जुर्रत (साहस) है तो अपने बल पर खड़े रहो। नहीं तो माता का हुक्म तसलीम कर लो। ईश्वर प्रेम भावना देवे। तमाम संगत को आशीर्वाद कहनी।