आशीर्वाद पहुंचे, पत्र मिला। ईश्वर सत् विश्वास देवें। तमाम प्रेमी, जो उस जगह मौजूद हों, आशीर्वाद कहनी। सबको बाजय (सूचित) होवे कि इस भयानक समय में, जो चारों तरफ आग प्रचण्ड हो रही है, उस एक प्रभु का ही भरोसा रखें। पहले भी उसकी कृपा से जीवन व्यतीत हुआ और आगे भी वह कल्याण का सबब (साधन) बनावेंगे। अपना विश्वास पूर्ण होना चाहिए। देखो प्रभु आज्ञा से कुछ राजनीति की इसलाह (सुधार) हो जावे तो तमाम मुल्क में शान्ति हो जावेगी। फिर उन्नति का भी कोई न कोई सबब बन जाता है। उस दीनदयाल की कृपा संजुगत (साथ) रहना चाहिये। जिसने उजाड़ा है वह ही आबाद भी करेगा।
मानुष की कोई शक्ति नहीं है। वह ही परम पिता सबको शाति देने वाला और नेकी वदी की रहनुमाई (मार्गदर्शन) करने वाला है। इस वास्ते उसकी दयालता से सब कुछ बेहतर हो सकता है। जमाने के चक्कर से बड़े-बड़े धीरजवान घबरा जाते हैं। फिर भी बस किसी का नहीं चलता है। समय खुदबखुद ही जब प्रभु इच्छा से पलटा खाता है तो सुख के भी सब सामान पैदा हो जाते हैं। तमाम प्रेमियों को धर्मवान् होना चाहिये। बड़े-बड़े क्लेश दुनियाँ में महापुरुषों को भी उठाने पड़े हैं तो और जीवों की क्या दशा हो सकती है। सिर्फ प्रभु की तरफ से किसी का इम्तहान (परीक्षा) होवे ही नहीं। नहीं तो दुनियाँ एक बड़ा अज़ाब (दुःख) और घोर नर्क है। फकीर लोगों की क्या राय हो सकती है। ऐसे चक्कर में मासवाए (सिवाय) धीरज और धर्म के मुसीबत के दिन काटने बहुत मुश्किल होते हैं। हर वक्त प्रभु का भरोसा रखें और राजनीतिक चाल को देखें। प्रभु शायद अपनी कृपा से कृपा ही कर देखें। वैसे जीवों के अमल और कर्म तो शायद इस काबिल न ही होवें जो शान्ति को दुबारा प्रगट कर सकें। ईश्वर भरोसा रखें। तमाम लोगों के साथ यह विपदा बनी है। पहले भी प्रभु आज्ञा से सब कुछ दुनियाँ का चक्कर देखा और आगे भी उसकी आज्ञानुसार ही देखेंगे। इस वास्ते दृढ़ विश्वास होना चाहिये। तमाम प्रेमियों को दुबारा आशीर्वाद कहनी। सब हालात फकीरों को रोशन हैं मगर चाला (वश) कुछ नहीं है। प्रभु की ही कृपा होनी चाहिए। जब जीवन में पहले ही प्रभु की लीला को विचार करके जो अपने आपको मुसाफिर समझकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनका सच्चा उपदेश यही है कि दुःख को बर्दाश्त करें और संसारी सुखों का मोह त्याग करें। अपना जीवन प्रभु परायण बनावें और मरने से पहले मौत को कबूल करके असली ज़िन्दगी को हासिल कर लेवें। यह ही मानुष जन्म का धर्म है। इसके उलट जो सुख की रचना यह जीव रचता है वह अक्सर नाश हो जाती है। तो फिर पछताना पड़ता है। इस वास्ते पहले ही दुःख और सुख को प्रभु की आज्ञा समझकर नित्य ही निष्काम कर्म को धारण करना चाहिये जिससे जीवन निर्भय हो जावे और परम पद प्राप्त होवे। ईश्वर परमार्थ बुद्धि देवे और सत् सन्तोष प्राप्त होवे। अपनी कुशल पत्रका लिखते रहा करें। ईश्वर संकट नाश करें अपनी कृपा दृष्टि से।