पुण्य तिथि : 15 जनवरी 1987
पूरा गुरु पूरा सिख, जग को जीवन देत ।
‘मंगत’ तिनके चरन की, धूड़ी सीस रमीत ॥
फकीरों का साथ और उनकी सेवा अत ही भाग्य का विषय है। जो बुद्ध के साथ रहने का भाग्य आनंद को प्राप्त हुआ नानक जी के साथ रहने का भाग्य मर्दाना को प्राप्त हुआ ठीक उसी क्रम में सत्पुरुष महात्मा मंगतराम जी के साथ रहने और सेवा करने का भाग्य भगत बनारसी दास जी को प्राप्त हुआ। श्री बनारसी दास जी का जन्म सन् 1916 ईस्वी में ज़िला रावलपिंडी (आजकल पाकिस्तान) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री नत्थूमल खन्ना और माता का नाम श्री मति गुरदेवी था। छोटी आयु में ही आपके पिताजी परलोक सिधार गये थे और इन का पालन-पोषण माता और बड़े भाई की देख-रेख में हुआ।
मास सन 1938 ज्येष्ठ मास , जब सदगुरुदेव ने जलमादा में तप किया और बनारसी दास जी को सदगुरुदेव के बारे में जब पता चला तो वह अपने मित्र ठाकुर दीवान सिंह के साथ महाराज जी के दर्शन के लिए जा पहुंचे ,लगभग डेढ़ मील चढ़ाई चढ़ने के बाद महाराज जी की कुटिया में पहुंचे और गुरुदेव को समाधि मग्न देखा।
उसके पश्चात प्रश्न उत्तर हुए और गुरु दरबार आना-जाना प्रारंभ हुआ।
गुरु के प्रति आकर्षण भी गुरु कृपा ही है और यकीनन बनारसी दास जी अपने समर्पण और पूर्व कर्मों के प्रभाव से इस कृपा के पात्र बने।
सतगुरु देव ने बहुत मना किया कि अपनी दुकान देखो, फकीरों के संग मत लगो लेकिन बनारसी दास जी को गुरुदेव के प्रति ऐसा तीव्र आकर्षण हुआ कि उन्होंने अपना हाथ गुरुदेव को थमा दिया,लेकिन जब भी गुरु अपने शिष्य का हाथ थामता है इसका मतलब गुरु हर परिस्थिति में आपका हाथ थामे रखता है सही मायनों में शिष्य गुरु को हाथ थमा कर ही गुरु कृपा का पात्र बनता है।
पहली बार भगत जी ने प्रार्थना की महाराज जी ! कृपा करके हमको कुछ उपदेश देवें।
गुरूदेव- प्रेमी ! अभी तुम बच्चे हो। अभी तुम्हारी उमर नहीं, समय आएगा, कोई न कोई समझा देगा। हम गुरू नहीं हैं।
दूसरी बार प्रार्थना करने पर फरमाया प्रेमी ! अभी अंधेरा पक्ष चल रहा है जब चानना पक्ष आएगा तब देखा जाएगा।
तीसरी बार प्रार्थना करने पर फरमाया प्रेमी ! तुम्हारी जमानत कौन देगा ?
भगत जी- “महाराज जी ! हमारी जमानत तो आप ही हैं। बिगाड़ो तो आप और संवारों तो आप ।”
गुरूदेव (यह सुन कर) अच्छा, तो कल सुबह बताया जाएगा।
दूसरे दिन जब चरणों में हाजिर हो कर प्रार्थना की, तो फरमाया -“अच्छा प्रेमी, पूर्णमासी वाले दिन सुबह स्नान करके सिर पर पगड़ी रख कर सत् श्रद्धा और विश्वास लेकर आना।”
इस प्रकार जब प्रातः भगत जी चरणों में पहुँचे तो गुरूदेव ने कृपा करके अपने पवित्र चरणों में जगह बख्शी।
एक दिन भगत बनारसी दास ने लंगर में साग की सब्ज़ी बनाई। कभी-कभी इस प्रकार की सब्ज़ी जब बनाई जाती तो गुरूदेव की भेंट पहले करते थे और गुरूदेव एक-दो चमच प्रेमी का मन रखने के लिए ले लेते थे। उस दिन भी भगत जी जब सब्जी लेकर गये तो दायीं और – खड़े-खड़े ही कटोरी गुरूदेव के आगे करके प्रार्थना की कि थोड़ी सी ग्रहण कर लें। परन्तु गुरूदेव को यह भेंट का तरीका अच्छा न लगा। फरमाया :-
“मूर्ख किसी के आगे चीज़ भेंट करने का तरीका भी नहीं आता। यह तेरे क्या लगते हैं। कुछ अक्ल सीखो, यह तेरा तरीका बतलाता है कि तेरे अन्दर गुरू के प्रति कोई इज्जत नहीं, ना ही विश्वास है यह राह गुज़र (रास्ता चलते) तो नहीं बैठे हुए। तेरा हर कदम यह देखते रहते हैं।
भगत जी ने अपनी गलती को स्वीकार किया और सामने की ओर आकर चरणों में बैठ कर साग पेश किया। गुरूदेव ने साग सेवन नहीं किया और फरमाया प्रेमी, गुरमुख के लक्ष्ण पहले पढ़ो ताकि पता लगे कि कैसे फकीरों के पास आना चाहिये। तुम अभी बच्चे नहीं हो जो रोज़ समझाया जावे। गुरमुख को चाहिये कि गुरू की रीस (नकल) न करे। जो गुरू कहे वोह करे। गुरमुखता के बिना तीर्थ, व्रत, जप, तप, सब निष्फल जानो। अब फिर गुरमुख के लक्ष्ण सुन लोः-
अन्त में दया करते हुए दो चमचे साग के ग्रहण कर लिये और भगत जी की गलती को क्षमा करते हुए उनको प्रसन्न कर दिया।
टैकसला से रवाना होने पर जब भगत जी ने बिस्तरा उठाया और रेलवे स्टेशन पर पहुँचे तो गुरूदेव ने देखा कि भगत जी का चेहरा लाल हो रहा है, तो पूछा :-
गुरूदेव :- बनारसी ! मुँह क्यों लाल है ?
भगत जी :- महाराज जी ! बिस्तरा उठाने से लाल हो गया है (गुरूदेव थोड़ी देर खामोश रहे) फिर कहा :-
“बच्चू ! तुझे प्रभु सुमति देवें। भगवान के दरबार में तेरा नाम लिखा गया है, अब चाहे तूं! चूं! कर, चाहे चा! कर। जाना पड़ेगा। फकीरों की सेवा खाली नहीं जाती। दिल में तंगी महसूस न किया कर। खुले दिल से हर हालत में गुजरने की कोशिश करो।
रंग लागत, लागत, लागत है,
भरम भागत, भागत, भागत हैं
भगत जी :- महाराज जी ! दास सेवा के सही स्वरूप का नहीं जानता, और न ही यह समझ सका कि कैसे और किस जगह नाम लिखा गया है।
गुरूदेव ने मौज में आकर अमर वाणी के कुछ शब्द उच्चारण किए। भगत जी शब्द सुनते ही आँखों में आँसू भर लाये।
गुरूदेव, (भगत जी की पीठ पर हाथ फेरते हुए।) प्रेमी ! रोने से काम नहीं बनता। विचार की आँखें खोलो।
एक बार स्नान के पश्चात धूप में खड़े गुरुदेव ने पास पड़े मल को हटाने की आज्ञा भगत जी को दी, पर घृणा के कारण भगत जी टाल गए और कुछ उठाने के लिए ढूंढने लगे। भगत जी की अनुपस्थिति में गुरुदेव ने स्वयं अपने पवित्र हाथों से उसे उठाकर दूर फेंक दिया।
लज्जित भक्त जी को गुरुदेव ने समझाया कि सेवा अच्छी–बुरी नहीं होती, परीक्षा मन की होती है। जहाँ घृणा आए, वहाँ मन बेईमान है—सेवा ही मन की मैल धोती है।
गुरु-वचन पर तत्क्षण पालन और तन–मन–वचन से सेवा ही आत्म-शुद्धि का सच्चा मार्ग है।
एक बार ताजेवाला में गुरुदेव के साथ भगत जी विराजमान थे। भक्त जी बर्तन साफ करने लगे ही थे कि गुरुदेव ने उन्हें भी स्थान देखने का आदेश दिया। आज्ञा मिलते ही वे प्रेमी शेष राज जी के साथ चले गए। स्थान देखकर लौटने में उन्हें काफ़ी समय लग गया।
वापस आकर भक्त जी जब झोंपड़ी में बर्तन साफ करने पहुँचे, तो देखकर हैरान रह गए। बर्तन चमक रहे थे, सलीके से रखे थे और कमरे में पूरी सफ़ाई थी। सुनसान जंगल में यह सेवा किसने की—यह सोचकर वे चकित रह गए। प्रेमी शेष राज जी भी आ गए और दोनों यह देखकर अचंभित हो उठे।
दोनों गुरुदेव के चरणों में पहुँचे। गुरुदेव ने पूछा तो भक्त जी ने निवेदन किया कि बर्तन किसने साफ किए। सतगुरुदेव ने फरमाया—
“प्रेमी! ख़ुदा आया था। सेवा का काम अधूरा छोड़ना ठीक नहीं। जो काम शुरू करो, उसे पूरा करो। अपनी सेवा का अवसर किसी और को मत दो। बिना कहे सेवा करने वाला ही सच्चा गुरमुख होता है।”
अंतर्यामी गुरुदेव भक्त जी की लज्जा भरी मनःस्थिति समझ गए और बोले
“इसे बोझ मत समझो। यूँ जानो जैसे यह सेवा तुमने ही की हो। पश्चाताप करो और आगे के लिए सदा होश में रहो।”
जब-जब भक्त जी का मन घर-परिवार की ओर आकर्षित होता, महाराज जी उन्हें प्रेमपूर्वक समझाते। भक्त जी छुट्टी लेकर चले जाते, तो महाराज जी बाबू जी को उन्हें वापस लाने भेज देते। भक्त जी की साधना के लिए गुरुदेव ने नियम और समय-सारणी तक बनवाई तथा प्रेमी ओम कपूर जी को भी उन्हें समझाने का निर्देश दिया।
शिष्य के प्रति गुरुदेव का प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने भक्त जी के चरण स्पर्श कर यह वचन कहा-
“तुम गुरु हो, हम चेला।”
इन प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि गुरुदेव कितने करुणामय हैं, जिन्हें केवल अपने शिष्य की आत्मिक उन्नति की ही चिंता रहती है।
ऐसे गुरु पर तन-मन वारूँ। राम, तजु गुरु नाहीं विसारूँ॥
यह क्षण गुरुदेव के निर्वाण की तैयारी का था, परंतु गुरुदेव का चित्त स्वयं में नहीं, अपने भक्त की वेदना में रमा हुआ था। भक्त बनारसी दास जी के नेत्रों में छलकते आँसू, उनका काँपता हृदय—गुरुदेव से छिपा नहीं था। गुरुदेव जानते थे कि देह तो छूट रही है, पर यदि भक्त को सेवा से वंचित कर दिया गया, तो उसका जीवन भर का कसक बन जाएगी।
इसी करुणा से प्रेरित होकर गुरुदेव ने जाते-जाते भी सेवा का द्वार खोला—
“ला, चाय-कहवा जो देना चाहता है, दे।”
यह कोई साधारण आग्रह नहीं था; यह भक्त के लिए अंतिम अवसर था—अपने गुरु के चरणों में सेवा अर्पित करने का।
भक्त जी का काँपते हाथों से काढ़ा बनाना, दूध का फट जाना, चीनी की जगह नमक पड़ जाना—ये त्रुटियाँ सेवा की असफलता नहीं थीं, बल्कि भक्ति की तीव्रता और विरह की घबराहट के प्रतीक थे। वहाँ कोई चूक नहीं थी; वहाँ तो हृदय काँप रहा था, आत्मा रो रही थी।
गुरुदेव ने जब तीसरी बार भी काढ़ा ग्रहण नहीं किया, तब भी उन्होंने सेवा को नकारा नहीं। उलटे मुस्कराकर कहा—
“प्रेमी! इन्होंने तो तेरी अंतिम सेवा भी कबूल कर ली थी, लेकिन शरीर तुझसे सेवा करवाकर थक गया है।”
यह वाक्य गुरु-तत्व की पराकाष्ठा है। गुरुदेव ने स्पष्ट कर दिया कि सेवा का मूल्य परिणाम से नहीं, भावना से आँका जाता है। हाथों से बनी वस्तु नहीं, हृदय से निकली भक्ति स्वीकार होती है। भक्त जी की सेवा देह के स्तर पर भले पूरी न हुई हो, पर भाव के स्तर पर वह पूर्ण थी—और इसीलिए “सुर्खरू” थी।
गुरुदेव ने जाते-जाते भक्त जी को यह अमूल्य उपहार दे दिया कि वह जीवन भर यह जान सके—
“तेरी सेवा स्वीकार हुई।”
यही गुरु-कृपा है—जो जाते हुए भी शिष्य को खाली हाथ नहीं जाने देती, बल्कि उसके हृदय को तृप्त कर देती है।
निर्वाण समाधि से पूर्व दिया गया यह आशीर्वाद, भक्त जी के लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवन भर की साधना बन गया। गुरुदेव ने देह त्याग दी, पर अपने भक्त को सेवा की स्वीकृति देकर अमर कर दिया।
जिसने अपना जीवन सत्पुरूषों अथवा सत् मार्ग में समर्पित कर दिया हो उसकी अपनी कहानी क्या हो सकती है ? कृष्ण को अलग कर दें तो राधा की कहानी कुछ भी नहीं। जिस प्रकार एक पतिव्रता नारी की कहानी उसके पति और परिवार तथा सम्बन्धित लोगों से जुड़ी हुई होती है, ठीक उसी प्रकार बनारसी दास जी (जिन को संगत समतावाद के सब सज्जन, माताएं, बच्चे भगत जी कहते थे) की कहानी भी पूर्ण तथा श्री सत्गुरूदेव तथा सगत समतावाद से संयुक्त हैं
आज आपकी पुण्यतिथि पर हम सब आपको याद कर, आपकी अटूट सेवा को शत शत नमन करते हैं और सतगुरदेव जी से सत विश्वास, सत बुद्धि व ईश्वर प्रेम प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं ताकि हम सब भी सेवा रूपी अमोलक धन को अपने जीवन में एकत्रित करने का भरपूर प्रयास कर सकें।
श्री सतगुरुदेव जी के आशीर्वाद से संगत के सभी सदस्य बजुर्गों के सच्चे जीवन से इसी प्रकार प्रेरणा लेते रहेंगे आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और सतगुरुदेव जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें भी सत् विश्वास, सत् बुद्धि और ईश्वर प्रेम प्रदान करें, ताकि हम भी सेवा रूपी अमूल्य धन को अपने जीवन में संचित कर सकें।