पुण्य तिथि : 09 जनवरी 1984
पूरा गुरु पूरा सिख, जग को जीवन देत ।
‘मंगत’ तिनके चरन की, धूड़ी सीस रमीत ॥
सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी के सौम्य व्यक्तित्व में चुम्बक जैसा अनोखा आकर्षण जिसने अनेक व्यक्तियों को अपनी ओर अनायास ही खींच लिया था। उस चुम्बकीय व्यक्तित्व की ओर खिंचने वाले साधकों में से बाबू अमोलक राम का नाम विशेष महत्त्वपूर्ण है, जिस प्रकार दीपक के जलते ही पतंगे उनके आस-पास मंडराने लगते हैं उसी प्रकार महापुरुष की वाणी से जब ज्ञान और सत्य – ज्योति फैलनी शुरू हुई तब अनेक जिज्ञासु अपने-आप ही उसकी ओर अनुरक्त होने लगे।
दिसम्बर, 1935 की बात है। सतपुरुष अपनी माता जी के देहावसान के पश्चात् एक कार से सांसारिक जीवन के प्रति अपने दायित्व से मुक्त हो गए। चिकित्सा का व्यवसाय छोड़कर वे सत्य और ज्ञान का अमृत बांटने के लिए स्थान-स्थान पर भ्रमण करने लगे। उसी प्रसंग में वे लाहौर भी पधारे। वहां वे अपने सम्बन्धी डाक्टर वीर राजा राम और डॉ देवदत्त के घर ठहरे। उनके मुख से उच्चारण होने वाली दिव्य वाणी से डाक्टर साहेब इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे ‘पवित्र जीवन’ पुस्तक के नाम से छपवाकर जनता के कल्याणार्थ बंटवाना शुरू कर दिया। डॉ साहेब के निवास स्थान कच्चा निस्बत रोड के निकट ही उन्हीं दिनों ‘काला गुजरां’ निवासी बाबू अमोलक राम अपने एक सम्बन्धी के पास आए हुए थे। सतपुरुष के प्रवचनों की चर्चा सुनकर वे भी उनके दर्शनार्थ डा० साहेब के घर गए। बाबू अमोलक राम उन दिनों जिला सैशन जज के स्टैनो थे। इस पद पर रिश्वत आदि से खूब पैसा एकत्र किया जा सकता था किन्तु बाबू अमोलक राम का आचरण पवित्र और उनके विचार आध्यात्मिक थे। अतः वे ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से अपना दायित्व निभाते थे। ‘राधास्वामी मत’ से भी थोड़ा बहुत परिचित थे। सतपुरुष की अमृतवाणी का प्रसाद पाकर वे बड़े प्रभावित हुए तथा उनसे प्रार्थना की कि रावलपिंडी लौटते समय वे उनके निवास स्थान ‘काला गुजरां’ पधारने की कृपा करें। सतपुरुष बोले- ‘वचन तो नहीं दिया जा सकता। समय आने पर देखा जाएगा। संयोगवश वह समय शीघ्र ही आ गया। सतपुरुष के सम्बन्धी पं० देवदत्त की ससुराल ‘काला गुजरां’ में थी। उनकी सास बहुत बीमार रहती थी। सतपुरुष चिकित्सक के रूप में काफी प्रसिद्धि पा ही चुके थे। पं० देवदत्त ने उन्हें काला गुजरां पधारकर अपनी सास को देखने का अनुरोध किया जिसे सतपुरुष टाल न सके। इस प्रकार बाबू अमोलक राम की कामना अनायास ही पूर्ण हो गई। ‘काला गुजरां’ में उन्होंने सतपुरुष को अपने घर पर ठहराया।
‘काला गुजरां’ में बाबू अमोलक राम के एक घनिष्ठ मित्र भगत फकीर चन्द बड़े सत्संगी थे। वे भी सतपुरुष के वचनामृत का पान करने आए । सत्संग प्रवचन की समाप्ति के के बाद जब उन्हे बाबू अमोलक राम बाहर तक छोडने गए तो उन्होंने बाबू जी से कहा- बाबू जी! तुम बड़े सौभाग्यशाली हो जो ऐसे उच्चकोटि के महापुरुष को घर पर लाए हो। इन्हें पकड़ लो।
भगत फकीर चन्द से प्रेरणा पाकर बाबू अमोलक राम ने श्री महाराज के ‘काला गुजरा’ प्रवास के समय ही उनसे निवेदन किया कि दास को सतमार्ग पर लगाने की कृपा की जाये। सतपुरुष ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए बाबू जी को अपने चरणों में स्थान प्रदान किया और कहा- ‘दो वर्ष बाद आपकी ड्यूटी जनता की सेवा में लगने वाली है।’
मार्च सन् 1939 में अहमदाबाद (गुजरात) से लौटते समय सतपुरुष ने पुनः रास्ते में ‘काला गुजरां’ प्रवास किया और बाबू अमोलक राम के घर में ही ठहरे। बाबू जी सत्पुरुष की चरण-सेवा का व्रत लेने के बाद भी संस्कार रूप में अभी ‘राधास्वामी’ संप्रदाय के ही नियमों से बँधे हुए थे। सतपुरुष ने परोक्ष रूप से चेतावनी दी- ‘छलाँग लगाकर छत पर चढ़ना बहुत मुश्किल है। गिरोगे, टाँगें टूट जाएंगी। सीधे होकर चलो, जो साधना का उपाय बताया गया है उसे धारण करो। मन को एकाग्र करना अधिक जरूरी है।’
कुछ दिन पश्चात् जब श्री महाराज ने ‘नखेत्र पर्वत’ पर प्रवास किया, तब भी बाबू अमोलक राम एक दिन के लिए आकर सतपुरुष के चरणों में रहे। इसके उपरान्त समय-समय पर गुरुदेव के मुख से जो अमृतवाणी का प्रवाह प्रकट हुआ उसे प्रकाशित कराने की सेवा बाबू जी ही संभालते रहे। वे उसे पुस्तक रूप में छपवाकर बिना मूल्य वितरित करने की व्यवस्था करते थे। प्रभु प्रेम की लौ तो उन्हें लगी ही हुई थी, गुरु चरणों का सम्पर्क प्राप्त होते ही वह और प्रज्जवलित हो गई थी। परिणाम स्वरूप उन्होंने रिटायरमेंट से दो वर्ष पहले अवकाश प्राप्त कर लिया।
सन 1943 में सतपुरुष मंगतराम जी ‘सरूपा’ जंगल, ‘चिनारी’, ‘डोमेल’, कोहला’ ‘जलमादा’ आदि जिस-जिस स्थान पर प्रवास किया, बाबू अमोलक राम जी उनके दर्शनार्थ उपस्थित होकर वचनामृत का लाभ उठाते रहे। उन्हीं की प्रेरणा से लाहौर के बख्शी मनीराम जी रीडर हाईकोर्ट भी सत्पुरुष के चरणों में आए।
इस बीच, जैसा कि सतपुरुष ने अमोलक राम को प्रथम ही कहा था कि उनकी ड्यूटी जनता की सेव लगने वाली है, उन्हें शुभ स्थान गंगोठिय केन्द्रीय आश्रम की व्यवस्था की देखभाल का कार्य सौंप दिया गया। सतपुरुष तो अधिकतर प्रवास में ही रहते थे, केवल धार्मिक सम्मेलन के अवसर पर, या बीच में कभी कोई मौका मिलने पर ही शुभ स्थान पधारते, इस दौरान वहां की सारी व्यवस्था बाबू अमोलक राम जी ही करते थे और सतपुरुष जहा विराजमान होते उन्हें पत्र- व्यवहार द्वारा स्थिति से सूचित करते रहते थे और यथायोग्य आदेश मांगते रहते थे।
नवम्बर 1943 में जब शुभ स्थान गगोठियां पर आश्रम के निर्माण की योजना शुरू हुई तो अमोलक राम जी ने उसके लिए दिन-रात एक कर दिया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इमारती सामान मिलने में बड़ी कठिनाई होती थी फिर भी बाबू जी उसका प्रबन्ध करते रहे।
अपनी अथक मेहनत, ईमानदारी, सत्य निष्ठा और निःस्वार्थ सेवा, भावना के बल पर बाबू अमोलक राम सतपुरुष के स्नेही विश्वासपात्र बन गए। बाबू जी जब भी प्रवास में सतपुरुष के लिए आश्रम के सम्बन्ध में कोई निर्देश मांगते तो सतपुरुष उनके विवेक पर पूरा भरोसा रखते हुए यही लिखवा देते कि जैसा उचित समझें, कर लें। इस सम्बन्ध में यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि सत्पुरुष के अनन्य सेवक और परम शिष्य भगत बनारसी दास जी जब-जब भी सतमार्ग से डगमगाने लगते तब बाबू अमोलक राम जी का आचरण एवं उनकी प्रेरणा उन्हें इस मार्ग से विचलित होने से थाम लेती।
अगस्त, सन् 1946 ई० में जब सतपुरुष मलखांबाला’ (जिला सियालकोट, पाकिस्तान) प्रवास कर रहे थे तब बाबू अमोलक राम ने श्री चरणों में उपस्थित होकर प्रार्थना की आप काला गुजरा’ पधारकर वहां के निवासियों अमृत वचनों से कृतार्थ करें। सतपुरुष ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। बाबू जी के पुत्र हरबंस लाल को कुछ व्यसन थे। बाबू जी ने सत्पुरुष से अज़ीज़ हरबंस लाल को समझाने की प्रार्थना की। इस पर हरबंस लाल के मुँह से अचानक ये शब्द निकल गए कि ‘बाबू जी! आपने स्वयं तो सिगरेट पीना छोड़ा नहीं।’ बात सच थी। सतपुरुष की सेवा में आने के बाद बाबू अमोलक राम माँसाहार आदि तो छोड चुके थे किन्तु सिगरेट की आदत नहीं छोड़ पाए थे। इसका कारण कचहरी में अधिकतर अंग्रेजों की और अन्य साहेब लोगों की संगत थी। शुभ स्थान गंगोठियां में रहते हुए भी वे सतपुरुष के सामने से हट कर, कभी-कभी सिगरेट पी लेते थे। आज अज़ीज़ हरबंस लाल के व्यंग्य का उन पर इतना प्रभाव हुआ कि भविष्य में उन्होंने कभी सिगरेट न पीने का प्रण कर लिया।
शुभ स्थान गंगोठियां में, सतपुरुष की अनुपस्थिति में भी कभी किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं होने पाती थी। सतपुरुष स्थान-स्थान से उन्हें आदेश देते रहते थे जिसके अनुसार वे आश्रम और सत्संग भवन के निर्माण तथा लंगर आदि के प्रबन्ध के लिए सेवा करते रहते थे। बाबू जी पूरा हिसाब लिखते रहते थे। अपने लिए एक पैसा भी खर्च नहीं करते थे। पेंशन से मिलने वाली रकम पर ही निर्वाह करते थे, बल्कि उसमें से भी जितना हो सकता था, संगत सेवा में लगा देते थे।
फरवरी, सन् 1946 की बात है। सतपुरुष उन दिनों लाहौर में मार्तण्ड भवन में निवास कर रहे थे। एक दिन बातों ही बातों में प्रेमी लाला बख्शी राम ने कहा- महाराज! हमें बाबू अमोलक राम का स्वभाव पसन्द नहीं आया। क्या वह साफ नीयत से हिसाब-किताब रख रहा है? पैसा ऊपर नीचे जरूर हो रहा है।
श्री महाराज सारी बात शान्ति से सुनते रहे। कुछ क्षण पश्चात बोले- ‘आपको क्या सन्देह हो गया है? इन (फकीरों) के सामने यह एक-एक पैसे का हिसाब रख रहा है। यह जो प्रधानता संगत ने तुमको दी है, क्या उसका यह अभिप्राय है कि तुम एक दूसरे पर सन्देह करते रहो!
इस पर प्रेमी बख्शी राम ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और कहा- ‘सहज स्वभाव ही निवेदन किया था। भविष्य में किसी के सम्बन्ध में इस प्रकार नहीं सोचा जाएगा।’
जिन दिनों देश विभाजन की आग में जल रहा था, उन दिनों शुभ स्थान गंगोठियां की हर तरह की जिम्मेदारी बाबू अमोलक राम पर आ पड़ी। सतपुरुष जब (फरवरी, सन् 1946 में) लाहौर-प्रवास कर रहे थे तभी उपद्रव शुरू हो गए थे। वे शुभ स्थान नहीं जा पाए और अनेक मार्ग बदलते हुए जम्मू आ गए थे। शुभ स्थान के आस-पास मुस्लिम आबादी अधिक थी और तनाव का वातावरण था। उधर, उनका अपना परिवार भी संकट में था। बाबू जी ने बड़े विवेक, साहस और धैर्य से सारी स्थिति को सम्भाला। जान हथेली पर रखकर बहुत लम्बा चक्कर काटकर कई मील का सफर किया। उनकी मिलनसारी और ईमानदारी से आसपास के सब मुसलमान भी परिचित थे। उन्होंने हर मौके पर उनकी सहायता की। हां, एक जगह लुटेरों ने उनका सब कुछ छीन लिया। उसमे कुछ संगत के रुपए भी थे। यह सारा वृतान्त महाराज जी के कानों तक पहुंचा तो उन्होने कह दिया कि संगत का रुपया बाबू जी अपने से ही भर दें। बाबू जी ने ऐसा ही किया।
देश के विभाजन के पश्चात् बाबू अमोलक राम अन्य विस्थापितों के साथ धर्मशाला (जिला कांगडा) में आ गए। सतपुरुष श्रीनगर में प्रवास करने के उपरान्त कहानुवान विराज रहे थे उन्होंने तार देकर बाबू जी को अपने पास बुलाया। उनसे पिछला सारा वृतान्त सुना। फिर पूछा- भविष्य के लिए क्या विचार है?’ बाबू जी ने कहा- ‘महाराज जी! जिस सतगुरु और संगत सेवा के मार्ग पर कदम उठ चुका है, उसी ओर आगे बढ़ेगा।’ तब सत्पुरुष ने उन्हें प्रेमी लाला शंकर दास के साथ सत्संग के योग्य उपयुक्त एकान्त स्थान पता लगाने का कार्य सौंपा।
मई, 1950 में, जब सतगुरु महाराज श्रीनगर प्रवास पर थे तब जगाधरी में बाबू अमोलक राम आश्रम के निर्माण में तन-मन से लगे रहे। वे जब भी सत्पुरुष के श्री चरणों में पत्र भेजकर किसी बात के सम्बन्ध में परामर्श माँगते, महाराज जी उत्तर देते- ‘जो उचित समझें, देख लें। सब कुछ आपके ऊपर है।’
सतगुरुदेव महात्मा मंगतराम जी महाराज के जीवन पर आधारित “जीवन गाथा” पुस्तक का अध्ययन करने पर गुरुदेव के तपस्वी, त्यागमय और परोपकारी जीवन का एक सजीव रेखाचित्र हमारे सम्मुख उभर कर आता है। इस अनुपम चित्र को शब्दों में साकार करने की महान सेवा बाबू अमोलक राम जी के हिस्से में आई। निस्संदेह, इस पुण्य कार्य में भगत जी सहित अन्य वरिष्ठ प्रेमियों का भी अमूल्य योगदान रहा है, परंतु बाबू अमोलक राम जी ने जिस सूक्ष्मता, श्रद्धा और परिश्रम के साथ समस्त तथ्यों को संकलित कर गागर में सागर भरने जैसा अद्वितीय कार्य किया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो आने वाली पीढ़ियों को जन्मों-जन्मों तक एक महान योगी, ब्रह्मलीन महात्मा मंगतराम जी के आदर्श, तप और मानव-कल्याण से ओतप्रोत जीवन से प्रेरणा व मार्गदर्शन देती रहेगी तथा उन्हें अध्यात्म के पथ पर निरंतर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती रहेगी।
आज आपकी पुण्यतिथि पर हम सब आपको याद कर, आपकी अटूट सेवा को शत शत नमन करते हैं और सतगुरदेव जी से सत विश्वास, सत बुद्धि व ईश्वर प्रेम प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं ताकि हम सब भी सेवा रूपी अमोलक धन को अपने जीवन में एकत्रित करने का भरपूर प्रयास कर सकें।
श्री सतगुरुदेव जी के आशीर्वाद से संगत के सभी सदस्य बजुर्गों के सच्चे जीवन से इसी प्रकार प्रेरणा लेते रहेंगे आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और सतगुरुदेव जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें भी सत् विश्वास, सत् बुद्धि और ईश्वर प्रेम प्रदान करें, ताकि हम भी सेवा रूपी अमूल्य धन को अपने जीवन में संचित कर सकें।