पुण्य तिथि : 06 जून 2009
गुरु और शिष्य का संबंध इस सृष्टि का सबसे पवित्र और गूढ़ संबंध है। जहाँ एक ओर गुरु ईश्वर का जीवंत रूप होता है, वहीं शिष्य उसका पूर्ण समर्पित प्रतिबिंब। ऐसी ही एक कथा है प्रेमी देवराज गुप्ता जी की, जिनकी जीवन यात्रा सतगुरु श्री महात्मा मंगत राम जी की छत्रछाया में निखरती रही। यह लेख उस अनोखी भक्ति, संघर्ष, तपस्या और आत्मिक परिवर्तन की सजीव झलक है, जिसे उन्होंने अनुभव किया और जीया। आइये, आज हम उन्हीं की जुबानी गुरु शिष्य सम्बन्ध का यह महत्वपूर्ण प्रसंग पढ़ें। यह प्रसंग पुस्तक यादगार पल में भी दर्ज किया जा चूका है।
एक बार की बात है, श्री महाराज जी दिल्ली में पधारे हुए थे। मैं प्रेमी राजा राम दत्त के साथ श्री महाराज जी के पास पहुँचा। प्रणाम करके बैठने के पश्चात् गुरुदेव ने मुझसे पूछा, “प्रेमी कैसे आए हो?” मैंने कहा, ‘महाराज जी ! मेरी इच्छा पूरी होनी चाहिए इसलिए आपके पास आया हूँ। मुझे जिस चीज़ की तलाश है वह मुझको मिलनी चाहिए।’ श्री महाराज जी ने कहा, “प्रेमी ! तूने बड़ी मेहनत की है, बड़ी भक्ति की है, इसलिए तेरा काम बिल्कुल नहीं बनेगा। कुदरत तुझको बड़ी चीज़ देना चाहती है।” मैंने कहा, ‘लेकिन मैं तो वही चीज चाहूँगा। मैं तो उसको कभी नहीं छोडूंगा।’ श्री महाराज जी कहने लगे, “प्रेमी ! फिर तबाही ही तबाही है। वह चीज कभी नहीं मिलेगी, कुदरत बड़ी चीज देना चाहती है।”
बात यह थी कि मेरा कहीं प्रेम था, वह फेल हो गया। मन में ऐसी घोर वेदना थी कि धूप में पड़े रहने पर भी शरीर का होश नहीं रहता था। आज गुरुदेव के पास बैठकर जलते हुए मन में ठंडक और शांति महसूस हुई। उस दिन उन्होंने कहा था, “फ़कीरों का प्रधान निश्चय है कि दुनिया की कोई भी चीज़ इन्सान को स्थायी आनन्द नहीं दे सकती। इसके उलट यहाँ का हर सामान रंज़ और ग़म को देने वाला है। अगर मनुष्य इस इन्द्रिय भोगों से मुख मोड़ ले तो सच्ची खुशी के दरवाजे उसके लिए खुले हैं। यह एक जबरदस्त हक़ीक़त है।” वास्तव में गुरुदेव के इन वचनों की भावना ने ही मुझको उनकी ओर खींचा।
एक दिन मैंने श्री महाराज जी से कहा, ‘महाराज जी ! मुझे नाम दे दीजिए।’ गुरुदेव ने कहा, “अभी अन्दर वासना बहुत है। पहले शादी कर।” प्रारब्धवश शादी भी हो गयी। शादी के पश्चात् जगाधरी में फिर श्री महाराज जी से मिलने गया। मेरा उनके साथ बहुत ही सहज रूप में वार्तालाप हुआ करता था। मैंने उनसे कहा, महाराज जी ! हकीम के पास नब्ज़ दिखाने आए हैं। यदि दवा हो तो दीजिए, नहीं तो जाते हैं।’ गुरुदेव बोले, “प्रेमी ! ऐसे होनहार युवक को इन्कार नहीं कर सकते। कल सुबह 6 बजे आ जाना।” दीक्षा के समय 2-3 और प्रेमी भी थे। उनमें से एक प्रेमी से पूछा, “क्या सिनेमा देखते हो?” उसने कहा, ‘हाँ।’ गुरुदेव बोले, “सिनेमा को आज यहीं छोड़ दो।”
दूसरे प्रेमी से पूछा, “क्या सिगरेट पीते हो?” उसने कहा, ‘हाँ, पीता हूँ।’ गुरुदेव ने उससे कहा, “सिगरेट आज से यहीं छोड़ दो।” प्रेमियों ने गुरुदेव की बात तुरन्त मान ली। परन्तु मैं मन में सोचने लगा कि मैं तो सिगरेट छोड़ने का वायदा नहीं करूंगा। यदि कहा तो उठकर चला जाऊँगा।
अन्तर्यामी गुरुदेव ने मुझसे पूछा ही नहीं। दीक्षा के पश्चात् मेरा हाथ पकड़कर अपने घुटने पर रखकर बोले, “प्रेमी ! थोड़ा-थोड़ा नाम जप लिया करना।” उनके पकड़ने से मुझको ऐसी करंट सी लगी कि मेरा जन्म-जन्मांतर का अहंकार ख़त्म हो गया।
एक बार प्रेमियों ने सिगरेट के बारे में मेरी शिकायत श्री महाराज जी से कर दी। इस पर मैंने श्री महाराज जी को लिख दिया कि मेरा इरादा सिगरेट छोड़ने का नहीं है। परन्तु बाद में प्रभु कृपा से स्वयं ही सिगरेट छूट गई। एक दिन श्री महाराज जी ने कहा था, “प्रेमी ! रोटी खाना भूल जाना लेकिन नाम जपना मत भूलना। यह चीज तेरे काम आएगी।”
जब श्री महाराज जी से मैंने नाम ले लिया तो पूछा, ‘अब आपकी क्या जरूरत रही?’ उन्होंने कहा, “प्रेमी ! चलने पर बड़ी-बड़ी खाइयाँ आती हैं,गुरु बचाता है उनसे।”
फिर मैंने पूछा, महाराज जी ! जब आप चले जाओगे तो हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा?’ उन्होंने फ़रमाया, “प्रेमी ! अन्दर से खुद सब समझ आ जाएगी।” इसके बाद मैंने पूछा, ‘महाराज जी ! कब तक पीछा करोगे?’ उन्होंने कहा, “सच्चा गुरु कई जन्म तक शिष्य का साथ देता है।” फिर कहा कि शेर के मुँह से शिकार निकल सकता है, लेकिन संत के हाथ में आया हुआ शिष्य नहीं निकल सकता।

सन् 1952 की बात है। जगाधरी में वार्षिक सम्मेलन का अवसर था। गुरुदेव की कुटिया में कुछ प्रेमी उनके पास बैठे हुए थे। मैं भी वहीं उपस्थित था। श्री महाराज जी की सहमति से कुछ प्रेमियों को सत्संग में बोलने की आज्ञा मिली थी, परन्तु मुझसे किसी ने नहीं पूछा। मैं दर्शन शास्त्र का मेधावी छात्र रह चुका था। बोलने में भी काफी निपुण था। मुझको अपने मुकाबले का एक भी वक्ता वहाँ नजर नहीं आ रहा था, इसलिए मैंने स्वयं ही श्री महाराज जी से कह दिया, ‘महाराज जी ! मुझे भी बोलने के लिए थोड़ा समय दिया जाए।’ श्री महाराज जी ने कह दिया, “इन्हें भी दस मिनट दे दिए जाएं।” मैंने कहा, ‘महाराज जी ! दस मिनट में क्या होगा?’ खैर, गुरुदेव ने बीस मिनट का समय दे दिया। जब बोलने का समय आया तो प्रेमीजन मन में सोच रहे थे कि आज बड़ा अच्छा प्रवचन सुनने को मिलेगा। लेकिन उस दिन जब मैंने बोलना प्रारम्भ किया तो बुद्धि से विचार गायब होने लगे। मैंने बहुत कोशिश की परन्तु असफल रहा। फिर एक गिलास पानी मंगाकर पिया, पुनः प्रयास किया परन्तु निराशा ही हाथ लगी। अंत में यह कहकर बैठना पड़ा, ‘आज मेरे साथ एक अनहोनी सी हो रही है। मैं चुप हो जाने के लिए मजबूर हूँ।’
मन में मैं बड़ा निराश था। गुरुदेव से भी मैंने इस बारे में कुछ नहीं कहा, न ही उन्होंने मुझसे इस बारे में कोई बात की। पूरा वर्ष बीत गया। 1953 में सम्मेलन का वही अवसर एक बार फिर सामने आ गया। उस दिन भी श्री महाराज जी की कुटिया में प्रेमियों के नाम सत्संग में बोलने के लिए लिखे जा रहे थे, परन्तु मैं मौन था। गुरुदेव ने स्वयं ही उस सत्संग में मुझसे बोलने के लिए कहा।
परन्तु मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा, ‘महाराज जी ! पिछले वर्ष में भुगत चुका हूँ। इस बार मुझे माफ़ कीजिए।’ श्री महाराज जी ने बड़े ही प्रेमपूर्वक वात्सल्य भाव से कहा, “लाल जी ! आज यह खुद तुमसे बोलने को कह रहे हैं।” फिर बोले, “लाल जी ! किसी का होकर बोला करो।”
बात वास्तव में यह थी कि पिछले वर्ष मेरे अन्दर अपनी काबलियत का बड़ा अहंकार था, जिसको उन्होंने मेरी ही भलाई के लिए तोड़ दिया था। आज उनका इशारा था कि गुरु रूप परमेश्वर अन्दर मौजूद है। उसी की कृपा से मनुष्य को सफलता मिलती है। उसके प्रति अपने आपको समर्पण करके ही कार्य करने में भलाई है।
गुरुदेव के कहने पर मैंने ‘हाँ’ कर दी। जब बोलने का समय आया तो मैंने बिना ही पूर्ण तैयारी के गुरु चरणों का ध्यान करके बोलना प्रारम्भ कर दिया। उस दिन अन्दर से धाराप्रवाह विचार इस प्रकार निकल रहे थे जिस प्रकार निरन्तर नदी का प्रवाह स्वतः ही चलता रहता है। प्रेमीजन भी सुनने में तल्लीन थे। वे इतने भाव विभोर हो गए कि कुछ प्रेमियों ने तालियाँ भी बजा दी। पच्चीस मिनट का समय पता ही न चला कब खत्म हो गया। संगत और समय की माँग करने लगी परन्तु मैंने मना कर दिया। पास बैठे गुरुदेव ने प्रवचन जारी रखने का इशारा किया इसलिए कुछ देर और बोलना पड़ा। उस दिन मुझको साक्षात् अनुभव हो रहा था कि मेरी वाणी किसी और शक्ति की प्रेरणा से ही निकल रही थी, जिसमें इतना रस था कि जनता उस रस में सराबोर हो रही थी। उस दिन का प्रवचन मेरे जीवन का यादगार प्रवचन था।
श्री महाराज जी के पास बैठकर बड़ी शाँति अनुभव होती थी। कभी-कभी खुश्बू का भी अहसास होता था। जहाँ श्री महाराज जी जगाधरी आश्रम में बैठते थे, अभी तक उनका प्रभाव वहाँ मौजूद है। 1988 में जब मैं वहाँ गया था तब मुझको इस बात का अनुभव हुआ था। मेरे अन्दर भक्ति का भाव तो था ही, वहाँ कुटिया के पास पेड़ों में मुझको ‘मंगत’ ही ‘मंगत’ नजर आ रहे थे। उस समय मैं उन पेड़ों से लिपटकर बहुत रोया था। उसी कुटिया में मैंने एक दिन श्री महाराज जी से मेरे ऊपर कृपा करने के लिए प्रार्थना की थी। उस दिन उन्होंने मुझको कहा था, “प्रेमी ! पहले 20 दिन तक जमकर सिमरन करके तो देख।” लेकिन मैंने गुरुदेव की यह बात आजमाकर नहीं देखी। जब मेरी उम्र 62 वर्ष की हो गयी तो मुझको गुरुदेव की 20 दिन वाली बात याद आयी। गुरुदेव की बात पर अमल करने के लिए मैं 20 दिन तक न तो आफ़िस गया और न ही कोई कार्य किया। रात-दिन सिमरन की ही धुन लगी रही। बीसवाँ दिन जब आया तो गुरु कृपा का अहसास अन्दर होने लगा। उस दिन जो आन्तरिक आनन्द प्राप्त हुआ उससे गुरुदेव की बात सत्य सिद्ध हुई। उसके पश्चात् वह निरन्तर बढ़ता रहा। आज गुरु कृपा से जो शाँति और आनन्द अन्दर है उसका ऋण मैं कदापि नहीं चुका सकता। अब समझ में आता है कि सच्चा प्यार तो गुरु-शिष्य में ही होता है और कहीं नहीं।
आज यदि गुरुदेव शरीर रूप में होते तो उनके पास जाकर मैं यही कहता, ‘गुरुदेव क्या हुक्म है? चाहो तो मेरे शरीर की खाल भी उतार लो, मैं देने को तैयार हूँ।’
मैं करूँ जो प्यार तुझसे बुरा न मान लेना।
जहाँ दिल रहे न वश में वो मुक़ाम आ गया है।।
प्रेमी देवराज गुप्ता जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि जब एक शिष्य पूरे समर्पण और श्रद्धा से अपने गुरु के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देता है, तब गुरु की कृपा उसे अनंत आंतरिक आनंद और शांति प्रदान करती है। उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सभी साधकों की के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो सच्चे मार्ग की तलाश में हैं।
ऐसे विरले प्रेमियों का जीवन तमाम संगतों के लिए मिसाल स्वरूप और प्रेरणा दायक है और इस प्रसंग को पढ़ने वालों के हृदय में गुरु भक्ति रुपी बीज को अंकुरित करता है।